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कहानी: घोंघे

अरुण को दिखने लगा था कि अंशुमान प्रधान और कैलाश शंकर जैसे लोग बस अपनी पीठ ठोंकने में लगे रहते हैं।

Author December 18, 2016 06:57 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अर्पण कुमार

साहित्य में नए-नए कदम रखे अरुण कौशल ने छपनेछ
पाने की दुनिया में प्रवेश कर लिया था। अपने से
वरिष्ठ साथियों की रचनाओं को पढ़ कर और उसमें हाशिए
और सर्वहारा वर्ग के प्रति ध्वनित होती उनकी समानुभूति की
तीव्रता के आधार पर वह उन नामी-गिरामी साहित्यकारों के
प्रति श्रद्धा-नत हो जाता।
अरुण कौशल चूंकि अपने आप को हिंदी कविता की
दुनिया में स्थापित करना चाहता है, इसलिए वह पहले से इस
क्षेत्र में बाजी मारे हुए लोगों के कद को एक हसरत भरी निगाह
से देखता है। खासकर फेसबुक जैसे त्वरित माध्यमों पर आती
सूचनाएं और चित्र उसे बड़े आकर्षित करते हैं। वह उन्हें
लाइक करता और बधाइयां भी देता है। कई लेखकों-
लेखिकाओं को वह फॉलो भी करता है। इन सबके बावजूद,
हाल हाल तक उनसे बातचीत करने की उसे हिम्मत नहीं होती
थी। उसकी इच्छा पर संकोच की एक परत बिछी रहती थी।
वह सोचता था, ये बड़े लेखक हैं, इनकी तेज नजर और
इनकी सूक्ष्म दृष्टि के आगे वह कहां टिक पाएगा। उसे कई बार
लगता… वह बात करे भी तो क्या करे! मगर धीरे-धीरे वह
उनके ‘टेक्सट’ और उसके स्तर से परिचित होने लगा। उनके
और अपने लिखे की तुलना करने लगा और उसके अंदर
क्रमश: आत्मविश्वास आने लगा।
अरुण इन दिनों नित्य नए लोगों से संपर्क में रहना चाहता
है। वह अपने से वरिष्ठ साहित्यकारों से मार्गर्दशन चाहता है। वह
उन्हें अपनी कविताएं सुनाना और पढ़ाना चाहता है, उनकी
प्रतिक्रिया चाहता है। वह दूसरे लेखकों की तरह खुद को भी
फेसबुक और ट्विटर पर अपडेट रखता है। उसी क्रम में एक
दिन वह ‘फेसबुक’ पर अंशुमान प्रधान से बातचीत करने लगा।

अरुण कौशल: ‘नमस्कार, नया क्या लिख रहे है?’
अंशुमान प्रधान: ‘कविताएं।’
अरुण कौशल: ‘इधर कहां प्रकाशित हुई हैं?’
अंशुमान प्रधान: ‘कहीं नहीं।’
अरुण कौशल: ‘कहीं नहीं… क्या मतलब!’
उधर से कोई जवाब नहीं आया। अरुण ने दुबारा लिखा:
‘जरा खुल कर चर्चा हो!’
अंशुमान प्रधान: ‘बस।’
अरुण कौशल: ‘हमारे जैसे पाठक आपकी कविताओं की
प्रतीक्षा किया करते हैं। हमारी प्रतीक्षा का भी थोड़ा ध्यान रखें।’
अंशुमान प्रधान: ‘बिल्कुल, आभार।’
(कुछ देर रुक कर)
अरुण कौशल: ‘थोड़ा-बहुत मैं भी लिखता हूं।’

अंशुमान प्रधान ने आगे जवाब नहीं दिया। वास्तव में वे
जवाब देना नहीं चाहते थे। वे कविताएं लिखते हैं, लेकिन उनकी
परवर्ती पीढ़ी क्या लिख रही है, इसमें उनकी कोई रुचि नहीं है।
वे अपने आप को इतना बड़ा कवि मानते हैं कि उन्हें अपने आगे
किसी नए के लिखे को पढ़ने की जरूरत महसूस नहीं होती।
यह दो कवियों के बीच इंटरनेट पर हुआ वातार्लाप था,
जहां खामोश और रूखी प्रतिक्रिया उनकी गंभीरता का
पर्याय नहीं थी, बल्कि वरिष्ठ की हेकड़ी और कनिष्ठ की
दयनीयता का सबूत थी। अरुण कुछ डर गया। उसका पूरा
शरीर पसीने से नहा उठा।

