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कहानी – …तब रामराज आएगा

मंगत राम के मन में पांच बीघे जमीन की बात आ गई तो बस फिर उसके चक्कर लगने शुरू हो गए तहसील के। गंगाराम राजी की कहानी।
Author October 8, 2016 23:10 pm
मंगत राम भारी मन से घर की ओर चल पड़ा था। अगले दिन डीसी से मिलने की सोचने लगा।

गंगाराम राजी

अपने जमाने में मंगत राम के बापू ने उसे गांव के स्कूल में पांचवीं जमात तक पढ़ा दिया था। इससे मंगत राम अखबार पढ़ने से लेकर आज की समझ रखने वाला पढ़ा-लिखा किसान बन गया था। कभी-कभी गंभीर सोच में भी वह अपने विचार रखता तो गांव वाले उसे अपना गुरु मानने लगे थे।  समय के साथ सब बदलता गया। राज करने वाले बदले, जनता बदली, वातावरण बदला, मौसम बदला और सबसे अधिक बदल गया इंसान। जब इंसान की बदलने की बात आती है तो मंगत को अपने बचपन के दिनों का गाना, ‘देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान… ’ याद आ जाता। कवि ने उस समय आदमी की चाल-ढाल देख कर यह गाना फिल्म को दिया होगा। कवि उसी समय वक्त की नजाकत को समझ गया था। शायद कवि को नहीं मालूम था कि यह गीत वर्तमान के हालात को दर्शाने वाला होगा।

अंगरेजों के समय से चली आ रही परिपाटी में प्रशासन को चलाने के लिए किसी योग्य व्यक्ति की तलाश में सामान्य से ऊंची बुद्धि को परखने के लिए एक परीक्षा रखी गई थी, जो आज भी है। इसी चयन विधि से चुने जाने वाले अ‍ॅफसर सरकार की नीतियों को जनता पर लागू करते हैं। सरकार इन्हीं पर निर्भर हो जाती है। लगता है कि हर जिले में एक राजा तैनात है, जिससे आम आदमी को इस राजा की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।  एक बार मंगत राम ने अखबार में मुख्यमंत्री का बयान पढ़ा कि जिन किसानों के पास पांच बीघे से कम जमीन है, उन्हें सरकार पांच बीघे जमीन पूरी करके देगी। फिर क्या था, मंगत राम सरकार से पांच बीघे जमीन की स्वीकृति के लिए कोशिश में जुट गया, जिससे वह अपने परिवार का लालन-पालन कर सके। वह इस काम के लिए सुबह से शाम तक कोशिश करने लगा। अच्छा हुआ कि उसके बापू ने उसे कुछ पढ़ा-लिखा दिया था और इससे उसकी समझ भी बड़ी हो गई थी, जिससे वह आज की दुनिया की हर बात समझने में सक्षम था।

एक बार मंगत राम के मन में पांच बीघे जमीन की बात आ गई तो बस फिर उसके चक्कर लगने शुरू हो गए तहसील के। जल्दी से एक प्रार्थना-पत्र लिखा। पंचायत और पटवारी से प्रार्थना-पत्र पर रिपोर्ट करवाई और जा पहुंचा तहसील के आॅफिस में। उसे उठ-बैठ तो लग ही रही थी। ज्यों ही तहसीलदार साहब खाली हुए, चपरासी उसे रोकता रहा, पर अबकी वह चपरासी के रोकने से रुक नहीं सकता था। पहुंच गया साहब के पास। अंदर जाकर हाथ जोड़ दिए। उन्हीं जुड़े हाथों में वह अपना प्रार्थना-पत्र पकड़े हुए था। वह तब तक हाथ जोड़े खड़ा रहा जब तक कि साहब ने उससे पूछा नहीं कि माजरा क्या है। साहब थक गए थे। चार-पांच पेशियां जो निपटा चुके थे। चाय का कप मंगवाया गया और अपने रिटाइरिंग रूम में चले गए। मंगत राम पर साहब ने एक नजर तो डाली थी, पर उसके साथ नजरें चार नहीं कर पाए। मंगत राम देखता रहा। मंगत राम भी पीछे-पीछे रिटाइरिंग रूम की ओर जाने लगा, पर चपरासी ने रोक दिया, ‘बाबा देखता नहीं, साहब अंदर कुछ देर जाएंगे और आ जाएंगे। जरा फे्रश हो जाएंगे, फिर तुम्हारा काम करेंगे। फ्रेश होकर काम जल्दी हो जाता है।’
‘फे्रश क्या होता है भाई?’ उसने तपाक से चपरासी से पूछा। मंगत राम भी कम नहीं था। उसने अब एक काम पकड़ा है, सरकार उसके लिए कर रही है तो इन प्यादों को उसका काम करना होगा।

