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कहानी- चीलर बाबा

जब चीलर बाबा ने पहली बार कबरे को चाय में रोटी डुबो कर दी थी। अब कबरा बूढ़ा हो चला है। जब भी करीम बिसात बिछा कर बैठता, कबरा उसकी तरफ मुंह किए रहता।

Author December 30, 2017 11:43 PM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सीमा शर्मा

वह चीथड़ों और रद्दी कागज के बिस्तर पर पेट के बल लेटा हुआ था। दोनों कुहनियां नीचे टिका रखी थीं और ठोड़ी हथेलियों पर टिकी हुई थी। नजरों के नीचे बिसात बिछी थी। एक ओर कबरे की काली गोटियां थीं और दूसरी ओर उसकी अपनी- सफेद। हालांकि दोनों तरफ से खेल वही रहा था। केवल कबरे की सहमति लेता और चाल चलता। बीच-बीच में वह सूखी रोटी को दाढ़ के नीचे दबाता और कुड़-कुड़ कर चबाने लगता। चाल सोचता और फिर कुड़-कुड़।
छोटा-सा पिल्ला था जब चीलर बाबा ने पहली बार कबरे को चाय में रोटी डुबो कर दी थी। अब कबरा बूढ़ा हो चला है। जब भी करीम बिसात बिछा कर बैठता, कबरा उसकी तरफ मुंह किए रहता। चेहरा उसके दोनों पंजों पर धरा होता। वह ऊंघता रहता। कबरा अब भी अपनी चिर-परिचित मुद्रा में लेटा हुआ ऊंघ रहा था। करीम की कुड़-कुड़ से कान चौकन्ने हो गए। उसने जब काली गोटी चलने के लिए कबरे की ओर नजर उठाई, तो समझ गया कि कबरा कुछ और चाहता है। करीम ने सूखी रोटी का एक टुकड़ा उसकी ओर उछाल दिया। फिर उससे इजाजत मांगी और काली गोटी चल दी। अब कबरा कुड़-कुड़ कर रहा था।
करीम को दुनिया में तीन चीजों से बेपनाह मुहब्बत थी। एक शतरंज, दूसरा रोटी और तीसरे नंबर पर थी चाय। लेकिन इन चीजों से मुहब्बत के बारे में वह सोचना नहीं चाहता, क्योंकि उसे रुखसाना याद आ जाती है। वह रुखसाना जो, अब उसे लगता है, केवल उसका ख्वाब तो नहीं थी। हालांकि यादों ने उसे कभी अकेला नहीं छोड़ा। कभी छुरी जैसी तीखी यादें, तो कभी मरहम जैसी मीठी। उस दिन अचानक सड़क किनारे उसने घास के बैंगनी फूल देख लिए थे, जो रुखसाना के नाक की लौंग के फूल की तरह थे। किन्नी-से। क्या अब तक उसकी नाक में वही लौंग होगी? उसने सोचा था। अगर हुई तो उसमें अब बैंगनी चमक बची होगी?

अगर वह पागल नहीं है और उसकी याददाश्त एकदम दुरुस्त है तो, एक छोटी-सी बात ने उसे अपने ही गांव, घर और बीवी से दूर कर दिया था। बहुत छोटी-सी बात, जो बड़ी बन गई थी। हुआ यह था कि चुनावी माहौल पूरे गांव पर तारी था। लोग दो आरती और पांच नमाज में बंट गए थे। करीम कैसे न बंटता। हालांकि उसने गलत क्या किया, यह उसकी समझ में इतने वर्षों बाद भी नहीं आया। दंगे की आड़ में लूटखसोट के दौरान जब सवाईलाल की पंद्रह साल की लड़की लुटने वाली थी, तो करीम ने उसे बचा कर सही सलामत घर पहुंचा दिया था। बस यही तो अपराध किया था उसने। जिसके मायने सुबह होते ही बदल गए थे। अपहरण का मामला बन चुका था। लोग कह रहे थे, अब तो करीम गया काम से। वह औंधे मुंह भागा। गिरता, पड़ता। भागता ही रहा जब तक भाग सका। कदम थमे थे इस अजनबी शहर में। लगा, यहीं ठीक है। अल्लाह के रहम से वह बच गया। और यहां तक पहुंच ही गया तो आगे भी वही देखेगा। वही रहमदिल।  शहर के आखिरी छोर की कोलान बस्ती। शायद कोई त्योहार था या जाने कुछ और। कुछ लोग पूड़ी और आलू की भाजी बांट रहे थे। गरीब और भिखमंगे टूटे पड़ रहे थे। उसने भी हाथ बढ़ा दिया। बस्ती में उन दिनों सीवर लाइन पड़ी होगी। सीमेंट का एक मोटा पाइप बचा रह गया या जाने उसमें कोई खराबी थी। उसे एक किनारे फेंक दिया गया था। वही मोटा पाइप करीम का बसेरा बन गया था। कबरा तो अभी बारह साल पहले मिला। इस साल लोहा-मोड़ सर्दी ने दम ही निकाल रखा था। हर सर्दी में वह रात को उस जर्जर हो चले पाइप के दोनों तरफ प्लाई के ढकने लगा देता था। हवा से उड़ न जाएं इसके लिए उसने ढक्कनों को तार से बांध रखा था। रात में दोनों तरफ के तारों को दो बड़े पत्थरों से दबा देता। फिर भी हवा जाने कहां से तीर की तरह पाइप में घुसती थी। ऐसे में कबरा की गरमाहट राहत देती।

