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प्रसंगवश- लेखन और विवाद की परंपरा

हिंदी साहित्य में विवादों की लंबी परंपरा है। भारतेंदु काल से ही विद्वानों के बीच वाद-विवाद होते रहे हैं। भरत, भामह, दंडी, रुद्रट, शूद्रक... संस्कृत के समस्त लक्षणकारों के बीच दृश्य-काव्य, श्रव्य-काव्य, जैसी विधागत और रस, रीति, अलंकार जैसी काव्य की तत्त्वगत बातों को लेकर सहमति-असहमति, तर्क-वितर्क होते रहे हैं।

Author January 27, 2018 11:36 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

देवशंकर नवीन

साहित्यिक विवाद झगड़े की सीमा तक पहुंच कर झगड़ा नहीं होता। यह बौद्धिक बहस है, किसी विषय विशेष पर विचार-विमर्श है, विद्वानों के बीच तर्क-वितर्क है। प्राचीन परंपरा में विद्वानों का समय इसी से कटता था- काव्य शास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम/ व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा। इस नीति श्लोक में यह अर्थ भी छिपा हुआ है कि मूर्खों के बीच हो रही बहस कलह में परिणत हो सकती है, पर विद्वानों के बीच हो रहे कलह भी सृजनात्मक बहस का रूप ले लेता है।

हिंदी साहित्य में विवादों की लंबी परंपरा है। भारतेंदु काल से ही विद्वानों के बीच वाद-विवाद होते रहे हैं। भरत, भामह, दंडी, रुद्रट, शूद्रक… संस्कृत के समस्त लक्षणकारों के बीच दृश्य-काव्य, श्रव्य-काव्य, जैसी विधागत और रस, रीति, अलंकार जैसी काव्य की तत्त्वगत बातों को लेकर सहमति-असहमति, तर्क-वितर्क होते रहे हैं। आगे चल कर विद्वानों को दी जाने वाली उपाधियों का आधार भी वाद-विवाद यानी शास्त्रार्थ होता था। धौत परीक्षा जैसा अनुष्ठान इस शास्त्रार्थ का ही एक रूप होता था। समय-समय पर सामंतों, शासकों के दरबार में बुद्धि विलास के लिए भी शास्त्रार्थ का आयोजन होता था, जिसमें ढिंढोरा पीट कर दूर-दूर के विद्वानों को विषय विशेष पर शास्त्रार्थ के लिए बुलाया जाता था। पर चूंकि ये सारी बातें वाचिक परंपरा में ही रह गर्इं, इसलिए आज लोक-कंठ के जरिए हम तक पहुंची हुई कई बातें किंवदंती जैसी लगती हैं। इस तरह की बहसों का कोई दस्तावेजीकरण होता नहीं था, इसलिए यह परंपरा आगे तक जानी-समझी नहीं जा सकी। खड़ी बोली हिंदी में भारतेंदु युग में आकर यह वाद-विवाद, यानी विषय विशेष पर विद्वानों का मतामत लिखित रूप में सामने आने लगा।

विवादास्पद लेखन से तात्पर्य वैसे लेखन से है, जो अन्य विद्वानों को तर्क-वितर्क करने के लिए उत्प्रेरित करे। यह परंपरा लिखित रूप में विकसित हो, इसकी गुंजाइश सबसे पहले सन 1881 में लिखे भारतेंदु हरिश्चंद्र के निबंध ‘नाटक’ से बनी और द्विवेदी युग, छायावाद युग, प्रगतिवादी युग, नई कविता-नई कहानी होती हुई आज तक चली आ रही है। अंतर सिर्फ इतना आया है कि प्रारंभिक वाद-विवाद साहित्य के स्वरूप और साहित्य की श्रेष्ठता-पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के निमित्त होता था, एक विद्वान के अभिमत को ध्वस्त कर दूसरे विद्वान, अपने मत की स्थापना हेतु ऐसा करते थे। पर, आज के विद्वान किसी विचार को ध्वस्त या स्थापित करने के लिए नहीं, व्यक्ति विशेष को ध्वस्त करने के लिए, योजनाबद्ध ढंग से भड़ास निकालने और व्यक्ति को कलंकित या खारिज करने के लिए विवादास्पद लेखन करते हैं। व्यक्ति केंद्रित कहानी-कविता-निबंध लिख कर उसके चारित्रिक हनन का आयोजन आज कोई नई बात नहीं है। पत्रिकाओं में ऐसे दृश्य मौके-बेमौके दिखते रहते हैं।

