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कहानी- आश्रुधारा

चाची का खत आया है। लिखा है- मैं ठीक हूं और यहां सब ठीक-ठाक है।

Author April 9, 2017 5:55 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

सुरेश शॉ

चाची का खत आया है। लिखा है- मैं ठीक हूं और
यहां सब ठीक-ठाक है।
वहां क्या खाक ठीक होगा! जो स्त्री निस्संतान हो और
आजीवन पल-पल बांझ होने के व्यंग्यात्मक शब्दवाण से
भेदी जाती हो, वह भला ठीक कैसे हो सकती है? ये मात्र
जताने के शब्द हैं।
लेकिन चाची सिर्फ जताती हैं, ऐसा भी नहीं है। वह
जताने से कहीं अधिक सहती हैं। उन्हें सहना पड़ता है।
भगवान ने न उन्हें संतान दी, न सेहत। वह दोनों की वेदना
को सहती हैं या कहें जहान के दर्द को बर्दाश्त करती हैं,
क्योंकि उन्हें बर्दाश्त करना पड़ता है। पर हां, भगवान ने उन्हें
प्रचुर मात्रा में सहने की शक्ति जरूर दी है।
चाची तब तेरह-चौदह वर्ष की रही होंगी, जब उनका
ब्याह हुआ था। अब सत्तर पार कर चुकी हैं। चाचा उनसे
चौदह-पंद्रह साल बड़े हैं। चाची, चाचा की दूसरी ब्याहता
हैं। उनकी बड़ी बहन से चाचा का पहला ब्याह हुआ था।
अचानक उनकी मौत हो गई। तब चाची की विधवा मां ने
किसी प्रकार चाचा को इसके लिए राजी करवा लिया। चाची
की बड़ी बहन को बच्चा होना था। प्रसव-पीड़ा के साथसाथ्
ा नाना प्रकार के स्त्री-रोगों ने उन्हें घेर लिया था, जिसका
नतीजा यह हुआ कि न बच्चा बच सका न जच्चा।
बच्चा गर्भावस्था में ही पीलिया का शिकार हो गया
था। वह संसार की रोशनी तक नहीं देख पाया। तब गांव
में दाई के सहारे बच्चा जना जाता था। मंगरी फुआ अपने
इस प्रोफेशन में एक्सपर्ट अवश्य थीं, पर वह चाची की
बहन के पेट में मरे हुए बच्चे को बाहर न निकाल पार्इं।
नतीजतन, बच्चा और जच्चा, दोनों की मौत हो गई।
चाचा और उनके घर वालों के लिए यह बहुत बुरा
हुआ। उनकी मां के तो दांत पर दांत लगने लगे थे।
बहू को याद कर वे जब-तब मचल जातीं और बच्चे
की कल्पना भर से पछाड़ें खाकर गिर पड़तीं। उनकी
असंख्य कल्पनाएं धरी की धरी रह गई थीं और
अगणित आशाएं कोसों दूर भाग गई थीं। चाचा से मां
का यह हाल देखा न जाता था।
चाचा को अपनी मां का खयाल रखना पड़ा। समय
के थोड़े ही अंतराल पर स्थिति देख कर चाचा की सास
ने उन्हें समझाया- ‘दैव की यही मरजी थी, अब आगे तो
जीना ही पड़ेगा न!’ इसके बाद उन्होंने अपनी छोटी बेटी
का हाथ उनके हाथ में पकड़ा दिया। चाचा को अपनी मां
की उम्मीदों का ध्यान आया और उन्होंने हां कर दिया।