नहाने-धोने का कोई ठिकाना कभी नहीं मिला। गर्मी के मौसम में किसी चापाकल के नीचे सिर दे दिया और बदन को रगड़ लिया। सर्दी में, शुरू के कुछ वर्ष तो वह हफ्ते में नहा लेता। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ वह भी छोड़ दिया। उसके कपड़ों में हमेशा चीलर पड़े रहने लगे। जाहिर है, इसी वजह से उसका नाम चीलर बाबा पड़ा होगा। जब मौसम सही हो, शाम के वक्त पाइप के सामने खुले मैदान में लेटे-लेटे वह रुखसाना और बच्चों के बारे में सोचता।  इतने सालों में रुखसाना की आंखें पथरा गई होंगी। असमत और सबीरा जवान हो गए होंगे। उन्हें अपने अब्बू की याद भला कैसे होगी। कोई धुंधली-सी तस्वीर दिमाग में बनती होगी। एक बार परिंदों को घरौंदों की तरफ लौटते देख करीम के मन में खयाल आया कि सबीरा अपनी अम्मी से जरूर पूछती होगी, ‘अम्मी, इन्सान अपने घर का रास्ता कैसे भूल सकता है?’ वह कुछ नहीं बोली होगी। उसे खांसी का दौरा पड़ने लगा होगा। अब तो वह भी मेरी तरह बीमार रहती होगी। असमत ने साबिरा को जरूर डांटा होगा, ‘जा अब, अम्मी के लिए पानी लेकर आ।’ पर सबीरा उसी घर में होगी क्या? उसकी तो शादी हो चुकी होगी। मेरे घर छोड़ने की कहानी रुखसाना ने अपने जानिब कई बार बताई होगी। पर असमत और सबीरा को कभी यकीन हुआ होगा?

कई दिनों से बादलों का मटमैलापन गहराता जा रहा था। बस्ती में कई लोग लकड़ियां जला रहे थे। उनसे धुंआ उठता। धुंए से भी कभी आसमान डरावना हो सकता है, यह कोलान बस्ती के लोगों के लिए थोड़ा अजीब बात थी। ‘दिल्ली में तो’, सुखई कहता है, ‘धुएं ने कहर बरपाया है। मर्द और औरतों की पहचान करना मुश्किल हो रहा है। सभी के चेहरे मास्क में छिपे रहते हैं।’ सुखई रिक्शा पंक्चर लगाता है और खुद को मैकेनिक कहता है। उसके पास दिल्ली क्या, दुनिया जहान की खबरें होती हैं। पर थोड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बोलता है, तो अविश्वसनीय लगती हैं। शतरंज की बिसात का बैठा वजीर दांव पर लगा था। करीम उर्फ चीलर बाबा के लिए जानना मुश्किल हो रहा था कि जीतेगा वही या इस बार कबरा जीत जाएगा। चूंकि दोनों दांव खुद चीलर बाबा खेल रहा था, इसलिए कबरा की जीत पर उसे शक था। एक सुलझी हुई चाल की जरूरत भर थी किसी बेजुबान को हराने के लिए। पर भूखे पेट वह सूझ नहीं रही थी। दो दिन से रोटी नहीं मिली। कबरा भी पाइप से बाहर नहीं निकला। दो दिन पहले सूखी पड़ी आखिरी रोटी के कुछ टुकड़े करीम और कबरा ने शतरंज खेलते हुए मिल-बांट कर खा लिए थे। इस उम्मीद में कि कल तो बादल जरूर छंटेंगे। सड़कों पर भीड़ वापस लौट आएगी। वह अपने काम पर लौट सकेगा। बादल छंटने में एक दिन ज्यादा लग गया।

