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भाषा- सिकुड़ती मातृभाषाएं

जब तक लोगों के पास पैसा नहीं आता, वे मलयालम माध्यम के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन जैसे ही पैसा आता है, सब अपने बच्चों को अंगरेजी पढ़ाना चाहते हैं। क्योंकि यहां अधिकतर लोग अपने बच्चों को विदेश भेजना चाहते हैं और विदेश जाने के लिए अंगरेजी आना जरूरी है।

Author November 26, 2017 1:47 AM
Hindi Diwas Speech: इस चित्र का प्रयोग प्रतीक के तौर पर किया गया है।

पिछले दिनों केरल जाना हुआ। वहां की दुकानों पर लगे बोर्ड और होर्डिंग्स देख कर हैरानी हुई। अधिकतर दुकानों, दफ्तरों, जगहों के नाम दिल्ली की तरह ही अंगरेजी में लिखे थे। मलयालम में कभी-कभार ही कोई बोर्ड लगा दिखता था। हमें लेने आर्इं हमारी मित्र स्थानीय सरकारी कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं। जब उनसे पूछा कि यहां सब जगह मलयालम की जगह अंगरेजी क्यों दिखाई दे रही है? तो उन्होंने बताया कि जब तक लोगों के पास पैसा नहीं आता, वे मलयालम माध्यम के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन जैसे ही पैसा आता है, सब अपने बच्चों को अंगरेजी पढ़ाना चाहते हैं। क्योंकि यहां अधिकतर लोग अपने बच्चों को विदेश भेजना चाहते हैं और विदेश जाने के लिए अंगरेजी आना जरूरी है।

शायद यही कारण है कि केरल सरकार ने अब सभी स्कूलों में दसवीं तक मलयालम पढ़ाना अनिवार्य कर दिया है। क्योंकि सरकार को शिकायतें मिल रही थीं कि केरल के कई स्कूलों में मलयालम पढ़ाई ही नहीं जाती और मलयालम बोलने पर भी पाबंदी है। हिंदी क्षेत्रों से भी ऐसी खबरें अकसर आती रहती हैं।
केरल में मध्यवर्ग के लोग जहां भारत के अन्य शहरों में जाकर शिक्षा प्राप्त करते हैं, ताकि विदेश जा सकें, वहीं गरीब लोग भी जल्दी से जल्दी विदेश जाना चाहते हैं, क्योंकि विदेश में अगर मजदूरी भी करें, तो भारत से ज्यादा अच्छे पैसे मिलते हैं। इसलिए वे मौका मिलते ही अंगरेजी सीखना चाहते हैं। यही कारण है कि इन दिनों बंगाल और असम से बड़ी संख्या में यहां लोग काम करने आते हैं, क्योंकि अब यहां स्थानीय मजदूर और छोटे-मोटे काम करने वाले मुश्किल से मिलते हैं। यह सूचना भी दिलचस्प है कि चूंकि बंगाल और असम के लोगों को मलयालम नहीं आती, तो वे हिंदी बोलते हैं।  तिरुअनंतपुरम में कॉलेज, यूनिवर्सिटी, दफ्तरों से लेकर दुकानों तक में सब आपस में मलयालम में बातें करते हैं। हिंदीभाषी प्रदेशों की तरह नहीं है कि जैसे ही यहां कोई बड़े पद पर पहुंचता है, वह हिंदी की जगह अंगरेजी बोलना पसंद करता है!

केरल में स्थानीय लोगों को अपनी भाषा से बहुत प्यार है, लेकिन उन्हें लगता है कि मातृभाषा से प्यार अलग बात है, लेकिन नौकरी और रोजगार के परिदृश्य का क्या करें कि अंगरेजी जाने बिना नौकरी नहीं मिलती। केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद सरकार ने हिंदी को दूसरी भाषा का दर्जा दिया था। वहां अनेक सरकारी संस्थानों पर मलयालम के बाद हिंदी लिखी भी दिखाई देती है। हिंदी को लेकर वैसा विरोध दिखाई नहीं देता जैसा कि तमिलनाडु या हाल ही के दिनों में कर्नाटक में देखा गया।  आखिर हमारी मातृभाषाओं को ऐसा क्यों बना दिया गया कि उनमें रोजगार नहीं मिल सकता। उन्हें पढ़ कर जीवन यापन नहीं किया जा सकता। दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसा नहीं कमाया जा सकता। एक विदेशी भाषा को हर भारतीय के लिए इतना जरूरी कैसे बना दिया गया! इसमें हमारी नीतियों की ही तो नाकामी है कि अपनी समृद्ध भाषाओं को छोड़ कर हम अंगरेजी का झंडा फहरा रहे हैं। अंगरेजी सीखना, जानना कोई बुरी बात नहीं, मगर सिर्फ अंगरेजी सफलता की पहचान है, इस सोच का क्या करें। दिल्ली या उसके आसपास बढ़ते अंगरेजी के वर्चस्व को देख कर हम लोग यही सोचते रहे हैं कि शायद अपने देश के अन्य राज्यों में ऐसा नहीं होगा। मगर ऐसा लगता है कि अंगरेजी ने हमारे मन और जीवन में इतनी जगह बना ली है कि हमारी अपनी भाषाएं खदेड़ी जा रही हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