तीसरे दिन फेसबुक पर दोनों एक बार फिर आॅनलाइन दिखे।
मगर अरुण ने इस बार अंशुमान प्रधान से कोई बातचीत नहीं
की। एक छोटा-सा संवाद उसे इस तरह कई दिनों तक प्रभावित
कर सकता है, उसे स्वयं पर आश्चर्य हुआ था। आभासी मंच
पर हुई बातचीत उसके वास्तविक जीवन के कई चटख रंगों को
चाट चुकी थी। वह एक बार अपने मन की भड़ास साफ-साफ
लिख देना चाहता था, फिर इसे धूल में लट्ठ मारने जैसा एक
अनावश्यक उपक्रम समझते हुए वह चुप ही रहा।

सुबह सुबह रेडियो पर एक गाना बज रहा था- निर्बल से
लड़ाई बलवान की/ ये कहानी है दीये की और तूफान की।
वह मन ही मन मुस्करा उठा। गाने में दीये के उत्साह की
चर्चा रोचक अंदाज में की गई थी। तो क्या वह स्वयं दीया है
और अंशुमान प्रधान कोई तूफान। वह कंधा उचका कर उठ
गया और बाहर बालकनी में बैठ गया। पत्नी चाय लेकर आई।
चाय का प्याला लेता हुआ अरुण ने पूछा: ‘अंजना, एक
सवाल का जवाब दो। सच-सच। क्या किसी तूफान को एक
दीया हरा सकता है?’

इन सात वर्षों में अंजना अपने पति के मिजाज को थोड़ा
समझने लगी थी। कुछ देर चुप रही। फिर बोली: ‘ऊल-जुलूल
खयालों से बाहर आइए। चाय का मजा लीजिए और शाम का
आनंद उठाइए मेरे साथ। बाकी सब चीजें बेकार हैं।’
‘प्लीज मजाक नहीं।’ अरुण गंभीर ही बना
रहा।

अंजना कहने लगी: ‘तूफान में दीये को
अंतत: बुझना ही है। मगर इससे वह जलना
क्यों छोड़े! तूफान का अपना धर्म है
और दीये का अपना।’
अंजना भीतर चली गई थी, मगर
उसके भीतर एक दीया जला गई। उसका उद्विग्न मन
शांत हो गया था। वह वापस अपने दिल की सुनने लगा था
और शब्दों की दुनिया उसे आकर्षित करने लगी थी।
कुछ दिनों बाद वह वापस फेसबुक पर था। एक नई ऊर्जा
और संकल्प के साथ। निराला की एक पंक्ति को उसने अपनी
दीवार पर पोस्ट किया ‘एक मन रहा राम का जो न थका’।
‘लाइक्स’ भी अच्छे मिले। उसने सूची देखी। अधिकतर
उसके असाहित्यिक मित्र थे और दो-तीन उसके जैसे ही युवा
लेखक। इन दिनों रह-रह कर उसके मन में यह अंतर्द्वंद्व चलता
रहा कि क्या हर
बड़ा लेखक
अंशुमान प्रधान
जैसे ही बात करता
है। मन ही मन
उसने सोचा- चलो
अंशुमान प्रधान से
नहीं, तो इस बार
किसी और से
संवाद किया जाए।
आखिर हिंदी
साहित्य में सभी
वरिष्ठ लेखक इतने
कटु और
आत्मकेंद्रित तो
नहीं होंगे। यह क्या
कि किसी एक की
बेरुखी को सभी
वरिष्ठ साहित्यकारों
पर लागू करते हुए
सभी को एक ही
निगाह से देखा
जाए! आखिर
अपनी अंगुलियां
भी कहां समान
होती हैं! और फिर
उस समय आदमी
का जाने कैसा मूड
रहा हो! अगर
अंशुमान से नहीं,
तो किसी और
वरिष्ठ लेखक से
बातचीत की ही

