ताज़ा खबर
 

जुगाड़ का जलवा

वर्तमान सरकार स्किल इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया जैसी योजनाओं के तहत नवाचारी युवाओं को प्रोत्साहित कर रही है। इन योजनाओं में जुगाड़ तकनीक विकसित करने वालों की क्या जगह है, बता रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।

Author November 26, 2017 01:27 am

कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है। हमारे देश में अनेक लोगों ने साधनहीनता के चलते या फिर अपने जुनून के बल पर ऐसे अनेक उपकरण तैयार किए हैं, जिनका उपयोग बड़े पैमाने पर होता है और वे किसी भी नामी कंपनी द्वारा तैयार किए गए उपकरणों की तुलना में सस्ते पड़ते हैं। इन्हें दुनिया भर में जुगाड़ तकनीक के नाम से जाना जाता है। वर्तमान सरकार स्किल इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया जैसी योजनाओं के तहत नवाचारी युवाओं को प्रोत्साहित कर रही है। इन योजनाओं में जुगाड़ तकनीक विकसित करने वालों की क्या जगह है, बता रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।

स्टार्टअप के मौजूदा माहौल और स्किल इंडिया जैसी सरकारी मुहिमों का आगे चल कर क्या अंजाम निकलेगा- यह कोई नहीं जानता, पर इस बात की तसल्ली अपने देश में हर दूसरे शख्स को होती है कि जब भी कहीं कोई समस्या सिर पर आ पड़ेगी, तो किसी न किसी जुगाड़ से उसका हल जरूर निकल आएगा। आम बोलचाल में लोग कहते भी हैं कि भारत तो जुगाड़ का देश है। जहां इंजीनियरिंग खत्म होती है, वहां से जुगाड़ शुरू होता है। यह भी खूब देखने को मिलता है कि तकनीक चाहे जितनी तरक्की कर ले, वह जुगाड़ का मुकाबला फिर भी नहीं कर सकती है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिक भी स्वीकार करते हैं कि नवाचार यानी इनोवेशन की प्रेरणा उन लोगों से ही मिली है जो बेहद सीमित संसाधनों में और सिर्फ अपनी जिज्ञासा के बल पर कोई ऐसा जुगाड़ बना बैठे, जो आगे चल कर एक कामयाब आविष्कार में बदल गया। जुगाड़ सभी जगह चलता है। देश की राजधानी दिल्ली के इर्द-गिर्द शहरों-कस्बों में जुगाड़ सड़कों पर फर्रांटा भरते नजर आते हैं। मोटरसाइकिल के इंजन, स्टीयरिंग और रिक्शा-साइकिल के पहियों से बने ये जुगाड़ खेतों की फसल से लेकर शहरों में वजनदार सब्जी-भाजी, रद्दी और दूसरी चीजों को आसानी से ढोते लेते हैं। कहीं-कहीं तो उनसे सवारियां भी ढोई जाती हैं। मजे की बात यह कि इन पर न तो नंबर प्लेट होती है, न चलाने वाले के पास ड्राइविंग लाइसेंस। दावा तो यह भी किया जाता है कि पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा में दौड़ते ऐसे ही जुगाड़ों को देख कर रतन टाटा को नैनो कार बनाने का खयाल आया।