‘जैसे तुम सुबह उठते हो, तरो-ताजा होते हो, उसे फे्रश कहते हैं।’ चपरासी बोला।‘अच्छा तो साहब सोने जा रहे हैं?’‘बाबा, मेरा सर मत खा। अभी बैठ जा… यहीं बैठ जा। जब साहब अंदर से निकलेंगे तो उनके पास खड़े हो जाना।’ पास ही खड़ा एक आदमी यह सब सुन रहा था। यही कोई साठ वर्ष तक पहुंच चुका होगा वह। मंगत राम को देखता रहा। बोला, ‘भाई, राम की कथा सुनी है?’ ‘वही राम जो दशरथ का पुत्र था। उसकी कथा हिंदुस्तान में किसको पता नहीं है।’ मंगत राम ने बड़ी आत्मीयता से कहा। ‘उसी कथा में एक प्रसंग आता है कोप भवन का। जब कोई राजपरिवार में नाराज या गुस्सा होता था तो उसके लिए एक कमरा राजमहल में बना होता था, उसे कोप भवन कहते थे। जब कोई नराज होता या गुस्सा होता तो वह कोप भवन में चला जाता और जब उसका गुस्सा खत्म होता, तो थोड़ी देर बाद बाहर निकल आता। आजकल सरकार ने सब बड़े अफसरों के कोप भवन बनाए हुए हैं। सरकारी अफसर कोप भवन से फे्रश होकर बाहर निकलते हैं। तुम भी अब इंतजार करो साहब के बाहर निकलने का।’मंगत राम के कुछ समझ आया, कुछ नहीं आया और वह उसका इंतजार करने लगा। सोचने लगा कि अब साहब कोप भवन से बाहर निकल आएंगे और फ्रेश होंगे। बाहर आते ही मेरा काम कर देंगे।

‘ठीक है साहब। आप भी साहब हैं?’ मंगत राम ने उस आदमी से पूछा।‘नहीं नहीं, मैं साहब नहीं हूं। मैं भी तुम्हारी तरह इंतजार कर रहा हूं।’ वह आदमी बोला। ‘आपको कोप भवन का पता है, कोप भवन में कोई अंदर नहीं जाता क्या?’‘सरकार के आदमी ही जा सकते हैं।’कोप भवन पर बातें होने लगी थीं। साथ खड़े लोग भी इनकी बातों का मजा लेने लगे थे।
दस पंदरह मिनट बाद तहसीलदार कोप भवन से बाहर आए, तो मंगत राम ने बीच ही में दोनों हाथों के बीच अपना प्रार्थना-पत्र पकड़ते हुए हाथ जोड़े आगे खड़ा हो गया, ‘महाराज की जय हो, मेरी फरियाद पर गौर करें।’‘बोलो बाबा बोलो।’ तहसीलदार बड़ी नम्रता से बोला। मंगत राम को लगा कि सच में कोप भवन में आदमी फ्रेश होता है। राजा दशरथ ऐसे ही राजा नहीं थे, उन्होंने कोप भवन बहुत सोच-समझ कर बनाया होगा और अबकी सरकार भी उन्हीं के पद चिह्नों पर चल रही है। रामराज्य की बात करते हैं, पहले दशरथ का राज होगा, फिर रामराज्य आएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि रामराज्य एक कदम ही दूर है। दशरथ के बाद ही रामराज्य आया था। दशरथ मरेगा तो रामराज्य की स्थापना होगी। अभी तो दशरथ जिंदा है। तभी कोप भवन बना है।