विवादास्पद लेखन के आधार कई हैं। समय के बदलते तेवर के साथ इस कोटि के लेखन का कारण बनता रहा है। कभी साहित्य के रूप-स्वरूप, लक्षण-प्रयोजन को लेकर, कभी भाषा के स्वरूप निर्धारण को लेकर, कभी तथ्य के संभव-असंभव को लेकर, कभी सामाजिक आचार-संहिता के खंडन-मंडन को लेकर, कभी साहित्य की श्लीलता-अश्लीलता को लेकर, कभी रचनाकार विशेष की श्रेष्ठता-हीनता पर व्यक्त स्थापना को लेकर, कभी स्थापित साहित्यिक धारा को लेकर, कभी साहित्य के शब्द संस्कार और विषय चयन को लेकर, कभी स्थापित सत्ता और धार्मिक भावना को लगी ठेस को लेकर साहित्य में वाद-विवाद होते रहे हैं। समय-समय पर साहित्य द्वारा राज-सत्ता अथवा समाज-सत्ता के विरुद्ध उठाए गए मुद्दों को लेकर कृति विशेष को प्रतिबंधित भी किया जाता रहा है। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में सखाराम गणेश देउसकर द्वारा बंगला में लिखी गई पुस्तक ‘देसेर कथा‘ (पं. माधव प्रसाद मिश्र द्वारा हिंदी में अनूदित) अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित हुई, ‘हिंदू पंच’ का ‘बलिदान अंक’, ‘चांद’ का ‘फांसी अंक’ आदि स्वतंत्रता से पूर्व प्रतिबंधित कर दी गई थी, प्रेमचंद को उनके लेखन के लिए खरी-खोटी सुनाई गई और उन्हें कुछ भी लिखने के लिए अनुमति लेने को कहा गया, तो उन्होंने नाम बदल कर लिखना शुरू किया। छद्म नाम से लिखने की परंपरा तो अब भी है, जो विवाद से बचने की लेखकीय प्रवृत्ति को दर्शाता है।

पर, यहां उद्देश्य विवादास्पद लेखन है, प्रतिबंधित साहित्य नहीं। साहित्य पर प्रतिबंध जहां हमारे मन में निरंकुश शासक की दुर्वृत्ति का चित्र अंकित करता है, वहीं विवादास्पद लेखन उदारता और विद्वता और जनतांत्रिक बोध का। हिंदी के विवादास्पद लेखन पर चर्चा अभी तक न के बराबर हुई है। जबकि हिंदी के सृजनात्मक और आलोचनात्मक- दोनों साहित्य के स्वरूप निर्धारण में इस घटना का महत्त्वपूर्ण योगदान है। हिंदी-आलोचना के उद्भव का सारा श्रेय हिंदी के प्रारंभिक वाद-विवाद को ही जाता है। पर लोग इसे भूल गए हैं। भारतेंदु ने अपने ‘नाटक’ निबंध में भारतीय परंपरा, सामाजिक वर्तमान और पाश्चात्य प्रभाव को रेखांकित करते हुए हिंदी के नाट्य लेखन पर बातें की थीं; समकालीन विद्वानों ने उस पर पर्याप्त तर्क-वितर्क किया। परिणामस्वरूप उस समय की रचनाशीलता और विधाओं का स्वरूप निर्धारित हुआ।

