jansatta special story about kunwar narayan - Jansatta
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खांचों से बाहर

वे जिजीविषा के कवि थे। इसलिए उनकी कविताओं में बार-बार मृत्यु के पार जाने का प्रयास दिखाई देता है। उनकी कविता बार-बार ‘मैं कौन हूं, क्या हूं’ जैसे प्रश्नों से टकराती है।

Author November 19, 2017 1:47 AM
कुंवर नारायण 90 वर्ष के थे।

कुंवर नारायण यथार्थ के नहीं, सत्य के अन्वेषक कवि थे। जीवन के सत्य को तलाशते हुए उनकी कविता के तंतु आकार लेते हैं। वे जिजीविषा के कवि थे। इसलिए उनकी कविताओं में बार-बार मृत्यु के पार जाने का प्रयास दिखाई देता है। उनकी कविता बार-बार ‘मैं कौन हूं, क्या हूं’ जैसे प्रश्नों से टकराती है। हालांकि इसका यह अर्थ कतई नहीं कि वे अपनी दुनिया के बजाय पारलौकिक रहस्यों को खोलने में मुब्तिला थे या किसी गहन दर्शन के आवरण में कविता बुनते थे। वे अपने समय की धड़कन को बहुत नजदीक से सुनने, जानने, पहचानने वाले कवि थे। वे जीवन के मर्म, उसकी विडंबनाओं तथा उसके संघर्षों के कवि थे। पर वे किसी वैचारिक धारा में बह कर कविता नहीं लिखते थे, इसलिए किसी बने-बनाए खांचे में फिट करके उनकी कविताओं के अर्थ खोलना मुश्किल है।  कुंवर नारायण ‘तीसरा सप्तक’ के कवियों में थे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कविता के किस स्वरूप के हिमायती थे। वह कविता में प्रयोग का दौर था, जिसे नई कविता के नाम से भी जाना गया। प्रयोगवादी कवियों का प्रयास था कि कविता में यथार्थ के नाम पर नारेबाजी, जुमलेबाजी और भाषा में अनावश्यक अनगढ़पन लाने की प्रवृत्ति से मुक्ति दिलाई जाए। हालांकि प्रयोगवादी कविता को मार्क्सवादी कविता के प्रतिकार स्वरूप पैदा हुआ स्वर भी माना जाता है, पर कुंवर नारायण ने ऐसी किसी मंशा से कविता को कोमल और बिंबप्रधान स्वर देने का प्रयास नहीं किया। उनका मानना था कि कविता जीवन के तंतुओं को पकड़ती है, उसी से संवेदित होती और फूट पड़ती है। वह जीवन में केवल भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संघर्ष नहीं है। उसके परे भी भावना के स्तर पर मनुष्य के भीतर बहुत कुछ घटित होता रहता है। इसलिए कुंवर नारायण ने उस पर अधिक ध्यान दिया जो मनुष्य के भीतर घटता है।

ऐसा नहीं कि मार्क्सवाद से उनका कोई बैर था या वे उसके खंडन या प्रतिवाद में लिखने को उत्सुक रहते थे। मगर वे मानते थे कि जैसे ही रचनाकार किसी वैचारिक आग्रह से आबद्ध हो जाता है, उसकी रचना कमजोर पड़ जाती है, विचार ऊपर हो जाता है। इसलिए वे जीवन के रेशों को बारीकी से पकड़ते और फिर उसे कविता के भीतर धीरे से पिरो देते थे। उनका कहना था कि ‘क्रिस्तॉफ क्लिस्वोव्स्की, इग्मार बर्गमैन, तारकोव्स्की, आंद्रेई वाज्दा आदि मेरे प्रिय फिल्मकार हैं। इनमें से तारकोव्स्की को मैं बहुत ज्यादा पसंद करता हूं। उसको मैं फिल्मों का कवि मानता हूं। हम शब्द इस्तेमाल करते हैं, वे बिंब इस्तेमाल करते हैं, लेकिन दोनों रचना करते हैं। कला, फिल्म, संगीत ये सभी मिलकर एक संस्कृति, मानव संस्कृति की रचना करते हैं, लेकिन हरेक की अपनी जगह है, जहां से वह दूसरी कलाओं से संवाद स्थापित करे। साहित्य का भी अपना एक कोना है, जहां उसकी पहचान सुदृढ़ रहनी चाहिए। उसे जब दूसरी कलाओं या राजनीति में हम मिला देते हैं तो हम उसके साथ न्याय नहीं करते।’ कुंवर नारायण का अध्ययन विशद था और उन्होंने साहित्य के अलावा सिनेमा, संगीत, रंगमंच और कलाओं पर काफी गंभीरता से और विपुल लिखा है।