झटपट पंडितजी को बुलाया गया, सिंदूरदान हुआ और
बैलगाड़ी में बैठ कर चाची रुखसत हुर्इं।
तबसे लेकर अब तक ससुराल की चौखट ही चाची
का घर-द्वार है। बेटी मायके से विदा हो गई, पराई हो गई;
उसका अन्न-जल वहां से उठ गया, वह किसी और की
अमानत हो गई। लेकिन चाची, सास की दुलारी बन गर्इं।
बहू का रिश्ता और बेटी का नाता एक साथ जुड़ ग्या। एक
बहू ने अभी-अभी चाची की सास को छला था, ममता के
बंधनों को तोड़ कर सांसारिक सरोकारों को छिन्न-भिन्न कर
दिया था, उस रिक्तता को चाची ने हंसी-खुशी के साथ भर
दिया। उम्र से वह अभी कच्ची थी, इसलिए चाची को
उनकी सास ने बेटी मान लिया। पर इस कच्ची उम्र की
‘बहू-बेटी’ ने अपनी सास को न तो दादी बना पाई, न
नानी। फिर भी चाची की सास ने कभी उन पर अपना प्रेम
कम न होने दिया। कभी तंज भी नहीं कसा।
नीम-हकीम, डॉक्टर-वैद्य, ओझा-गुनी, मौलवी-
फकीर और बलि-बलिदान सभी ने उनका आजमाइशी
इलाज किया। पर सब व्यर्थ रहा, बिल्कुल निरर्थक।
उनकी सास उदास रहने पर भी उन्हें इस बाबत कुछ नहीं
कहतीं। खानदानी बहू-बेटियां हर वय में अपने सद्गुणों
को बनाए रखती हैं। यही तो ‘रॉयल ब्लड’ कहलाता है
और शायद इसीलिए शादी-ब्याह में कुल-
खानदान के बारे में देखा-सुना जाता है और
बहुत कुछ पूछताछ की जाती है। पहले के
राजा-महाराजाओं का शारीरिक संबंध
अनेक स्त्रियों के साथ रहने पर भी
उन सबकी संतानों को राजकुंअर
मान कर राज्याभिषेक नहीं कर
दिया जाता था। अलबत्ता,
राजकुमार तो महारानी का बेटा ही बनता था।
चाची भी एक खानदानी लड़की थीं। उन्होंने हमेशा
मायके और सासुराल की मान-मर्यादा का मान रखा। कभी
ऐसा कुछ नहीं किया या होने दिया, जिससे इन दोनों परिवारों
की जग-हंसाई हो।
मन की एक पीड़ा, किंतु सदा उन्हें उस फोड़े की तरह
टीसती रही; जो पूरी तरह पक चुकने पर भी मुंह न बनने
और फूटने की स्थिति में उसका मवाद उसी में जमा पड़ा
था और जब-तब टिसटिसाता रहता था।
उनकी यह पीड़ा, सास और पति को खुश रखने का
खिलौना, यानी वंश चलाने का उत्तराधिकारी न देने की थी।
घरवालों के कुछ न कहने पर भी टोले-मुहल्ले और समाज
के लोग भला कब समझदारी से काम लेने और चुप रहने
वाले थे! लोगों को तो बस कुछ दिखने भर की देर होती
है, फिर तो न जाने उन्हें कितनी रायें, कितने विचार, कितने
बहाने और कितने स्वांग सूझने लगते हैं। हम कहते हैं कि
गरम चाय प्याली में ही तो है, पर प्याली ने गरम चाय की
तासीर को किस सेंटीग्रेड तक सहा है, यह तो प्याली ही
अनुभव कर सकती है। फिर दूसरे उसमें क्यों घुस पड़ते हैं!