इस दावे में सच्चाई भले न हो, लेकिन यह सच है कि कइयों को ऐसे जुगाड़ प्रेरित अवश्य करते हैं। जैसे, कुछ समय पहले मुंबई के सोमैया इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों के एक करिश्मे के बारे में खबरें आई थीं। इन छात्रों ने एक ऐसी कार बनाई थी जो एक लीटर पेट्रोल में तीन सौ किलोमीटर की दूरी तय कर सकती है। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि उन्होंने इस कार को ‘जुगाड़’ नाम दिया था। करीब साठ किलो वजनी इस कार को बनाने वाले छात्रों में से एक, कुणाल जैन ने बताया था कि कॉलेज की लाइब्रेरी में ‘जुगाड़ इनोवेशन’ शीर्षक वाली एक किताब से उन्हें इस कार को बनाने की प्रेरणा मिली, इसलिए इस कार का नाम ‘जुगाड़’ रखा। खबर यह भी आई थी कि इस ‘जुगाड़’ कार को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए मलेशिया में आयोजित शेल इको-मैराथन में शामिल कराया गया, जहां दूसरे जुगाड़ू वाहनों से उसकी माइलेज का आकलन किया गया। कभी-कभी ऐसे जुगाड़ बनाने वाले सम्मानित भी होते रहे हैं। जैसे अमलनेर तहसील के पिंगलवाड़ा में रहने वाले एक शख्स विकास शिंदे को जमीन से पानी निकालने वाली मोटर साइकिल बनाने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। बताया जाता है कि विकास ने बीस से ज्यादा ऐसे औजार जुगाड़ से बनाए हैं।

ऐसे ही असम के लखीमपुर जिले के एक जुगाड़ू, उद्धव भाराली की खूब चर्चा है। वे अब तक एक सौ चालीस से ज्यादा चीजें बना चुके हैं, जिनमें से कुछ सामान तो बाजार में भी खरीदे-बेचे जा रहे हैं। जैसे उन्होंने सीमेंट से र्इंटें बनाने वाली मशीन बनाई, जिसे पांच लोग मिल कर चलाते हैं। यह मशीन इतनी हिट रही कि अब तक वे दो सौ से ज्यादा मशीनें स्थानीय बाजार में बेच चुके हैं। इसी तरह का एक जुगाड़ उन्होंने चावल का आटा तैयार करने वाली मशीन के रूप में किया है, जिसे उनके बनाए दो केंद्रों में से एक पर आकर महिलाएं इस्तेमाल करती हैं और चावल के आटे के केक और अन्य सामान बना कर बाजार में बेचती हैं। उद्धव भराली को तो वैसे देश में उनके कृषि संबंधी उपकरणों के लिए जाना जाता है, लेकिन उनका एक योगदान जुगाड़ू उपकरणों से विकलांगों की मदद करना भी है। उन्होंने विकलांग राज रहमान नामक किशोर के लिए एक कृत्रिम हाथ तैयार किया है। इस बेहद सस्ते कृत्रिम हाथ की सहायता से रहमान अब खाना खा पाता है और थोड़ा-बहुत लिख भी लेता है।

जुगाड़ कैसे-कैसे
वाट्सऐप के इस जमाने में हर दूसरे दिन किसी न किसी ग्रुप में अलबेले जुगाड़ों की कोई फोटो या जानकारी लोगों के पास आती रहती है। ये सारे जुगाड़ बेहद कम कीमत पर तैयार होते हैं और ऐसे-ऐसे कामों को आसान बना देते हैं, जिनके बारे में पहले कभी शायद सोचा तक न गया हो। हाल के वर्षों में इनमें से कुछ तो वाट्सऐप और फेसबुक की बदौलत पूरे देश में चर्चित भी रहे। खासकर खेती-किसानी से जुड़े कामकाज के जुगाड़ हर मौसम में वाट्सऐप पर छाए रहते हैं।