जा सकती है। तभी छोटे-बड़े कई पुरस्कारों से सम्मानित और
‘मनभावन’ नामक साहित्यिक संस्था के सचिव और प्रसिद्ध
कहानीकार कैलाश शंकर उसे आॅनलाइन दिखे। उसने उन्हीं
से चैटिंग करने का मन बनाया। कैलाश शंकर कोई आठ-
महीनों से उसके फेसबुक फ्रेंड थे, मगर उसकी अब तक
उनसे कभी चैटिंग नहीं हुई थी। सोचा, चलो इसी बहाने उनसे
कुछ सीखना हो जाएगा और कुछ परिचय भी।
अरुण कौशल: ‘कैसे हैं आदरणीय!’
कैलाश शंकर: ‘अच्छा हूं भाई।’
कैलाश शंकर के ‘भाई’ शब्द में अरुण को कुछ
अतिरिक्त वजन लगा।

सावधान! कहीं अरुण कौशल उस बोझ के नीचे न आ जाए!
अरुण को एक बार फिर अपने वरिष्ठ साथी का वही
जातिगत चरित्र नजर आया। उसका मन अवसाद से भर गया।
पल भर के लिए उसे लगा, वह अपना खून जला कर यह
सब क्यों लिखता है! क्या सचमुच इन्हें कोई पढ़ता है! वह
यह सब छोड़ क्यों नहीं देता! क्या इससे बेहतर यह नहीं कि
वह अपना समय परिवार के साथ बिताए! शेयर बाजार में
खर्च करे, म्युचुअल फंड खरीदे और अपने पैसे बढ़ाए। उसे
याद आया, कल ही तो मन में उमड़-घुमड़ रही कविता को
शब्दों में ढालने के लिए घर आते ही वह लैपटॉप लेकर बैठ
गया था। कोई दो-ढाई घंटे लगातार कुछ न कुछ
लिखता रहा। कई बार अपने लिखे हुए की
काट-छांट की। दो बार पत्नी चाय रख कर
चली गई। कविता की धुन में दोनों बार उसे
ठंडी चाय पीनी पड़ी।

अरुण ने पिछली चैटिंग से कुछ
सबक लिया था। इस बार ‘बैकफुट’ पर
खेलने की बजाय आक्रामक हो गया। आगे बढ़ कर
ऐसा शॉट मारना चाहता था कि गेंद सीधे मैदान से बाहर।
अरुण कौशल: ‘परिवेश’ पत्रिका के फरवरी अंक में मेरी
कुछ कविताएं थीं।’

कैलाश शंकर को कुछ सूझा नहीं कि वे क्या प्रतिक्रिया
दें! बहुत देर तक वे सोचते रहे। उनके मन में कुछ अलग
किस्म का उमड़-घुमड़ चल रहा था। किसी नए कवि के प्रति
यों सहज भाव से कोई उत्सुकता कैसे जगा दें! फिर उनके
वर्षों के परिश्रम से जमा किए ‘एटीट्यूड’ का क्या होगा! वे
बहुत देर तक सोचते रहे। कुछ तो जवाब देना बनता था।
उन्होंने अपने हलक
से कुछ निकाला:
‘ओह!’
अरुण कौशल
भी एक कवि है।
वह समझ रहा था
कि शब्द-व्यापार में
आए इस अवरोध के
बीच क्या पक रहा
है! वह भी कहां
चूकने वाला था!
अरुण कौशल ने
आगे लिखा: ‘कभी-
कभार छोटे लोगों पर
भी नजरें दौड़ा ले!’
कैलाश शंकर:
‘अभी पत्रिका पलट
ही नहीं पाया।’
अरुण कौशल,
कैलाश शंकर की
यह चालाकी समझ
रहा था। कैलाश
शंकर की कहानी
भी पत्रिका के उसी
अंक में आई थी।
वह जानता है,
कैलाश शंकर अब
इतने स्थापित हो
चुके हैं कि उनके
अंदर आत्मकेंकिता
बढ़ गई है। उन्हें
अपने अलावा
किसी की भी खबर