सुधाकर, चाची के श्वसुर के भाई के बड़े बेटे, यानी
उनके जेठ का बेटा है। वह तब डेढ़-दो साल का होगा,
जब चाची ब्याह कर ससुराल आई थीं। सुधाकर का रोना-
मचलना, हंसना-खेलना, चलना-फिरना और दूसरे बाल
सुलभ क्रिया-कलाप करना चाची को अच्छे लगते थे।
इसलिए वह दिन-दिन भर उसके ही कामों में
व्यस्त रहतीं। संयुक्त परिवार के बड़े आंगन
में जहां कई औरतें थीं, वहीं कई बच्चे भी
थे। पर उनमें से सुधाकर उनकी आंखों
का तारा बन चुका था। सुधाकर की
मां और चाची में बनती भी खूब
थी। उनके हर काम में चाची
मददगार साबित होती थीं।
धीरे-धीरे रिश्ते की मजबूत डोर बंध जाने पर चाची
ने यही समझ लिया कि चलो ‘सुधाकर ही मेरी संतान है।’
पर लोगों को इसका प्रमाण चाहिए था और वह भी इस
आधुनिक जमाने में यह प्रमाण कोरे कागज पर स्याही से
लिखा हुआ होना चाहिए था। इसलिए चाची के कहने पर
चाचा ने अपने बड़े भाई से सुधाकर को गोद लेने की
इजाजत मांगी। पर उन्होंने चाचा को समझाते हुए कहा‘सु
धाकर और तुम्हारा रिश्ता खून-खानदान का ही तो है।
वह तुम्हारा भतीजा भी है और तुम्हारा बेटा भी; फिर यह
गोद-वोद लेने-देने की बात कहां से आई तुम्हारे दिमाग में!’
इससे चाचा थोड़ा नाराज भी हुए, थोड़ा दुखी भी। पर
चाची पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। वह अपने
जेठजी की यह बात सुन कर बहुत खुश हुर्इं कि सुधाकर
उनका भतीजा भी है और बेटा भी और उनका, रिश्ता खून-
खानदान का रिश्ता है। इससे बड़ा और किस प्रमाण की
बात सोची जाए! चाची के लिए सुधाकर के पिता द्वारा दिया
गया यह सर्टिफिकेट ही सबसे बड़ा और कभी मलिन न
पड़ने वाला प्रमाण-पत्र था।
बच्चा हमेशा प्रेम और संगति चाहता है। सुधाकर पर
चाची का प्रेम तो जैसे अतिवृष्टि की तरह था। और संगति,
वह तो दोनों के संबंधों को जन्म-जन्मांतर तक खींच ले
जाने वाली बन गई थी।
जैसे-जैसे सुधाकर बड़ा होता गया, चाची की गोद
में पलता गया। अब वह अपनी मां का नहीं, चाची का
बेटा था। चाची भी अब जब कभी अपने पति को बुलातीं
या किसी प्रसंग को कहीं से जोड़तीं, तो इन सबकी
शुरुआत ‘सुधाकर’ से ही करतीं। जैसे सुधाकर के चाचा
को बुलाना है, या इस बारे में सुधाकर के चाचा से विचार
करना होगा आदि-आदि।
गांव की स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद जब शहर
भेज कर सुधाकर को पढ़ाने की बात आई, तो चाची ने
इसका जोरदार समर्थन ही नहीं किया, बल्कि झट पैसे भी
निकाल कर दे दिए। वह जानती थीं कि एक ही तो बेटा
है, पढ़ा-लिखा कर बड़ा आदमी उसे ही बनाना है।
सुधाकर ने चाची को कभी मां कह कर संबोधित तो
नहीं किया, बल्कि वह उन्हें हमेशा चाची ही कहता आया
है। पर वह जानता है कि दादी और मां के जिंदा रहते या
उनके गुजर जाने के बाद चाची ही उसकी मां हैं। कृष्ण
और याशोदा का कौटुंबिक संबंध-सा ही है चाची और
सुधाकर का संबंध-सरोकार।
धीरे-धीरे सुधाकर पढ़-लिख कर रांची के किसी
महाविद्यालय का प्राध्यापक बन गया। वह भौतिक
शास्त्र पढ़ाता है। उसने दुनिया को सामाजिक और
वैज्ञानिक, दोनों ही नजरों से देखा है। इसलिए वह अब
कुछ-कुछ भौतिक ही बनता गया है।