बाइक से चलाया पानी का पंप
राजस्थान के सीकर में रहने वाले एक किसान महेंद्र बीरड़ा ने खेतों की सिंचाई करने के लिए एक ऐसा देसी आविष्कार किया है, जिसमें पानी और बिजली, दोनों की बचत होती है। असल में, सिंचाई के लिए पानी की कमी के मद्देनजर उन्होंने पानी जमा करने का इंतजाम तो कर लिया था, लेकिन समस्या थी कि जरूरत पड़ने पर उसे खेतों तक कैसे पहुंचाया जाए, क्योंकि बिजली का संकट इसमें बाधा था। इसका रास्ता उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल से निकाला। अपनी बाइक से पानी खींचने वाले पंप को जोड़ने के उन्होंने कुछ जुगाड़ किए, जिसके बाद बाइक चालू करते ही पंप तीन हार्सपावर की ताकत से चलने लगा और पानी खींच कर खेतों तक पहुंचाने लगा। बाइक से जुड़ा यह पंप हर मिनट चालीस लीटर पानी खींचता है। एक लीटर पेट्रोल से तीस फीट नीचे से छब्बीस हजार लीटर पानी खींचा जा सकता है। अगर इतने काम के लिए वे बिजली कनेक्शन लेते, तो हर महीने डेढ़ हजार रुपए खर्च होते। फिलहाल महेंद्र इस जुगाड़ से हर दिन पांच हजार लीटर पानी निकालते हैं और इस काम में पेट्रोल के सिर्फ बीस रुपए खर्च होते हैं। यह जुगाड़ करीब पैंतालीस कोशिशों के बाद बन सका।

मोटरसाइकिल में हल
बाइक के सहारे खेती के कुछ और चमत्कारी जुगाड़ भी किए गए हैं। जैसे- राजस्थान के ही भीलवाड़ा के एक गांव भगवानपुरा के किसान पारस जब खेत जोतने के लिए ट्रैक्टर का इंतजाम नहीं कर पाए, तो उन्होंने बाइक को ही जुताई का साधन बना लिया। उन्हें इसकी प्रेरणा गुजरात के राजकोट शहर से मिली थी, जहां अपने डेढ़ दशक प्रवास के दौरान उन्होंने कई किसानों को इसी तरह के जुगाड़ करते हुए देखा था। अपने खेतों की जुताई के लिए पारस ने एक पुरानी कबाड़ हो चुकी बाइक, लोहे के पाइप, एंगल आदि खरीदे और उनका एक हलनुमा ढांचा वेल्डिंग करवा कर बनाया। इस सबमें करीब पच्चीस हजार रुपए खर्च हुए, लेकिन यह जुगाड़ उनके खेतों के लिए कारगर साबित हुआ। दावा है कि जुताई के अलावा निराई-गुड़ाई आदि करीब बीस मजदूरों के बराबर काम उनका यह जुगाड़ हल कर देता है।  इस किस्म के जुगाड़ ट्रैक्टर कई और राज्यों के किसानों ने भी बनाए हैं। धनबाद के झरिया उपर डुंगरी गांव के किसान पन्ना लाल महतो की भी है जिन्होंने ट्रैक्टर और बैल का काम सिर्फ दस हजार रुपए में तैयार साइकिल जुगाड़ हल से करवा लिया। यह जुगाड़ खेतों की जुताई के अलावा सिंचाई के काम भी आता है। एक तरह से वे जुगाड़ुओं के रोल मॉडल हैं।