केरल सरकार की यह कोशिश अच्छी है कि दसवीं और हायर सेकेंड्री तक बच्चे मलयालम जरूर पढ़ें, लेकिन अगर आगे चल कर उन्हें इस भाषा से कोई रोजगार न मिले तो क्या फायदा। आखिर ऐसा कैसे किया जाए कि मातृभाषाएं जो रात-दिन अंगरेजी से पिछड़ रही हैं, उन्हें उनका सही स्थान मिले। उन्हें सिर्फ पढ़ने के लिए न पढ़ाया जाए, बल्कि रोजी-रोटी से भी जोड़ा जाए। मातृभाषा जानना कोई अपराध या किसी और के मुकाबले पिछड़ेपन की निशानी न माना जाए। बंगाल सरकार ने भी बांग्ला को अनिवार्य बनाने की बात कही है। लेकिन कोई भी भाषा समाज में तभी बढ़ती है, जब वह हमारे पेट भरने और रोजगार देने का साधन बनती है। कैसे लोगों के मन में यह धारणा पक्की कर दी गई है कि अंगरेजी नहीं जानोगे तो कभी आगे नहीं बढ़ सकोगे।

यूरोप के बहुत से देश ऐसे हैं, जो अपना हर काम अपनी ही भाषा में करते हैं। यहां तक कि चीजों पर दाम भी उसी भाषा में लिखे रहते हैं। वहां अंगरेजी का कोई दबदबा दिखाई नहीं देता। न कोई अंगरेजी के सामने अपनी भाषा को छोटा करना बर्दाश्त करता है, न ही अंगरेजी न जानने पर आपको छोटा किया जाता है। एक तरफ हम अंगरेजों से अपने लंबे संघर्ष की गाथा कहते नहीं थकते, दूसरी तरफ उनकी भाषा के प्रति जीवन के हर क्षेत्र में इतना लगाव दिखाते हैं।
गूगल एक तरफ तमाम भारतीय भाषाओं को अपनाता है, लेकिन हम अपनी ही भाषाओं से दूर भाग रहे हैं। अगर ऐसा ही रहा तो कुछ पीढ़ियों बाद हमारी तमाम स्थानीय भाषाएं दम तोड़ देंगी। वे अतीत की बात बन जाएंगी, संस्कृत-पालि की तरह। किसी भाषा की मौत उसके तमाम इतिहास, साहित्य और संस्कृति की मौत होती है, क्योंकि कोई भी भाषा उसके बरतने-बोलने वालों के कारण जिंदा रहती है। केरल में मलयालम के मुकाबले अगर अंगरेजी का बोलबाला बढ़ रहा है, तो यह सिर्फ केरल वालों के लिए नहीं, सभी हिंदुस्तानियों के लिए चिंता की बात है। क्योंकि अंगरेजी के मोह के कारण अन्य भाषाओं के साथ भी यही हो रहा है।

केरल के विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में लोग हिंदी समझते हैं। हिंदी विभागों में हिंदी पढ़ते हैं। हिंदी पढ़ने वालों में लड़कियां अधिक हैं। जब कई लड़कियों से इस बारे में पूछा कि वे पढ़ने के लिए हिंदी क्यों चुनती हैं, तो पता चला कि हिंदी पढ़ कर वे शिक्षिका बन सकती हैं, अनुवादक बन सकती हैं। बैंकों और अन्य कार्यालयों में हिंदी अधिकारी का रोजगार पा सकती हैं। यानी हिंदी इसलिए पढ़ी जा रही है कि रोजगार मिल सके। मलयालम के साथ भी तो ऐसा हो सकता है कि उसे रोजगारपरक भाषा बनाया जाए! भाषाएं तभी बच सकती हैं, जब वे लगातार हमारे दैनिक जीवन की जरूरतें पूरी करती हों, जिसमें रोजगार सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ०

 

क्षमा शर्मा

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