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कहानी: अमलतास खिल गया है

शुभांगी के पिता को व्यापार में बहुत घाटा हुआ था, जिससे उन्हें शराब की लत लग गई थी या शराब के कारण व्यापार खत्म हुआ कौन जाने ,लेकिन वह इतनी शराब पी लेते थे कि उन्हें होश ही नहीं रहता था कि वे कहां हैं। वीणा शर्मा की कहानी।

Author Updated: September 18, 2016 1:25 AM
सुनयना और शुभांगी कहने के लिए उस घर की थीं, वरना उनका खाना-पीना, सोना-जागना हमारे ही घर हुआ करता था।

वीणा शर्मा

आज वह मेरे सामने एक इवेंट मैनेजर के रूप में बैठी थी। गोलमटोल-सी, लेकिन बेहद सुंदर। उसकी बादामी आंखें किसी को भी आकर्षित करने वाली थीं। उनमें काजल की मोटी रेखा सौंदर्य बढ़ा रही थी। गुलाब की पंखुड़ियों से पतले होंठ, उसी प्रकार चेहरे को सुघड़ रूप देती छोटी-सी नाक, गेहुंआ रंग और कंधों तक कटे हुए बाल। गुलाबी सूट में वह कोई प्यारा-सा टेडी बियर लग रही थी। पतली-दुबली छरहरी-सी वह इस अवस्था तक कैसे पहुंची। दस साल बाद देख रही थी उसे। और वह मुस्कुराए जा रही थी। पूछ रही थी- दी बहुत मोटी हो गई हूं न मैं? कल जब उससे फोन पर बात हुई तो भी यही कह रही थी- दी मैं बहुत मोटी हो गई हूं, आप मुझे पहचान ही नहीं पाओगे। जब मैं स्कूल जाती थी तब वह पैदा हुई थी। जब मैंने कॉलेज जाना शुरू किया तब वह स्कूल में पढ़ रही थी। मैं यूनिवर्सिटी जाने लगी, लेकिन उसे कॉलेज जाना नसीब नहीं हुआ। अभी तक उसके जीवन के दुखों को दूर से ही जानती थी।

अब मैं चाहती थी कि वह अपनी पीड़ा की गांठें खोल दे, लेकिन अब वह बचपन वाली मासूम शुभी नहीं थी, जो हर छोटी-सी चोट को बड़ा बनाते हुए सामने आकर खड़ी हो जाती और सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना उसकी आदत बन गई थी।… अब मैं उसके जख्मों को कुरेदना भी नहीं चाहती थी। जिस पीड़ा से वह गुजर कर आई है, अब शायद उसे वह किसी के सामने न दोहराना चाहती हो। दूसरे, तबसे अब तक दस सालों का फासला है, जो कुछ ही पलों में तय नहीं हो सकता। अब वह अपनी क्षमताओं के दर्प से दमकती एक स्वाभिमानिनी थी और मैं नहीं चाहती थी कि उसका स्वाभिमान रत्ती भर भी आहत हो।  उसका बचपन हमारे ही घर में बीता था। बचपन में हमारे घर पास-पास थे। दोनों घरों की छतें मिली हुई थीं। वह भाभी के पास रसोई में चली गई, ताकि नाश्ते में उनका हाथ बंटा सके और मैं अतीत में बहुत पीछे जाने लगी थी। उसका शुभांगी नाम मेरे माता-पिता ने रखा था। शुभांगी का घर हमसे तीन घर छोड़ कर था। कुल तीन भाई-बहन और माता-पिता का बड़ा सुखी परिवार था। तीन-चार घरों के बीच वे दोनों बहनें- सुनयना और शुभांगी- सबसे छोटी थीं, इसलिए दोनों को प्यार करने वाले बहुत से लोग थे। उस समय पड़ोसियों के संबंधों में इतनी नीरसता नहीं थी। होली, दीवाली, तीज यहां तक कि करवाचौथ पर भी घर में जो भी बनता वह कम से कम पांच घरों कर तो साझा होता ही था। कभी-कभी इससे अधिक भी। कंजक तो एक अलग ही छटा वाला त्योहार हुआ करता था। आपसी सौहार्द और गहरे विश्वास के दिन हुआ करते थे।