इल्ली भी मारें जुगाड़ से
इसमें शक नहीं कि हमारे देश में शायद किसानों ने ही सबसे ज्यादा जुगाड़ बनाए और आजमाए हैं। इसमें भी उनका महारत तब दिखता है, जब कोई किसान इल्ली मारने के लिए भी रासायनिक छिड़काव के बजाय देसी जुगाड़ निकाल लेता है। यह काम मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले की सुवासरा तहसील में रहने वाले किसान राधेश्याम पाटीदार ने किया। उन्होंने इल्ली मारने का एक यांत्रिक तरीका निकाला। इसके लिए उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल में बांस का एक डंडा फिट किया, जो फसल पर बैठी इल्लियों से टकराता है। बांस से टकराने के कारण इल्लियां जमीन पर गिर जाती हैं, जिन्हें कुरपन के जरिए मिट्टी में हाथोंहाथ दबा दिया जाता है। दावा है कि इससे अस्सी फीसद इल्लियों का सफाया हो जाता है।
फसलों पर दवा छिड़कने के लिए भी कुछ किसानों ले शानदार जुगाड़ खड़े किए हैं। मध्यप्रदेश के नीमच जिले की जावद तहसील के गांव नानपुरिया के किसान भगत सिंह जाट ने सोयाबीन की फसल पर दवा छिड़कने का एक जुगाड़ अपनी बाइक पर बनाया है। इस जुगाड़ के जरिए बारह नोजलों से दवा छिड़की जाती है और यह काम बड़ी तेजी से निपट जाता है। धार जिले के किसान रवि पटेल ने फसल को लंबे समय तक टिकाए रखने की देसी तकनीक अपने दम पर विकसित की। उन्होंने प्याज को सड़ने से बचाने के लिए जुगाड़ू कोल्ड स्टोरेज बनाया है। इसके लिए उन्होंने लोहे के ड्रम लेकर उनमें एक्जास्ट पंखे फिट करवाए और जमीन पर रखे प्याज के ढेर को चारों तरफ से हवा पहुंचाने का देसी इंतजाम किया। ऐसे दौर में जब देश में गाहे-बगाहे सरकारी गोदामों में हजारों क्विंटल गेहूं-धान और आलू-प्याज सड़ने की खबरें आती रहती हैं और लगातार महंगा होता प्याज जनता की आंखों में आंसू लाता रहता है, रवि पटेल का जुगाड़ बेहद सराहनीय माना जाएगा।

ऐसा ही एक करिश्मा सागर जिले के केरिया गांव के लाखन पटेल ने किया। उन्होंने खेत में सिंचाई के लिए लगे मोटर पंप को घर बैठे स्टार्ट करने का कामयाब नुस्खा खोज निकाला। इसके लिए उन्होंने एक डिवाइस बनाई, जिससे जुड़ा एक सिम अपने मोबाइल में और दूसरा उस डिवाइस में लगाया, जो खेत पर लगे मोटर पंप के स्टार्टर को चालू या बंद करता है। इसकी मदद में बार-बार खेत पर जाने की झंझट खत्म हो गई और वह घर बैठे ही फसल की सिंचाई करने में सफल हो गए। उनकी यह डिवाइस सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि कुछ कंपनियों ने इससे प्रेरणा लेकर जीएसएम कंट्रोलर नामक तकनीक के साथ एक उपकरण बाजार में उतार दिया।

कहां से मिलती है प्रेरणा
अपने आप में कोई भी जुगाड़ एक छोटा-मोटा आविष्कार है। दो चीजें किसी को ऐसा नया कुछ करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं- एक, नाकामी और दूसरी, रास्ता खोजने की बेचैनी। केंब्रिज यूनिवर्सिटी के बिजनेस स्कूल से आए जयदीप प्रभु ने जुगाड़ पर एक किताब लिखी है। इस बारे में उनका मत है कि कोई भी नाकामी किसी सफलता का पहला कदम है। विफलता एक किस्म की बेचैनी पैदा करती है, जिसमें कुछ लोगों की स्वाभाविक प्रतिभा समस्या का समाधान खोजने में लग जाती है। यह समाधान कैसे होगा, कौन से ऐसे संसाधन इसके लिए जरूरी होंगे, जो आसानी से और सस्ते में मिल जाएं- यह खोजबीन ही हमें या तो किसी नए आविष्कार या फिर किसी जुगाड़ की तरफ ले जाती है।  उद्धव भाराली का कहना है कि आविष्कार पैदा करने की प्रेरणा किसी व्यक्ति के खुद के अंदर से आती है। कोई दूसरा आपको इसके लिए प्रेरित नहीं कर सकता। खुद के बारे में उनका कहना है कि लोग उन्हें नई चीजें बनाने की चुनौती देते हैं और वे उस चुनौती का आनंद लेते हैं। हमेशा इस कोशिश में जुटे रहते हैं कि कैसे कोई नई चीज बनाएं। उन्हें यह अहसास भारी खुशी देता है कि वे किसी चीज को बनाने वाले पहले शख्स हैं।