तहसीलदार मंगत राम के प्रार्थना-पत्र को वहीं खड़े-खड़े पढ़ता रहा। मंगत राम खड़ा-खड़ा काफी कुछ सोचता रहा। तहसीलदार पर नजर गड़ाए देखता रहा। तहसीलदार उसे साक्षात राजा दशरथ का रूप लग रहा था। ‘देख बाबा…।’‘वाह, यह तो दशरथ ही है। इसके बारे में सोचना ही क्या। रामराज्य तो केवल एक कदम दूर है। रामराज्य तब तक नहीं हो सकता, जब तक यह जिंदा है। अरे इसने इतनी देर मेरे प्रार्थना-पत्र पर लगा दी, यह बूढ़ा हो गया है। इसकी मशीन तेज काम नहीं करती।’ वह सोच रहा था। उसके कान बड़े अधीर हो रहे थे दशरथ को सुनने के लिए। जी जनाब, कुछ गौर कीजिए मेरी अर्जी पर। मुझे जमीन चाहिए।’‘बाबा, बहादुर शाह जफर का नाम सुना है?’  ‘नहीं महाराज… वह कौन था। बहादुर था या डरपोक था, मुझे उससे क्या लेना, मुझे तो जमीन चाहिए, जो सरकार ने वादा कर रखा है।’

तहसीलदार मंगत राम को देखता रहा। उसका प्रार्थना-पत्र उसके हाथ में था। हंसते हुए बोला, ‘बाबा, बहादुर शाह जफर का नाम तो मैं इसलिए ले रहा हूं कि उसकी और आपका केस बराबर है। कोर्ट पुराने केस में क्या फैसला हुआ है, उसका आधार लेकर अगला फैसला देता है।’‘जनाब काफर का क्या फैसला हुआ था? उसका फैसला आपने ही किया था। हमारा भी उसी तरह से कर दो जनाब।’ ‘बाबा, पहले तो काफर नहीं, जफर बोलो और उसका फैसला तो… उसे तो दो गज जमीन भी नहीं मिली थी।’जब मंगत राम ने जफर का फैसला सुना, तो चुप हो गया। इसका मतलब है उसे कुछ नहीं मिलेगा। यह दशरथ कब मरेगा, कब रामराज्य होगा और कब मुझे जमीन मिलेगी।’‘महाराज मेरे लिए क्या आज्ञा है?’ इतनी देर में तहसीलदार अपनी कुर्सी पर बैठ चुका था। अब वह और गंभीर हो गया था।‘बाबा इसका फैसला मेरे से बड़ा अफसर डीसी है, वहीं करेंगे। मैंने इस पर लिख दिया है, जो मैं कर सकता था।’ उस प्रार्थना-पत्र पर कुछ लिख कर अपने दस्तखत डाल कर वह कागज मंगत राम को दे दिया। मंगत राम ने आगे झुक कर कागज को संभाल कर रख लिया।
‘बाबा इसी तरह से डीसी साहब के पास जाओ। वही आपका काम करेंगे।’ तहसीलदार ने कहा। मंगत राम कागज पकड़ कर वहीं पर खड़ा रहा। चपरासी ने उसे बाहर जाने को कहा।
बाहर आकर मंगत राम सोचने लगा कि ‘एक और दशरथ कहां से पैदा हो गया। राम का तो एक ही दशरथ था। यह तो रक्तबीज राक्षस की तरह पैदा होने लगे हैं। वह भारी मन से बाहर आ गया। जफर को दो गज नहीं मिली मैंने तो पांच बीघे मांगी है। कैसे होगा यह काम।… चलो, दूसरे दशरथ के पास जाना होगा।…’

