ताज़ा खबर
 

ललित प्रसंग- आंखिन रंग बचाय के डार्यो

एक अदना-सा निवेदन है। निवेदन रागाकुल रमणी का है। निवेदन फागाकुल रमणी का है। मगर है, बड़ा मार्मिक। इतना मार्मिक है कि मन को मथ डालता है। बड़ा अद्भुत आग्रह है।

प्रतीकात्मक चित्र।

एक अदना-सा निवेदन है। निवेदन रागाकुल रमणी का है। निवेदन फागाकुल रमणी का है। मगर है, बड़ा मार्मिक। इतना मार्मिक है कि मन को मथ डालता है।
बड़ा अद्भुत आग्रह है। आग्रह में आमंत्रण भी है। वर्जना भी है। आमंत्रण प्रधान है या वर्जना प्रधान है, निर्णय कर पाना कठिन है। शायद यही कविता की मार्मिकता है। अर्थबोध की अधिकाधिक संभावनाओं को खुला छोड़ देना कविता को अधिक अर्थवान बनाता है, क्या? बार-बार ऐसा ही लगता है।
रीतिकालीन कविता के साथ आधुनिक समझ का व्यवहार सहिष्णुता का व्यवहार नहीं है। विचारों के प्रति सहिष्णुता का विज्ञापन करने वाली आधुनिकता की असहिष्णुता विस्मय में डालती है। ईमानदारी से देखा जाय तो आधुनिकता की ढोल में रीतिकालीनता के बोल रीतिकाल से कम नहीं हैं। फिर भी रीतिकालीन कविता की भर्त्सना करना शायद हमें अपने आधुनिक होने की अनिवार्य शर्त लगता है। प्राय: हम कविता की मूल्यवत्ता कविता के विषय पर जांचने के आग्रही हैं। अक्सर हम भूल जाते हैं कि कविता विषय पर आधारित नहीं होती। विषय पर तो कविता का खिलवाड़ आश्रित होता है। कविता तो अपने में ही विषय को विनिर्मित करती है। खैर!

HOT DEALS
  • Honor 7X 64 GB Blue
    ₹ 15445 MRP ₹ 16999 -9%
    ₹0 Cashback
  • Lenovo Phab 2 Plus 32GB Champagne Gold
    ₹ 17999 MRP ₹ 17999 -0%
    ₹900 Cashback

रीतिकाल की कविता में भले और बहुत कुछ हो न हो, अलग बात है। मगर एक बड़ी मूल्यवान बात उसमें है, जो उतनी अधिक और कहीं नहीं है। घरेलू जीवन का, घर के भीतर के जीवन व्यवहार का जितना, सहज और व्यंजक वर्णन रीतिकालीन कविता में उच्छल रूप में विद्यमान है, अन्यत्र दुर्लभ है। घर का जीवन कविता के लिए अर्थवान है या नहीं, इस पर तो बहसों में रुचि रखने वाले लोग ही निर्णय कर सकते हैं।
इस कविता मे रमणी कहती है कि रंग डालना चाहते हो, डाल लो। तनिक भी मनाही नहीं है। सरेआम डाल लो, कोई हर्ज नहीं है। डालना ही है, तो खुल्लम-खुल्ला डाल लो, कौन रोकता है। जहां, जी चाहे डाल लो रंग। जहां-जहां जी चाहे रंग दो। मगर जरा आंखों को बचा कर। यह आंखों को बचा कर रंग डालने का आग्रह कितना लुभावना है। कितना विदग्ध आग्रह है। कितना व्यंजक आग्रह है। आंखों से बचा कर आंखों में रंग न डालने का आग्रह राग को कैसा अपूर्व उत्कर्ष देता है। कैसा मन को मुग्ध कर देता है।

नहला दो रंग में पूरा-पूरा कोई बात नहीं। सारे के सारे वसन भीग जाएं कोई बात नहीं। पूरी देह पर रंग चढ़ जाय कोई चिंता नहीं। गालों पर रंग थिरक उठे कोई फिक्र नहीं। किस बात की फिक्र? रंग तो तुम्हारा ही है! रंग में तो तुम्ही हो। तुम्हीं में तो रंगना है मुझे। तुममें ही तो डूबना है मुझे। फिर क्या? फिर देर क्या? प्रतीक्षा क्या? हिचक क्या?मगर एक बात याद रखने की है। याद रखनी है, वह यह कि आंखों को बचाना है। किसलिए? इसलिए कि आंखों से देखना है। आंखों से तुम्हारा रंग देखना है। तुम्हारे रंग का निखार देखना है। तुम्हारे रंग की निकाई देखनी है। तुम्हें देखना है। अगर आंख में रंग पड़ गया तो कैसे दिखेगा? फिर तुम्हारा ऐसा रंग कैसे दिखेगा? तुम कैसे दिखोगे? नहीं, नहीं यह ठीक नहीं होगा। ऐसा मत करना। आंखों को बचा कर रंग डालना।  आंखों का काम देखने का है। प्रेम देखने की चीज है। प्रेम का रंग देखने की चीज है। देखने से जी जुड़ा जाता है। जीवन पलुहित हो जाता, फलित हो जाता है। सार्थक हो जाता है। प्रेम का रंग देख लेने से कुछ देखन को बाकी नहीं रह जाता।