सुनयना और शुभांगी कहने के लिए उस घर की थीं, वरना उनका खाना-पीना, सोना-जागना हमारे ही घर हुआ करता था। हमारी मम्मी ही उनकी मम्मी थी। सुनयना तो कई बार रात को नींद से उठ कर हमारा दरवाजा खटखटाने लगती और तब तक मम्मी-मम्मी चिल्लाती हुई रोती रहती, जब तक दरवाजा खुल नहीं जाता और वह मम्मी से लिपट कर सो नहीं जाती। ऐसा उसके माता-पिता को भी पता था और मेरे माता-पिता भी उनके प्रेम से निहाल थे। कोई उलाहना नहीं, क्योंकि प्रेम ही मुख्य था। सुनयना की देखा-देखी शुभांगी ने भी वैसे ही करना शुरू कर दिया था। हम मां को मजाक में कहते थे कि आपने शहद चटाया था इसीलिए आपके पीछे लगी रहती हैं, लेकिन दोनों से प्रेम तो हम भी करते थे।शुभांगी जब ग्यारहवीं में थी तभी हम लोग वहां से दूसरी जगह चले गए थे। मैं अपनी पढ़ाई समाप्त करके नौकरी कर रही थी। एक तो स्थान की दूरी, दूसरे दोनों परिवारों में बचपन वाली वैसी निकटता अब नहीं रही थी। कभी-कभी बाजार में मुलाकात हो जाती थी। ऐसे ही एक दिन पता चला कि सुनयना ने अपनी मौसी की रिश्तेदारी में किसी लड़के से विवाह कर लिया था। उसके भाई का विवाह पहले ही हो गया था। उसकी पत्नी कुछ तेज स्वभाव की हैं, ऐसा सुनने में आता था। कभी-कभी बहू और ससुर की नोंक-झोंक आसपास के घरों में सुनाई दे जाती थी। एक बार किसी ने बताया कि दोनों की हाथापाई भी हो गई। शुभांगी की मां ने छुड़ाने की कोशिश की तो उन्हें भी चोट लग गई। मेरी मां ने एक दिन कुसुम, जो शुभांगी की भाभी का नाम था, को बहुत समझाया लेकिन उसके अपने तर्क थे।

दरअसल, शुभांगी के पिता को व्यापार में बहुत घाटा हुआ था, जिससे उन्हें शराब की लत लग गई थी या शराब के कारण व्यापार खत्म हुआ कौन जाने ,लेकिन वह इतनी शराब पी लेते थे कि उन्हें होश ही नहीं रहता था कि वे कहां हैं। इस तूफान में जिसे सबसे अधिक चोटें आर्इं, वह शुभांगी थी। पढ़ाई छोड़ कर उसे भी काम की तलाश में निकलना पड़ा। घर में सबसे अधिक उपेक्षा की शिकार उसी को होना पड़ा। अब उस तरह से एक-दूसरे के घरों में आना-जाना नहीं रह गया था। शुभांगी से भी कभी-कभी ही मुलाकात होती थी। फिर एक दिन खबर आई कि शुभांगी के पिता का निधन हो गया। यहीं से शुभांगी की मुश्किलें बढ़नी शुरू हो गई थीं। एक दिन वह मुझे रास्ते में मिल गई थी। मैंने ही उसे आवाज लगाई- ‘शुभांगी कहां से आ रही हो? तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?’ मेरे सवाल से वह थोड़ा सकपका गई और कहा- ‘दी पढ़ाई तो मैंने छोड़ दी। अभी पार्लर से आ रही हूं, मैं वहां नौकरी करती हूं। आपको तो पता है, पापाजी के बाद भाजी (भैया) के ऊपर ही सारे घर की जिम्मेदारी है, इसलिए मैं अब स्कूल नहीं जा सकती, लेकिन पेपर जरूर दूंगी। मैंने स्कूल में बात कर ली है।’ उसने एक ही बार में मुझे सारी बातें बता दी। उस समय हम लोग सड़क पर खड़े थे। विस्तार से बात करना संभव भी नहीं था। मैंने कहा, ठीक है शुभांगी किसी दिन घर आना, बैठ कर बात करेंगे। लेकिन वह दिन न तो शुभांगी और न ही मैं ला पाई कभी।उन दिनों शुभी आर्थिक और मानसिक संकट झेल रही थी। मैं चाह कर भी उस परिदृश्य से परिचित नहीं थी। स्त्री का अपना कोई घर नहीं होता, इस पीड़ा को शुभी बड़ी शिद्दत से महसूस कर रही थी। लेकिन आज उसके पास एक खूबसूरत घर है, उसके अपने नाम से जगमगाता घर। मैं सोच रही थी उसके बारे में। अपने ही घर वालों से सुनी हुई बातें। अब तक मेरा उससे संपर्क केवल सूचनाओं तक सीमित था।