उम्र से कुछ ज्याद ही बूढ़ा लगने वाला पैंसठ साल का करीम। कहां से आया कोई नहीं जानता। वह भी कबरे की तरह अचानक इस इलाके में प्रकट हुआ था। हां, यहां आकर कोलान बस्ती की लावारिस पाइप का मालिक जरूर बन बैठा। सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक सड़क पर भीख मांगता, ‘अल्लाह के बंदे, ईश्वर के नाम पर कुछ दे दे।’ इसका मतलब कोई नहीं समझता था। कुछ लोग समझने की कोशिश करते कि वह अल्लाह का बंदा है या ईश्वर का। किसी को उसके नाम का सही-सही पता नहीं था। हालांकि लोगों की पहचान करने के इच्छुक कुछ लोग इधर उसकी जबान से अनुमान लगाने लगे थे। पर रहीम के लिए सभी ऊपर वाले के बंदे थे। बस्ती के बच्चे, जवान और बूढ़े सब उसे चीलर बाबा कहते थे। नास्तिक हो या आस्तिक, जिसे करीम के चेहरे की मायूसी और झुर्रियां देख कर अपने भविष्य का अक्स दिखाई देता वह कुछ सिक्के उसके कटोरे में डाल देता। उसी से सुबह-शाम वह लल्लन के ढाबे से रोटी-सब्जी ले आता। अब तो उसे याद भी नहीं कि हाथ फैलाने का यह सिलसिला कब शुरू हुआ। जब वह जवान था और इस शहर में काम की तलाश में भटक रहा था, शायद तभी से। तभी से जब वह एक बार बीमार पड़ गया था। कमजोर और बेबस करीम पाइप के पास धूप में लेटा था कि किसी ने कुछ सिक्के उसके सामने फेंक दिए थे। हां, शायद तभी उसने हाथ फैलाने का हुनर सीख लिया था। तब से कई मौसम यों ही बदलते रहे। पाइप के पास सड़क किनारे का, तब का, एक ठिगना गुलमोहर अब आसमान छूने लगा था। शहर की आबादी बढ़ गई। पाइप के पास कचरा बढ़ गया। सड़क पर रोज मिलने वाले कई अधेड़ देखते-देखते बूढ़े हो गए और एक-एक कर गायब होने लगे। अब तो उसके भी पैर कब्र में लटके हुए थे। साथ में कबरे के भी।

रुखसाना का सामना करने की कूवत अब जवाब दे चुकी थी। अपना गांव और परिवार सिर्फ एक सपना-सा लगता था। भ्रम होने लगता है कि सचमुच उसका परिवार था भी कि नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं, वह पागल ही हो, जैसा कि लोग समझते हैं। पागलपन में उसे ऐसा लगता हो कि उसकी एक पत्नी और दो बच्चे थे। पर तमाम घटनाएं और सारे नाम कल्पना कैसे हो सकते हैं? और वे खत क्या थे जो वह रुखसाना को लिखा करता था? उनमें जो पता वह लिखता था, वह कल्पना कैसे हो सकता है? उन खतों को वह लेटर बॉक्स में यह सोच कर कभी नहीं डाल सका कि कहीं ये उसे पकड़वाने का सुराग न बन जाएं।
जानू की गोमती (गुमटी) पर सुबह-सुबह हाथ में बासी अखबार लिए चाय की पहली चुस्की लेते हुए सुखई ने कहा, ‘चार पहिया के दाम गिर गए।’
आसपास दो ही लोग खड़े थे। पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की। वह फिर से बोला, ‘इलेक्ट्रानिक सामान भी सस्ता हुआ है।’  फिर भी दोनों चुप्पी साधे रहे। सुखई इससे बड़ी बात कहने के लिए फड़फड़ाया। बोला, ‘दुनिया जहान का टैक्स हमें (उसने उन दोनों को देखा) देना पड़ता था, अब उसकी जगह एक ही टैक्स देना होगा। सिर्फ एक।’

चाय पीने वालों में एक और बढ़ गया था। सब्जी ठेले वाला रामू। उसने ठहाका लगाया, ‘काकू, सस्ताई की बयार बह निकली है। झोला उठाओ और भर लाओ।’
रामू की बात सुन दोनों चुप्पे आदमियों ने एकाएक ठहाके लगाए। सुखई अगली-बगली झांकने लगा। रामू ने फिर कहा, ‘पर भैया, सस्ताई के जमाने में नोट बड़े महंगे हो गए। दिखते ही नहीं।’ नोटों की बात और एक लंबी खामोशी। जैसे चिता में आग लगा कर लपटों की उंचाई देख रहे हों। आग सबके पेट में थी। जिसकी बुझन महंगी होती जा रही थी। फिर भी उस पेट की बात कोई नहीं कर रहा था। चारों ओर सफेदी की बातें चल रही थीं। काले से सफेद हो रहे नोट, सफेद चरित्र, सफेद चाल-चलन, सफेद और शफ्फाफ सड़कें, मुहल्ले वगैरह। करीम भी आ पहुंचा। चाय पीते हुए सभी की बातें ध्यान से सुनता रहा। चाय की आखिरी घूंट के साथ एक लंबी आह निकली। पेट की आग तो रुखसाना को भी झुलसाती होगी। क्या करती होगी? उसने सोचा और सिहर गया। लेकिन अगले ही क्षण गरदन को झटका, सिर उठा कर सूरज की चटकी देखी और काम पर निकलना पड़ा- अल्लाह के बंदे, ईश्वर के नाम पर…।

