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कहानी- बताते बताते

यहां तक कि किचन में उसकी और मेरी पसंद का आज क्या-क्या बना है, सब्जी, सूखी भुजिया ही है या कोई रसेदार सब्जी भी बनी है।

Author April 30, 2017 5:35 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

राम नगीना मौर्य

चाहे जितनी देर हो जाए शाम को घर पहुंचने में, पर बताती जरूर है मुझे सब कुछ मेरी बिटिया। जो कुछ हुआ हो दिन भर उसके स्कूल में, मुझे घर में घुसते देखा नहीं कि बस शुरू हो जाती है नॉनस्टॉप, बिना किसी ओर-छोर के या आगा-पीछी देखे-सुने, सोचे-समझे। पूरा दिन कैसा बीता। बताने लगती है अक्षरश: शब्दश: वाक्यश: सुबह से शाम तक का पूरे दिन का अपना लेखा-जोखा।  अमूमन, सिर्फ ह्यएक बात बताऊं पापा…?ह्ण कहने से होती है उसकी बातों की भेद-अभेद भरी शुरुआत। पर, ह्यअच्छा…? अच्छा…?ह्ण कहते हुंकारी भरने भर की देर है, फिर तो जैसे खुल जाता है उसकी बात-बतकहियों का पिटारा ही। जब तक पत्नी टोक न दे उसे यह कह कर कि ह्यपापा अभी घर में पांव रखे नहीं कि बस्स शुरू हो गर्इं दादी अम्मा अपनी स्टाइल में… अपने सुर-ताल-लय और धुन में। अऽरे बूऽढ़ाऽ!… हाथ-मुंह तो धो लेने दो? कपड़े-सपड़े तो चेंज कर लेने दो? चाय-वाय तो पी लेने दो इन्हें? फिर सुनाना अपनी बेसिर-पैर की बकवादियां। अपनी लंतरानियां…!

आड़ी-तिरछी भाव-भंगिमा बनाते, तो कभी छत्तीस कोण का मुंह बिचकाते-बिगाड़ते, उसकी ढेर सारी बातें सुनते, कभी-कभी तो लगता है जैसे अपने दोस्तों, क्लॉस-टीचर, कड़क मिजाज पीटी सर और रिक्शेवाले भैयाजी की बातों के अलावा उसकी कोई दुनिया ही नहीं है। इन्हें लेकर, इनके बारे में तोतली जुबान में चहकते-बतियाते, बीच-बीच में उछलते-कूदते, तो कभी ता-थैया-सा थिरकते, साथ ही उन लोगों की मिमिक्री भी करते-चलते, उसके पास बताने-सुनाने को इतना कुछ होता है कि अंदर आकर जूते-मोजे उतारने, कपड़े बदलने, हाथ-मुंह धोने, चाभियों का गुच्छा, चश्मा, पर्स, बैग, पेन, कप-बोर्ड में रखने आदि उपक्रम में इत्मिनान से, संयत होकर पूरमपूर उसकी बातें सुन ही नहीं पाता।
जैसे थकती ही नहीं वह। उतनी देर मेरे इर्द-गिर्द चक्कर लगाती-बतियाती, अगड़म-बगड़म-सगड़म… पता नहीं क्या-क्या बेसिर-पैर की, बेतरतीब, तो कभी सिलसिलेवार एक के बाद एक, इनकी-उनकी बातें रुकने का नाम ही नहीं लेतीं। जैसे खत्म ही नहीं होतीं उसकी बातें। बतानी-सुनानी होतीं हैं उसे एकबारगी ही जाने कितने ही लोगों के बारे में, कितनी ही बातें।
और तो और, स्कूल में अपना टिफिन पूरा फिनिश न करने, जूते-मोजे-टाई-बेल्ट-यूनिफॉर्म-बॉटल-बैग आदि स्कूल से लौट कर, घर में कहीं भी उतारते-झटकते-फेंकते टीवी पर अपना मन-पसंद कार्टून देखने से रोकने, लापरवाही से खाना खाने पर टोकने को लेकर अपनी मम्मी की दिन भर की डांट-फटकार-शिकायतें आदि भी बाजदफा उसकी बतकहियों में समाहित रहती हैं।