आंखों में रंग पड़ जाने से यह सुख छिन जाने का अंदेशा है। जीवन की सार्थकता के खो जाने की आशंका है। जीवन खोने की नहीं, पाने की चीज है। जीवन का भाना ही जीवन है, प्यारे! जो भा जाय उसे गाना ही तो जिंदगी का अर्थ है।रंग से तनिक भी परहेज न रखते हुए आंखों को रंग से बचाने का यह प्रेमपूर्ण आग्रह मुझे इस मुरझाए हुए समय में भी हुलसा देता है। कविता से मन उमंगित हो उठता है। मगर अपनी तरफ सोचते ही उदास हो जाता है।  यह नायिका हमारे समय की नहीं है। चाहे जितनी भी कोशिश करके हम उसे अपने समय में नहीं ला सकते। हम लाख चाहें तो भी वह हमारे समय में नहीं आ सकती। हमारे समय में तो, जो है सो है।  हमारे समय में बहुत कुछ है। विकसित तकनीक के संचार माध्यम है। सूचनाओं के विश्व बाजार हैं। स्मार्टफोन हैं। एसएमएस की उपलब्धि है। सिनेमा के प्रेमगीत हैं। अनंत चालबाजियां हैं। लिव-इन-रिलेशन के नुस्खे हैं। स्वतंत्रता के नाम पर संबंध विच्छेद की सुविधाएं हैं।
हमारे समय में बूढ़ा वसंत है। प्रदूषित नदियां हैं। सूखे तालाब हैं। पाट दिए गए पोखरे हैं। फूलने से पहले पाला खाए सरसों का समुद्र है। विषैले धुंए में जलती आम की मंजरियां हैं। रेलों में, बसों में, बाजारों में, गलियों में, बस्तियों में, हर कहीं बेलगाम भौंरे हैं। अपनी लाज बचाए रखने में भय से सिकुड़ी-सिकुड़ी कलियां हैं।

हमारी होली में किसिम-किसिम के रंग हैं। चेहरे को बदरंग बना देने वाले रंग। वस्त्रों को बेकार बना देने वाले रंग। नजर को बदल देने वाले रंग। राग को, अनुराग को मसल डालने वाले रंग। भूख को भड़का देने वाले रंग। स्वार्थ को चमका देने वाले रंग। कू्ररता को उकसा देने वाले रंग। सहिष्णुता को कुचल डालने वाले रंग। लाभ को लहका देने वाले रंग। लोभ में बहका देने वाले रंग। सबका रंग बिगाड़ कर अपना रंग चोखा कर लेने वाले रंग। न जाने कैसे-कैसे रंग, हर कहीं अपना रंग जमाए हैं। अपने में रंगने वाले रंग कहीं नहीं हैं। दूसरों पर फबने वाले रंग कहीं नहीं हैं। रंगों की भीड़ में, खुलने वाले, खिलने वाले रंगों का अभाव है। अभाव ही नहीं है, अकाल है। जो भी रंग हैं, हमारे समय में आंख में पड़ जाने को आकुल हैं। आतुर हैं। जिनके हाथ में भी रंग है, आंख में डालने के लिए है। कपड़ा न भीगे कोई बात नहीं। देह न भीगे, कोई बात नहीं। मन न भीगे कोई बात नहीं। बस आंख न बचने पाए। किसी भी कीमत पर आंख न बचने पाए। पूरा-पूरा रंगों का हमला आंख पर है। रंग भाषा का रूप पकड़ कर आंख में घुस रहे हैं। रंग लिपि का रूप धर कर आंख में घुस रहे हैं। रंग दृश्य का बाना बांध कर आंख में घुस रहे हैं। रंग उत्थान का रूप लेकर आंख में घुस रहे हैं। हमारे समय में हर दिन होली है। हमारे अपने, हमारे आत्मीय, हमारे रक्षक, हमारे संरक्षक सब होली खेल रहे हैं। नहीं, आंखों को किसी भी तरह बचा सकना संभव नहीं है। जब रोज-रोज आंखों में धूल झोंकी जा रही है। रोज-रोज आंखों में उंगली घुसेड़ी जा रही है, तो होली में आंखों को बचा कर रंग डालने का आग्रह क्या अर्थ रखता है। व्यर्थ है। आंख आपकी। मर्जी आपकी। जो चाहें।
हम अपने समय में लाख प्रयास करके भी कैसे कहें- ‘आंखिन रंग बचाय के डार्यो।’ ०

 

 

 

विधानसभा चुनाव 2017: पांचों राज्यों के नतीजे आने के बाद किसने क्या कहा

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App