भारतेंदु युग का साहित्यिक विवाद बड़ी नाजुक परिस्थिति का विवाद था, वैसे हिंदी साहित्य का हर काल किसी न किसी कारण नाजुक बना रहा है। भारतेंदु का काल साहित्य की भिन्न-भिन्न विधाओं के स्वरूप निर्धारण और तदनुकूल रचनाशीलता का काल था। इसलिए उस काल का विवाद उन्हीं परिस्थितियों के हिसाब से चला। द्विवेदी युग का विवाद ‘साहित्य शास्त्र के निर्माण प्रक्रिया’ से जुड़ी बातों पर बहस करते हुए दिख रहा है। इस बहस में मुख्यतया महावीर प्रसाद द्विवेदी, मिश्रबंधु, बालमुकुंद गुप्त, पद्मसिंह शर्मा, लाला भगवानदीन, कृष्ण बिहारी मिश्र के साथ और भी कई साहित्य-प्रेमी और भाषा-प्रेमी थे। इन्हीं दिनों देव-बिहारी विवाद चला, जो आज भी एक प्रतीक रूप में चर्चा में आता है। इन्हीं दिनों मिश्रबंधुओं का प्रथम आलोचना ग्रंथ ‘हिंदी नवरत्न’ विवाद चला।

पीछे से चल रही रीतिवादी काव्यधारा से समकालीन विद्वानों का मन खिन्न हुआ। लगातार नारी-देह, यौनोन्माद, नख-शिख वर्णन ने विद्वानों के मन में एक वितृष्णा-सी उत्पन्न की। ध्येय यह था कि साहित्य में अगर जन जीवन की समग्र भावनाओं का चित्रण न हो, तो वह साहित्य किस काम का। रीतिवाद बनाम स्वच्छंदतावाद का विवाद इसी धारणा के पक्ष-विपक्ष से शुरू हुआ। फिर छायावाद युग प्रारंभ हुआ। छायावाद काल में भी साहित्यिक विवाद हिंदी कविता के स्वरूप, भाषा और छंद को लेकर चलता रहा। फिर प्रगतिवाद के दौर में भिन्न-भिन्न रचनाकारों ने राजनीतिक धारणा, यथार्थवाद, कलावाद, जनपक्षधरता, रसवाद, रूपवाद आदि मसलों पर अपने-अपने मंतव्यों को स्थापित करने की कोशिश की। ‘उर्वशी विवाद’ इसी दौर की एक उल्लेखनीय घटना है। यह कहने में कोई दुविधा नहीं कि समय-समय पर चले इन साहित्यिक विवादों ने समकालीन विद्वानों के बीच तू-तू, मैं-मैं जितना चलवाया हो, आपसी संबंधों को जितना भी रुखड़ा किया हो, पर साहित्यकारों के बीच सहनशीलता और तर्कशक्ति को प्रोन्नत करने का बहुत कारगर काम किया और हिंदी आलोचना का आधार काफी मजबूत हुआ, वह समर्थ हो गई।

हिंदी में घटनाएं होती रही हैं। छठे दशक के बाद हिंदी साहित्य के लेखन संसार में दबी सांस से एक प्रवृत्ति जीवन पा गई, वह यह कि, जिस पेड़ को लांघ नहीं सकते, उसे काट कर गिरा दो। ध्वस्त करने की यह परंपरा इसी प्रवृत्ति के कारण शुरू हुई और सदी के अंतिम डेढ़-दो दशकों में इसकी सांस इतनी तेज हो गई कि नए तो क्या, पुराने लेखकों में भी यह प्रवृत्ति पूरी औकात के साथ जीने लगी। गरज यह कि वाद-विवाद से हिंदी साहित्य को जो कुछ प्राप्त करना था, वह कर लिया। इस वाद-विवाद के जरिए जिस तरह समय-समय पर साहित्य में क्रांतिकारी परिवर्तन आए, अब उसी तरह ‘वाद-विवाद’ की मूल अवधारणा में कोई वैचारिक क्रांति आनी चाहिए। वाद-विवाद की इस दीर्घ परंपरा ने हिंदी आलोचना को बहुत कुछ दिया।

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