यहां तक कि किचन में उसकी और मेरी पसंद का आज क्या-क्या बना है, सब्जी, सूखी भुजिया ही है या कोई रसेदार सब्जी भी बनी है। चावल बना है या आज भी सिर्फ रोटी-तरकारी खानी होगी…। ऐसे न जाने कितनी तरह की बातें। छोटी से छोटी बात को विस्तार से बताने का उपक्रम वह अपने बात-वृत्तांत में शामिल कर ही लेती है।
गौरतलब यह भी कि ऐसे में उसकी मम्मी अगर कुछ कहना चाहें अपनी सफाई में, जोड़ना चाहें कुछ अपनी तरफ से बात समझाने के तर्इं, तो सुन-देख कर बिटिया का अंदाज-ए-बयां या शायद चेहरे पर आए मेरे भावों को पढ़ते, मेरे इरादे भांपते, उस पर बनावटी गुस्सा दिखाते, आंखें तरेरते- ह्यऐऽ बूऽढ़ा अभी से लगाना-बुझाना सीख रही हैं।ह्ण या सिर्फ ह्यअच्छा नाऽनी… कहते, बस चुप लगा जाती है।फिर भी कभी-कभार, टोका-टाकी हल्की-फुल्की तकरार तो मां-बेटी में हो ही जाती है। एक-दूसरे को आंखें दिखाते, भौंहें तरेरते, तो कभी लंबी जीभ निकालते-चिढ़ाते, खासा नाटकीय दृश्य उपस्थित हो जाता है। बावजूद अपनी मम्मी के रोकने-टोकने के, उन्हें बीच में ही रोकते-टोकते, वह पूरे दिन का ब्योरा प्रस्तुत करके ही दम लेती है।  जाहिर है, ऐसे में फिर हम पति-पत्नी बस मुस्कराते, उसे देखते-सुनते भर रह जाते हैं- देख कर उसका मोहक मुस्कान बिखेरता चेहरा। सुन कर उसकी रस-मिश्रित बातें। बाल-सुलभ मासूमियत भरी उसकी अदाएं। दिन-भर के कामों-उलझनों आदि से उपजी थकावट। गुस्से के पल। हताशा-निराशा-उदासी-ऊबन-उकताहट या किसी बात पर उपजी झल्लाहट-खिसियाहट के पल, पल-भर में कब काफूर हो जाते हैं, कामकाज की थकान कब उड़न-छू हो जाती है, पता ही नहीं चलता।

रोजमर्रा की आपाधापी। दुनिया-जहान की उथल-पुथल। तमाम आकुलताओं-व्याकुलताओं से आधा-तिहा या कभी पूरमपूर निबटने के अनंतर, वापस घर लौटते, बिटिया की दुनिया के बारे में जानना, उसकी ढेरों बातें सुनना, उससे बतियाना, अंतर्मन को कहीं गहरे सुकून देता है। वाग्विदग्धतापूर्ण भाषा में कहें तो लगता है जैसे जेठ की तपती दुपहरिया में अमराइयों तले मंद-मंद चल रही पुरवा हवा संग आंखें मूंदे, खटिया पर अधलेटे, निश्चिंत से सुस्ता रहे हों। मैं तो उसकी सारी बात-बतकहियां, यदा-कदा अपनी डिमाई आकार डायरी में लिपिबद्ध भी करता चलता हंू। उसके सवाल बाल-सुलभ ही हों जरूरी नहीं। बाजमौके तो उसके सवालों के जवाब देते हम बगलें भी झांकने लगते हैं। बिटिया की बाल-सुलभ स्वाभाविक बातें सुनते कभी खिन्नता महसूस नहीं हुई। उससे जुड़े खट्टे-मीठे अनुभवों को अपनी डायरी में लिखना बेहद सुखद और सुकूनदेह रहा है। दुविधा तो तब होती है, जब वह कुछ नहीं बोलती-बतियाती। उसके अनुभव, उसकी बातों को समझना दुरूह रहा हो, असाध्य रहा हो, ऐसा भी नहीं। बातें तो उसकी बिल्कुल सीधी-सादी होती हैं, बिना किसी लाग-लपेट के। मन-गढ़ंत या गुरु-गंभीर तो कतई नहीं, जो अविश्वसनीय या समझ से परे हों। बल्कि दिल की अतल गहराइयों में सीधे उतरती जातीं हैं।