नहीं रहती। वे फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर आदि हर जगह
अपनी ही प्रशंसा के गान में लिप्त रहते हैं। उन्हें दूसरों पर
ध्यान देने की फुर्सत कहां है!
अरुण कौशल, कैलाश शंकर को साफ-साफ बताना
चाहता था कि आप कोई बहाना न ढूंढ़ें। ऐसा करने की कोई
जरूरत नहीं। जवाब में अरुण कौशल ने लिखा: ‘नहीं, पिछले
महीने के अंक में ही थी।’
अब कैलाश शंकर क्या करें! उनका गंभीरता का नकाब
क्षतिग्रस्त हो रहा था। लेकिन उन्हें मालूम है, यह चैटिंग है।
जवाब दो, न दो, कोई पूछने वाला नहीं है। आदमी अपने
मनोवेगों की ट्रेन को इच्छानुसार भगाता जा रहा है। कोई उसके
नीचे आए, मरे कटे, उसकी बला से।
अरुण को दिखने लगा था कि अंशुमान प्रधान और
कैलाश शंकर जैसे लोग बस अपनी पीठ ठोंकने में लगे रहते
हैं। समीक्षा के नाम पर वे अपनी रचनाओं की वाहवाही सुनना
चाहते हैं। छोटे-बड़े पुरस्कारों के निर्णय-कुनिर्णय पर अपना
आधिपत्य जमाए ये लोग अपने आगे-पीछे करने वालों को ही
कल का महान लेखक घोषित करेंगे। अरुण कौशल अब इस
सच को जान गया था। अपनी इच्छा के लिए और किसी वाद
से परे लिखना ही उसे श्रेयस्कर लगा। उसने एक सुबह
फेसबुक पर पोस्ट किया: ‘मेरा लेखन, मेरे जीवनानुभव और
मेरी सोच का आईना मात्र है। अब यह आईना किसी को साफ
और चमकता हुआ दिखे तो ठीक, वरना किसी को अगर इस
पर धूल और धुंध जमी नजर आए तो मेरी बला से।’
अरुण ने शायद महानता के पीछे का पोला और ऐंठन भरा
सच देख लिया था।

कोई दो सप्ताह बाद एक नई कवयित्री अनुपमा सक्सेना
ने अपने फेसबुक मैसेंजर के मैटर का फोटो खींच कर एक
धमाकेदार पोस्ट किया, जिसमें अंशुमान प्रधान की लार
टपकाती लोलुपता का पर्दाफाश किया गया था। उन्होंने सीधेसी
धे उससे कुछ अवांछित लाभ चाहे थे। और वह भी
अनुपमा के पहले काव्य-संग्रह पर आयोजित एक लोकार्पण
समारोह में उसके बारे में सब कुछ अनुकूल बोलने के लिए।
अनुपमा एक कॉलेज में अंगरेजी पढ़ाती थी और हिंदी में
कुछेक वर्षों से लिखती थी। हिंदी साहित्य के समकालीन
लेखन में यह सब चल रहा है, इससे लगभग अनजान
अनुपमा, अंशुमान की बड़ी-बड़ी बातों में आ गई थी।
फेसबुक पर नए-पुराने कई लेखक और पाठक यह सब देख
निंदा कर रहे थे। कुछेक को भीतर ही भीतर मजा आ रहा था।
इस पूरे प्रकरण में जो सबसे अधिक रुचि ले रहे थे, वे कैलाश
शंकर थे। अरुण दोनों को करीब से जान रहा था। वह अपनी
ओर से कोई प्रतिक्रिया दिए बगैर चुपचाप यह पूरा तमाशा देख
रहा था। उसने एक-दो बार अनुपमा से बात करनी चाही, मगर
रुक गया। इस समय अनुपमा चाहे-अनचाहे कैलाश शंकर की
रणनीति का शिकार हो गई थी, यह उसे उचित नहीं लग रहा
था। मगर कैलाश शंकर जिन लच्छेदार शब्दों का सहारा लेकर
अपना बदला अंशुमान प्रधान से निकाल रहे थे, हिंदी साहित्य
में अभी-अभी आई अनुपमा के लिए इसे समझना आसान न
था। अरुण को लगा कि अगर वह अनुपमा को आगाह भी
करे तो संभवत: वह उसे गंभीरता से न ले। इसलिए वह चाह
कर भी अपने भीतर के आवेग को बाहर नहीं ला सका। खैर,
किसी तरह खेद आदि व्यक्त कर अंशुमान प्रधान ने अपने
आप को बचाया। उसके कोई दो सप्ताह तक वे फेसबुक से
लगभग अदृश्य दिखे। कोई हरकत नहीं, कोई विवरण नहीं।
साहित्य को लेकर कोई जुमला नहीं। उन्होंने मानो अपने आप
को किसी घोंघे की तरह कवच में समेट लिया था।