बाधाएं कम नहीं
हालांकि जुगाड़बाजों की भरमार देख कर हमारा देश जुगाड़-नेशन कहलाने का हकदार हो सकता है, पर यह देखना तकलीफदेह है कि अब भी नया खोजने वालों की देश में ज्यादा कद्र नहीं है। उन्हें यह सब कुछ अपने दम पर करना है और उसकी जानकारी भी खुद के प्रबंधों से आगे पहुंचानी है।
कहने को तो स्टार्टअप और स्किल इंडिया जैसी योजनाएं देश में चल रही हैं और कुछ एनजीओ ऐसे कामों में मददगार साबित होते हैं, पर कोई ऐसा पुख्ता मंच दिखाई नहीं देता, जहां पहुंच कर किसान, धोबी, स्कूटर-साइकिल में पंचर लगाने वाला अपने जुगाड़ की कहानी बताए और उसे बड़े पैमाने पर बनाने-बेचने का जरिया पा जाए। १

क्या उड़ पाएगा जुगाड़-विमान

छोटे-मोटे और काम के जुगाड़ों की तो देश में लंबी फेहरिस्त है, लेकिन अगर कोई जुगाड़ तकनीक से विमान ही बना डाले तो इस पर हैरानी जगना स्वाभाविक है। यह करिश्मा किया है मुंबई में एक निजी एयरलाइंस के पायलट अमोल यादव ने। अमोल ने अपने घर की छत पर छह सीटों वाला विमान बना डाला। उनकी इस परियोजना को देश के मेक इन इंडिया कार्यक्रम की स्वीकृति मिल चुकी है, पर अभी इसकी असली उड़ान होनी बाकी है।  अमोल ने इसकी तैयारी काफी पहले शुरू कर दी थी। इसके लिए अमोल ने 1998 में भारतीय सेना द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले एक ट्रक का छह सिलेंडर वाला पेट्रोल इंजन खरीदा था और उससे विमान बनाने की कोशिश की थी। यह कोशिश सिरे नहीं चढ़ी तो 1999 में उन्होंने आठ सिलेंडर वाला पेट्रोल आॅटोमोबाइल इंजन खरीदा। इस इंजन को लगा कर बनाए गए विमान का उन्होंने एक सड़क पर परीक्षण भी किया था। इस परीक्षण के बाद 2004 में सरकार के मंत्री से मिल कर अपने ट्विन-इंजन टर्बोप्रॉप विमान का परीक्षण करने का निवेदन किया था। मंत्री महोदय ने विमानन मंत्रालय के अधिकारियों को अमोल के घर जाकर विमान का परीक्षण करने को कहा था, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी।

इसके बाद 2011 में उन्होंने डीजीसीए को प्रयोगात्मक विमानन श्रेणी में अपना विमान दर्ज करने और उसे उड़ाने की अनुमति देने के लिए आवेदन दिया, लेकिन 2014 में वह यह देख कर हैरान रह गए कि डीजीसीए ने ऐसे प्रयोगात्मक विमानों के बारे में अपने नियम ही बदल दिए। नए नियमों के तहत डीजीसीए से सिर्फ कंपनियों द्वारा बनाए विमानों की उड़ान की अनुमति मिल सकेगी, जबकि पहले अनुभवहीन व्यक्ति या छोटी टीमें भी ऐसे विमान प्रयोगात्मक रूप से उड़ा सकते थे। हालांकि पिछले दिनों खबर आई है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के दखल के बाद अमोल के प्रोजेक्ट की बाधाओं को खत्म किया जा रहा है। हो सकता है कि जल्द ही अमोल का देसी जुगाड़-विमान अपनी प्रायोगिक उड़ान भर पाए।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App