शाम होते-होते एक सौ तेरह रुपए जमा कर लिए थे। काफी हैं। यह सोच कर लल्लन के ढाबे का रुख किया। आज थोक में रोटियां खाने का फैसला किया था। लल्लन ने करीम को देखा, ‘कहो चीलर बाबा, कहां खो गए थे?’ चीलर बाबा कहने से करीम बुरा नहीं मानता। वह मुस्करा दिया। आंखें तंदूर से निकल रही रोटियों पर टिकी थीं, जिनकी महक नाक में घुस कर आंतों की ऐंठन बढ़ा रही थी। करीम ने लल्लन की बातों का जवाब दिए बगैर रोटी की तरफ इशारा किया। लल्लन ने जब तक रोटी और आलू की सुरुआ वाली सब्जी पॉलीथीन में पैक कर उसे पकड़ाई, रहीम का धैर्य जवाब देने लगा। मन हुआ वहीं खा ले। लेकिन कबरा भी भूखा था। आसपास कूड़े में मुंह मारने के बावजूद उसका पेट इन दिनों भर नहीं रहा था।  पैसे चुका कर वह बाजार से कोलान बस्ती की ओर भागा। अपने पाइप डेरे के लिए। करीब पहुंचा तो देखा संकरी गलियों में ठसठस भीड़ थी। लोग एक-दूसरे को धकियाते हुए आगे बढ़ रहे थे। करीम ने सोचा, सूरज के चटकी मारते ही लोग बिलों से निकल आए हैं। लेकिन तभी पुलिस की गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया। क्या मामला है, समझ में नहीं आ रहा था। तंदूरी रोटी की खुशबू उसे पागल कर रही थी।पाइप के पास पहुंचा तो पुलिस देख कर हैरान रह गया। तभी अचानक बस्ती के कुछ निठल्ले चिल्लाए, ‘वो देखो, चीलर बाबा।’
‘कौन चीलर बाबा?’ किसी ने पूछा। निठल्लों में से एक ने जवाब दिया, ‘वही, पाइप वाला।’
इतना सुनते ही सब एक साथ चिल्लाए- ‘मारो साले को।’

कुछ लोग ‘पकड़ो-पकड़ो’ कहते उसके पीछे दौड़ पड़े। करीम को माजरा समझ में आए तो दौड़े। उसके पैर धरती पर चिपके रह गए। पर रोटियों पर उसकी पकड़ कस गई। निठल्लों पर इधर कुछ अजीब-सा रंग चढ़ा हुआ था। बात-बात में किसी न किसी को खदेड़ लेते। करीम को लगा, मजाक होगा।
भीड़ देख कर टीआई की मूछें मुस्करार्इं। वह जीप में बैठ गया। हार्न बजाती पुलिस जीप फुर्र हो गई। करीम मुहल्ले के निठल्लों की गिरफ्त में था। भीड़ में काले धन की बातें हो रही थीं। रोटियों का पैकेट नीचे गिर चुका था। सुरुआ बिखर गया था। लोग दनादन लात-घूंसे बरसा रहे थे। कबरा पहले तो निठल्लों की तरफ भोंका, लेकिन भीड़ का गुस्सा देख कर उसकी दुम अंदर चली गई। वह उसी पाइप की ओर भागने लगा जहां से पुलिस ने अभी-अभी नोटों से भरा थैला बरामद किया था और उसे लेकर लौट चुकी थी। उसी पाइप की ओर जिस पर स्कूली बच्चों ने अशुद्ध हिंदी में ‘चिल्लर बाबा का पईप’ लिखा था।
नोटों से भरे थैले के बारे में सुन कर चीलर बाबा हैरान था। थैला हवा में उड़ कर पाइप के अंदर आ गया होगा? कितना बड़ा होगा? नोटों की गड्डियां कैसी होती होंगी? उसे रुखसाना की लौंग का बैंगनी रंग, नन्ही सबीरा की गुलाबी उंगलियां और कबरा याद आया और फिर सब कुछ काला हो गया। लोगों के लिए आज ‘चीलर’ का मतलब ‘चिल्लर’ हो गया था। वे आश्चर्य से फुसफुसा रहे थे कि चिल्लर बाबा के पास इतने नोट? कुछ लोग खुश थे कि कैसे-कैसे अविश्वसनीय ठिकानों से काला धन बाहर आ रहा है।

 

 

 

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