एक दिन मां ने बताया कि आज शुभांगी आई थी, यह बताने कि अब वह अपने घर में नहीं रहना चाहती, क्योंकि भाभी ने उसका घर में रहना दूभर कर दिया है। भाभी हर वक्त भाई के कान भरती रहती है और घर में रोज लड़ाई होती है। उसे एक ऐसा परिवार मिल गया है, जो उसे गोद लेना चाहता है। मुझे यह सुन कर बड़ा अटपटा लगा। शुभांगी ऐसी मूर्खता कैसे कर सकती है। मगर पता चला कि शुभी की मां को भी कोई एतराज नहीं है। हालांकि वह ऐसा नहीं कर पाई थी, कारण जो भी रहे हों। मुझे लगा कि शुभी विपरीत परिस्थितियों में शायद अपने लिए रास्ता निकाल ही लेगी। पिता नहीं तो मां तो है। लेकिन शुभी ने तो रिश्तों में धोखा खाया था, घर में भी और बाहर वालों से भी। शुभी की मां शायद पति की मृत्यु के बाद असुरक्षा से घिर गई थीं। अपने बेटे और बहू को वे अच्छी तरह जानती थीं। घर में बहू का एकाधिकार था। बेटे-बहू का विरोध उन्हें घर-बाहर करवा सकती थी। वे एक परंपरावादी औरत थीं। वे बेटे और बेटी में अपनी बेटी को चुन सकती थीं, लेकिन वे अपनी बेटी की क्षमताओं के प्रति शायद अनजान थीं, तभी बेटी के दुख को वे जान नहीं पार्इं। दूसरे, वे सोच भी नहीं पाई होंगी कि शुभी कोई ऐसा कदम भी उठा लेगी।

खाना खाकर बैठे तो मैं शुभांगी के दोनों हाथों को अपने हाथों में लेकर बैठ गई, बिल्कुल उसी तरह जैसे बचपन में बैठा करती थी। अब शुभी का दर्द बह रहा था शब्दों से और आंखों से भी। ‘दी ऐसा लगता है जैसे एक जीवन जीकर आ चुकी हूं। पापाजी के जाने के बाद भाभी ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया था। सुबह पार्लर के लिए निकलती, तो रात को ट्यूशन पढ़ कर लौटती। लेकिन भाभी मुझे घर में देखना ही नहीं चाहती थीं। हर रोज किसी न किसी बात पर बहस होती और मुझे नीचा दिखाया जाता। मुझे लगता ही नहीं था कि मैं अपने घर में रह रही हूं। मुझसे दस साल बड़ा भाई मेरे प्रति ऐसी नफरत का भाव रखता है, यह सोच कर मुझे खौफ होता था। मैं बाहर यह बात किसी को बता भी नहीं सकती थी।… वह मेरी सबसे अच्छी मित्र का घर था, जहां मुझे पूरा सुकून मिलता था। परिवार के सभी लोग मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करते थे। राखी का त्योहार मेरे बिना अधूरा होता था। हां, अब मैं जान गई हूं कि मैंने बहुत गलतियां की हैं, जो मुझे नहीं करनी चाहिए थी।’ यह कह कर वह चुप हो गई।