उसी महाविद्यालय के प्राचार्य सुंदर लाल की
इकलौती बेटी से उसका विवाह जबसे हुआ है, वह
अपने गांव और गांव के लोगों को भूलने की भयंकर
भूल करता रहा है। बावजूद इसके, वह चाची को कभी
नहीं भूला। फिर भी चाची ठहरीं गांव की औरत। हां,
एकाध बार वह रांची जरूर आर्इं, पर सुधाकर की पत्नी
को उनका आना अच्छा नहीं लगता था।
चाची को फैशन करना लज्जास्पद लगता है। पैरों
को समेट कर बैठना, घंटों दूरर्दशन के परदे को थिरकते
और कांपते देखना उन्हें कुछ अजीब लगने पर भी
मनभावन लगता है। उस पर रामायण-महाभारत या दूसरे
धार्मिक सीरियल जब प्रसारित होते हैं तो चाची जैसे
पूजा पर बैठ जाती हैं। साधना में लीन हो जाती हैं। मौन
भंग न होने वाली तपस्या में खो जाती हैं। और तब
सुधाकर की पत्नी चिड़चिड़ा उठती है।
वह चाची से आधुनिक चाल-चलन की उम्मीद
करती है। वह खुद जैसी है, वैसा घर के दूसरे लोगों को
बनाना चाहती है। चाची सोचती हैं- एक तरह से यह ठीक
ही है। इसलिए वह सुधाकर की पत्नी को कभी दुखी या
नाराज नहीं करतीं।
चाची खुद भी गांव में रहना ज्यादा सहज महसूस
करती हैं। उन्हें न सुधाकर से गिला है, न उसकी बीवी से
कोई शिकवा। इसके लिए दुनिया-जहान से भी उन्हें कोई
शिकायत नहीं है। चाचा और चाची शहर से दूर अपनी
मातृभूमि की सेवा करते हैं। वे अलसुबह खेत में पहुंच जाते
हैं। जीतोड़ मेहनत करते हैं। वे हर मौसम के प्रसाद को खुले
मन से ग्रहण करते हैं। गांव का भला चाहने वाले चाचा
हैं, विश्व का कल्याण चाहने वाली चाची हैं। वह प्रकृति
के आंगन में बैठी-बैठी सुधाकर को देखने के लिए राह
तकती रहती हैं। सुधाकर पर उनका कोई जोर नहीं चलता,
नहीं तो… वह उसे…! फिर भी वह नहीं चाहतीं कि
सुधाकार उनके लिए चिंतित रहे या अपनी पत्नी और बच्चों
को छोड़ कर उनके पास आकर रहने लगे। इसलिए वह
जब-तब चाचा से खत लिखवा दिया करती हैं। और इन
खतों में हर बार यही लिखा होता है- ‘मैं ठीक हूं और यहां
सब ठीक-ठाक है।’
पर इतना लिख-लिखा देने भर से क्या होने वाला!
उनकी बूढ़ी आंखें सदा किसी अतृप्त तृष्णा का शिकार
बनी रहती हैं और इन्हीं आंखों की कोरों से आंसुओं की
धारा अनवरत बहती चली जाती है। 
अश्रुधारा
चित्र: नरेंद्रपाल सिंह
कहानी
सुरेश शॉ
चित्र: नरेंद्रपाल सिंह
चित्र: नरेंद्रपाल सिंह
जैसे-जैसे सुधाकर बड़ा होता गया, चाची की गोद में पलता गया। अब वह अपनी मां का नहीं, चाची का
बेटा था। चाची भी अब जब कभी अपने पति को बुलातीं या किसी प्रसंग को कहीं से जोड़तीं, तो इन
सबकी शुरुआत ‘सुधाकर’ से ही करतीं। जैसे सुधाकर के चाचा को बुलाना है, या इस बारे में सुधाकर
के चाचा से विचार करना होगा आदि-आदि।
सुदामा की गरीबी में दंश नहीं है। लोभ नहीं है। अमर्ष नहीं है।
केवल जीवन के प्रति अकुंठ आस्था है। कोदो-सांवा का भात
भी भरपेट मिल जाय तो दूध-दही और मिष्ठान्न की लिप्सा नहीं
है। उनकी गरीबी लोलुप नहीं है। उनके घर में जो गरीबी है,
उसके प्रति उनके मन में, दुत्कार नहीं है। जुगुप्सा नहीं है।
सहिष्णुता का अभाव नहीं है।

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