मंगत राम भारी मन से घर की ओर चल पड़ा था। अगले दिन डीसी से मिलने की सोचने लगा। सरकार कितनी अच्छी है, हमारे लिए क्या नहीं करती है।… सरकार की आज्ञा का पालन अब उसके दशरथ ही नहीं करें तो क्या करें।… अगले दिन वह पूछ-पाछ कर डीसी के आॅफिस में पहुंच ही गया। यहां पर उसने देखा कि उसकी तरह ही बहुत से लोग कई किस्म की फरियाद करने आ पहुंचे थे। उसकी बारी कब आएगी, सामने बैठा बाबू उसे बताएगा। तब तक उसे बैठने के आदेश हो गए थे। सोचने लगा कि ‘यह दूसरा दशरथ तो बड़ा है। इसके पास फरियादी भी बहुत हैं। अब मुझे इसके पास मिलने के लिए इंतजार करना पड़ेगा। कहते हैं कि रामराज्य में यह सब नहीं होगा। राम एक जगह से ही फरियाद सुन लेगा। आजकल तो कथनी और करनी में फर्क है। राजा कुछ बोलता है, उसके प्यादे कुछ और करते हैं। रामराज्य तो होना ही चाहिए। दशरथ मरेगा तो रामराज आएगा।’ परेशान मंगत राम साथ बैठे आगंतुक से पूछ ही बैठा, ‘भाई यहां काम होता भी है कि… ’ अभी बात पूरी भी नहीं हुई कि वह बीच में ही बोला, ‘हां भाई तुम ठीक कह रहे हो, ये अफसर जो टैस्ट पास करके इस कुर्सी पर बैठते हैं, इन्हें केवल ए बी सी डी तक पढ़या जाता है, तो काम कैसे होगा।’

‘भाई मैं समझा नहीं! मैं भी तो इतना ही पढ़ा हूं।’‘समझाता हूं, देख मैं यहां तीन-चार दिनों से आ रहा हूं। मुझे यह अधिकारी अवायड कर रहा है- ए। जब बात नहीं बनेगी तो फिर मुझे बाई पास करेगा, मुझसे बात ही नहीं करेगा- बी। सी- जब मैं इस तरह से बैठा ही रहूंगा, बार-बार आऊंगा तो मुझे कनफ्यूजन में डालेगा। फिर भी मैं पीछे लगा रहूंगा तो मेरे काम को डिले करेगा, यानी डी। इसकी ट्रेनिंग ही ए बी सी डी तक हुई है। यह इससे आगे जाएगा ही नहीं।’ कह कर वह जोर से हंसने लगा, साथ वाले भी जो उसकी बात सुन रहे थे हंसने लगे।
मंगत राम उन सबको देखता रहा। बात उसके कुछ समझ में आई, कुछ नहीं। वह भी उनके साथ हंस जरूर गया था, पर सोचने लगा कि बात कुछ तो है, जो यह कह गया। अपनी-अपनी सोच है। वह भी सोच में पड़ गया।

अब मंगत राम बैठा-बैठा कुछ उदास होने लगा था। ‘बैठने के लिए तो जगह अच्छी बनाई हुई है। ऐसी कुर्सियां मैंने पहले कभी नहीं देखी। अंदर दशरथ बहुत व्यस्त है। उसे टाइम ही नहीं दे रहा है। मेरे हाथ हल चलाने के लिए खारिश करने लगे हैं। मैं बूढ़ी बाजुओं में ताकत का अहसास महसूस करने लगा हूं। कब मुझे जमीन मिलेगी और मैं जमीन का मालिक हो जाऊंगा। मेरे बजुर्ग सारे के सारे जमीदारों के खेतों में काम करते-करते मर गए। मेरा भी तो इसी तरह मजदूरी करते-करते एक पांव कबर में पहुंच चुका है। कब यह दशरथ मरेगा और कब रामराज्य होगा। यही सोचते-सोचते अपनी बारी का इंतजार करते-करते मंगत राम वहीं ऊंघने लगा है। रोज अरामदायक कुर्सी पर उसे बैठाया जाता है। बस अब तो वह दशरथ के मरने की कामना करने लगा था, हे प्रभु इस दशरथ को अपने पास जल्दी बुला ले, रामराज्य दे दे, नहीं तो मुझे गुस्सा आया तो दशरथ नहीं बचेगा। मेरे बाजू पहले से ही फड़फड़ा रहे हैं। जितने यहां बैठे हंै मैं इन्हें रोज देखता हूं। अगर ये इकट्ठे हो गए तो।…’ ०

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