किसी की बात याद आई कि आंखें जितनी भी सुंदर हों, वे आंसुओं के लिए ही बनी हैं। वह कितनी देर तक अपनी आंखों के ग्लेशियर पिघलाती रही और मैं उनके थमने की प्रतीक्षा में बैठी रही। उसने आंखों के कोटरों से छलकते प्रवाह को समेटा, तो कश्मीरी सेब की तरह सुर्ख हो सुलग उठी और बोली- ‘जतिन, वह मेरी मित्र का कजिन था और मेरी ही तरह उसका भी उस घर में आना-जाना था। हालांकि उस परिवार के सामने वह कभी मुझसे बात नहीं करता था। लेकिन हम बाहर मिलते थे। ऐसा दो साल तक चलता रहा। मैं अपने पेपर भी नहीं दे पाई। फिर एक दिन भाभी ने न जाने क्या षड्यंत्र किया कि मेरे घर पहुंचते ही भाई ने मुझे डांटने के साथ मारना शुरू कर दिया। मैं हैरान थी, ग्यारह साल बड़े भाई को जहां पिता बन कर संरक्षण देना चाहिए था, वह मुझे जूतों से पीट रहा था।’‘शुभी, क्या मां ने नहीं रोका।’ मैंने बामुश्किल स्वयं को नियंत्रित करते हुए पूछा।

‘रोका था दी, बहुत रोका, लेकिन मां यही चाहती थी कि मैं भाई से माफी मांग कर घर बैठ जाऊं और जहां वे कहें वहीं चुपचाप शादी कर लूं। उस रात मैंने वह घर छोड़ दिया था जतिन के साथ।’ जतिन का नाम लेकर वह फिर कुछ समय के लिए खामोश हो गई। कुछ देर बाद बोली- ‘हमने दिल्ली जाकर शादी कर ली। लेकिन रिश्ते प्रेम से बनते हैं मजबूरी में नहीं। तीन महीने के गर्भ के दौरान मुझे पता चला कि जतिन पहले से शादीशुदा है। मैं अवसाद की अवस्था में एक दिन सीढ़ियों से गिर गई। मिसकैरेज के बाद की परेशानियों के कारण मुझे तीन महीने अस्पताल में गुजारने पड़े। जतिन अपने अपराधबोध के कारण अस्पताल का खर्च उठाता रहा। उस अधकचे शरीर में मुझे बीमारियां मिलीं, जिनमें से कुछ आज भी मेरे साथ हैं। यह कमर चौबीस से चालीस हो गई।’ यह कह कर वह मस्कुराई। फिर बोली- ‘दी उस समय मैं मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से कमजोर थी। कुछ दिन मैंने वहीं गुजारे, पार्लर की नौकरी की। सुनयना दी जोर देकर मुझे अपने यहां ले आर्इं और अपनी रिश्तेदारी में मेरा विवाह करवा दिया। उस समय मुझे परिवार के आश्रय की जरूरत भी थी।’
मैंने पूछा- ‘और जतिन?’

वह पीड़ा में मस्कुरा कर बोली- ‘दी यहां हर दूसरा व्यक्ति जतिन है। इस दूसरे रिश्ते को भी मैंने बहुत समय दिया। उस घर में मुझे किसी ने आज तक स्वीकार नहीं किया है, दी। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन जबरन बिठाई गई चीजें कभी न कभी उखड़ ही जाती हैं। मेरे पति दुबई में रहते हैं और कौन जाने मेरे पति का भी वहां अपना पहले से कोई परिवार हो। इसलिए मैं यहां आ गई। यहां मैंने अपना घर खरीदा है। छह महीने या साल में मेरे पति कभी आते हैं, तो मैं वहां चली जाती हूं। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। पहले मैं उनके प्रति पूरी समर्पित थी, लेकिन अब मैंने स्वयं के लिए जीना सीख लिया है। बड़े-बड़े होटलों ओर मॉल्स में इवेंट मैनेजिंग और साज-सज्जा का काम देखती हूं। कई बार दो दिन में पूरे महीने जितनी कमाई हो जाती है। खाली समय सारा अपाहिज और मानसिक रोगियों की सेवा में बिता देती हूं। योगा करती हूं, साधना में बैठती हूं।’इस बार मैंने उसे कुछ पूछने के लिए रोका नहीं। उसके चेहरे का नूर लौट आया था। अब मुझे उसमें बचपन वाली शुभी दिखाई देने लगी थी और मैं उसे वैसे ही चहकते हुए देख रही थी। बाहर अमलतास अपनी भरपूर सुनहरी आभा में दहक रहा था। सूरज की रोशनी में दिपदिपाता, बिल्कुल शुभी की तरह। ०

 

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