उस रोज दफ्तर से लौटने में रात ज्यादा हो गई थी। उम्मीद के विपरीत घंटी की आवाज पर दरवाजा बिटिया ने खोला। ध्यान दिया कि रोज की तरह उसे ब्योरे बतियाने में कोई रुचि नहीं थी। आशंका यह भी हुई कि हो-न-हो सोने का वक्त होने के कारण ऐसा हो। पर चेहरे पर उसके उदासी की आड़ी-तिरछी रेखाओं के साफ-साफ आते-जाते दिखने से, किसी अनजान आशंका को भांपते, मेरे यह पूछने पर कि ह्यहमारी बिटिया रानी का मुंह आज इस कदर उतरा क्यों है, अभी तक सोई क्यों नहीं, कल स्कूल नहीं जाना है क्या?ह्ण
मेरे सवालों को धता बताते, आशंकाओं को निर्मूल करते, मेरे सवालों को लगभग अनसुना करते, उन्हें सिरे से परे धकेलते, चेहरे पर वही मासूमियत लिए, फौरन से पेशतर जैसे फट पड़ी हो। बिना यह जाने-सोचे-समझे-बूझे कि इतनी रात गए, उसकी बातें सुनने में मेरी रुचि होगी भी या नहीं।
ह्यएक बात बताऊं पापा…?

हां, बताओ…? आदतन मैंने भी जिज्ञासा व्यक्त की।
ह्यपरसों से मेरी पक्की सहेली रागिनी, स्कूल नहीं आएगी। उसके पापा ने अपना मकान बदल लिया है, और स्कूल से उसका नाम कटवा कर दूसरे स्कूल में लिखवा भी दिया है। कल के बाद वो लोग कहीं और रहने चले जाएंगे।
ह्यअच्छा…?
एक बात और बताऊं पापा…?
ह्यहां! बताओ…? मैं भी बात की तह में जाना चाहता था।
ह्यहम दोनों सहेलियां आगे वाली बेंच पर साथ-साथ बैठतीं थीं। हम दोनों एक ही कलर का हेयर-बैंड लगाते थे। हम आपस में अपना टिफिन भी शेयर करते थे। अब मैं अपना टिफिन किसके साथ शेयर करूंगी…?ह्ण
ह्यहां… यह बात तो काबिलेगौर है।मैंने भी आशंका जताने का अभिनय-सा किया।
ह्यएक और बात बताऊं पापा…?
ह्यहां, बताओ…?ह्ण अब मुझे उसकी बातों में दिलचस्पी बढ़ने लगी थी।

मेरे पिछले बर्थ-डे पर उसने मुझे एक पेंसिल-बॉक्स गिफ्ट किया था। इस साल उसके बर्थ-डे पर मैंने भी उसे एक कलर-बॉक्स गिफ्ट किया था। अब मैं किसे गिफ्ट दंूगी, और किससे गिफ्ट लंूगी…? स्कूल में तो मेरी कोई दूसरी पक्की सहेली भी नहीं है।ह्ण
उसकी बातें सुन कर कलेजा मुंह को आ गया। वाबजूद इस कटु सच्चाई के कि उसकी पक्की सहेली रागिनी परसों से स्कूल नहीं आएगी, शायद वह इससे हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ जाएगी। बिटिया ने भर्राए स्वर ही सही, आगे उसके बारे में खूब सारी बातें की। उसकी पसंदगी-नापसंदगी, उसके खानपान, बात-व्यवहार उसकी आदतों आदि के बारे में विस्तार से बताया।