कुछ दिनों बाद एक और धमाका हुआ। संयोग से फेसबुक
पर ही। जिस साहित्यिक संस्था के कैलाश शंकर सचिव थे,
उसके कुछ पुरस्कारों को लेकर इस बार विवाद हो रहा था।
पुरस्कारों के पीछे भाई-भतीजावाद और बंदरबांट के आरोप
लग रहे थे। जिन लेखकों ने पूर्व में कैलाश शंकर के लेखन में
कोई न कोई सहयोग किया था, उन्हें ही पुरस्कार दिए गए थे।
जिस प्रकाशक ने उनकी किताबें छापीं, उसे ही ‘मनभावन’
संस्था से पुस्तकों और पत्रिकाओं के प्रकाशन का टेंडर जारी
किया गया। इस बार इस मौके को भुनाने की बारी अंशुमान
प्रधान की थी। विरल लक्षणा-व्यंजना के कवि अंशुमान प्रधान
हर अवसर को भली-भांति भुनाना जानते थे। ‘घोंघा’ एक बार
फिर अपने कवच से बाहर आ गया था। कथित रूप से दो बड़े
घोंघों की लड़ाई आभासी दुनिया के एक पटल पर हो रही थी।
हिंदी साहित्य अपनी खुमारी में आगे बढ़ रहा था और दो घोंघों
का आभासी युद्ध जारी था। लेखक-प्रकाशक अपने हानि-लाभ
के मद्देनजर अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज कर रहे थे। अरुण कौशल
यह सब देखे जा रहा था। वह किसी मोहभंग और महत्त्वाकांक्षा
से परे चुपचाप अपने दैनंदिन कार्यों और लेखन में व्यस्त था।
उसे यह सब ड्रामेबाजी से अधिक कुछ नहीं लग रहा था। उसे
‘अपहरण’ फिल्म का आखिरी दृश्य याद आ रहा था, जिसमें
मौका मिलने पर एक-दूसरे के कट्टर विरोधी दो राजनेता
मिलकर सरकार बना लेते हैं। काफी धीमे और आहत स्वर में
उसने अपनी पत्नी से कहा, ‘हमारे लेखक-गण, जिन
राजनीतिज्ञों को दिन-रात गाली देते रहते हैं, वे स्वयं उनसे
अधिक घटिया राजनीति करते हैं।’

‘कला हो या राजनीति, रिश्तेदारी हो या पड़ोस, गांव हो
या शहर हर जगह ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं। रात ज्यादा हो
गई है। सो जाइए।’ अंजना ने कमरे की बत्ती बुझा दी।
अरुण मन ही मन अंजना की बातों से सहमत हो रहा था।
सोचने लगा, यह समाज तो जैसा है, वैसा ही रहेगा। अच्छे-बुरों का
मिश्रण, फूल-कांटों का गुलशन। मैं किसी को सुधार नहीं सकता।
कुछ बेहतर करना होगा, तो मुझे अपने स्तर पर ही करना होगा।
अरुण घुप्प अंधेरे में अपने भीतर के शैतान को उभरने देना
नहीं चाह रहा था। उसके सामने कुछ बेहतर रचने से ज्याद

 

 

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