बातें तो उसने खूब सारी कीं। पता नहीं उनमें क्या-क्या कहा होगा। ठीक से याद नहीं, या शायद मैंने ही ध्यान देना उचित नहीं समझा होगा। कारण कि दिन भर का थका-हारा, घर में बोझिल कदम रखते, हाव-भाव से मुझे थका-मांदा देखते, रात देर होने के कारण या अपनी बातों में मेरी अरुचि को भांपते, अन्यमनस्कता का अंदाजा लगाते, सोफे पर बैठे-बैठे बीच-बीच में मेरी ह्यहां-हंू, ऊं-आंह्ण सुनते या मेरी आंखों में नींद की बोझिलता महसूस करते, जल्द ही चुप हो गई बिटिया भी।
सोफे पर बैठे-बैठे, उसकी बातें सुनते-सुनते उनींदी-सी मेरी आंखें कब लग गर्इं, मुझे इसका तनिक भी आभास नहीं होने पाया। वह तो पत्नी के ह्यखाना लग गया है जी, सो गए क्या?ह्ण दो-तीन बार आवाज देने पर, हड़बड़ाते जगने पर ही जान सका कि उस दिन ढेर सारी बातें बताते-बताते बिटिया भी सो गई थी, वहीं मेरी बगल में सोफे पर, पर कब? यह जान ही नहीं पाया।
कहीं जाग न जाए, बेवजह उसकी सुखद नींद में कोई खलल पैदा न हो। सीने से टिके बिटिया के नन्हे हाथों को आहिस्ता, खुद से परे हटाते, अपनी बगल पड़ी चादर उस पर हल्के ओढ़ाते, गहरी निद्रा में निश्चिंत सोती उस मासूम के चेहरे को देखते, बार-बार सोचता रहा- ह्यअपने जिगरी दोस्त से यों असमय बिछुड़ना, किसी के लिए भी दुखद अहसास तो है ही, तिस पर इतनी छोटी उम्र में आघातिक भी। फिर बचपन के जिगरी दोस्तों, उन संग बिताए गए खट्टे-मीठे पलों, शरारतों, मस्ती, चुहलबाजियों, हंसी-ठट्ठा को भला कभी भूल भी सकता है कोई? समय की शिलापट्ट पर ऐसी यादें तो घरोहर के मानिंद होती हैं, जिनकी याद आते ही बनने लगते हैं, यादों के ढेरों श्वेत-श्याम रंग-बिरंगे से कोलॉज।ह्ण
बचपन के दोस्त तो वे अनमोल हीरे से होते हैं, जो न कभी जंग खाते हैं न उनकी धार कुंद होती है, न उनमें कभी घुन लगते हैं। आश्चर्य नहीं कि कभी तो साथ जीने-मरने की कसमें भी खा लेते हैं। एक तो बिटिया का बाल-मन, तिस पर चेहरे पर उभर आई उदासी। मैं प्रकृतिस्थ नहीं हो पा रहा था।

मन सिहर उठा। क्या-कुछ गुजर रही होगी इस पर! असहायता और बेचारगी का भाव लिए उसका मर्माहत उदास चेहरा देख कर, उसकी व्यथा-कथा का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता था। कहां तो बच्चों की सीधी-सादी, अनदेखी-अनजानी दुनिया, कहां हमारी झंझावात भरी दुनिया! बिटिया के मन की बातें… कुछ समझा, कुछ समझ नहीं पाया।
बहरहाल, मेरे लिए यह कोई खास खबर नहीं थी, पर खास हो गई तब, जब देखा बिटिया के चेहरे की रंगत, जो मायने रखती थी। वाबजूद इसके, रोजमर्रा की मेरी आपाधापियों के बीच। सोचने के क्रम में यहां तक सोच गया कि बिटिया के लिए तो किसी अपने से मिलने-बिछुड़ने का यह पहला अवसर है, जो काम आए आगे शायद उसके आने वाले जीवन में। बढ़ती उम्र के साथ रिश्तों की गर्मजोशी को जानने में। समय के साथ उनमें उपजी मिठास-खटास आदि को समझने-बूझने में, और हर स्थिति-परिस्थिति, देश-काल-परिवेश में जल्द से जल्द खुद को एडजस्ट कर लेने में। बेशक संयोग-वियोग में संभलने-संभालने में भी। जाहिरन, बिटिया की बातों से व्यथित, उस दिन मुझसे भी ठीक से खाना नहीं खाया गया। मेरे मन में अंतर्गुंफित विचारों का अंदाजा पत्नी को सहज ही हो गया। उन्होंने मेरी व्यथा का अंदाजा लगाते सांत्वना दी- ह्यबिटिया की बढ़ती उम्र के साथ हमें भी अपनी आदतें, प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। उसकी अनुपस्थिति में रहने के लिए खुद को तैयार करना होगा। समय के साथ हमें भी ढलना-चलना होगा। खुद को उसके संग, उसी के अनुरूप ढालना होगा। साथ ही उसे भी जीवन की कड़वी, पर ठोस सच्चाइयों को स्वीकार करना सीखाना होगा। जीवन के सामान्य और जटिल पलों के बीच संतुलन बनाना होगा। जीवन में सिर्फ रंग-बिरंगे पहलुओं से नहीं, बाजवक्त स्याह-सफेद पहलुओं से भी दो-चार होना पड़ता है, उसे बताना-समझाना होगा। ताकि जीवन में असमय ही आए, आकस्मिक-भावुक-उपहासमय घड़ियों का वह मजबूती से सामना कर सके, सम्यक समाधान निकाल सके।पत्नी ने शायद ठीक ही कहा था। आखिर अपनों से बिछुड़ने का दर्द उनसे बेहतर कौन बता सकता है? ०

 

 

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