उन्होंने कहानियां भी लिखीं और कई विदेशी लेखकों की रचनाओं के अनुवाद भी किए। फिल्म पर लिखी उनकी टिप्पणियां हिंदी में फिल्म समीक्षा के लिए मानक मानी गर्इं।  वे बार-बार मिथकों के जरिए अपने समकाल को पकड़ने, पहचानने और व्याख्यायित करने का प्रयास करते हैं। वे जीवन को सही तरीके से समझने के लिए जीवन की अनश्वरता को महत्त्वपूर्ण मानते थे। उसी अनश्वरता को व्याख्यायित करने के लिए उन्होंने नचिकेता को प्रतिमान बनाया और ‘आत्मजयी’ की रचना की। नचिकेता मृत्यु के पार जाकर जीवन के अर्थ खोलने का प्रयास करता है। इस तरह ‘आत्मजयी’ मूलत: मनुष्य की रचनात्मक सामर्थ्य में आस्था की पुनर्प्राप्ति की कहानी है। इसमें आधुनिक मनुष्य की जटिल नियति से एक गहरा काव्यात्मक साक्षात्कार है।’ बाद में वे ‘वाजश्रवा के बहाने’ जीवन और मृत्यु के प्रश्नों से अधिक मनुष्य के भीतरी उद्वेलन को रूपायित करते हैं। वाजश्रवा के भीतर हो रही हलचलों को, उस अमूर्त भाव को मूर्त रूप देकर कुंवर नारायण कविता में प्रयोगधर्मिता की चमत्कृत करने वाली शैली से परिचित कराते हैं।  इसके अलावा वे अपनी अनेक कविताओं में जीवन के रहस्यों को खोलने की जद्दोजहद करते नजर आते हैं: ‘जानता हूं मेरी बार्इं तरफ क्या है/ जानता हूं मेरी दार्इं तरफ क्या है/ जानता हूं आगे बढ़ते जाने की व्यर्थता/ जानता हूं पीछे छूट जाने की व्यथा/ मैं दिक्भ्रमित नहीं/ एक जानकार की उदासीनता हूं :/ कल जो होगा आज की ताजा खबरों में/ उस कल भी हो चुके की एक और प्राचीनता हूं।…’ (इन दिनों : चौराहे पर बुत) इस तरह वे जाने हुए, देखे हुए, दिख रहे सत्य के पार जाकर शाश्वत सत्य को समझने का प्रयास करते हैं। उसमें वैचारिक धाराएं अड़चनें पैदा करेंगी, इसलिए वे मुक्त चिंतक-भाव से जीवन के तमाम प्रश्नों, अपने आसपास की स्थितियों को उनसे जोड़ते हुए नए अर्थ तलाशते नजर आते हैं। वे जीवन में आस्था के कवि थे।

उनका हर कविता संग्रह नए ढंग से कविता को समझने का अवसर देता है। ‘परिवेश हम तुम’ में मानवीय संबंधों की गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास है तो ‘इन दिनों’ की कविताएं अपने परिवेश, अपने समय को लेकर मन में उठ रही हलचलों को, जीवन और जीजिविषा को रूपायित करती हैं। कुंवर नारायण स्वतंत्र व्यक्तित्व और मूलत: रचनाकार थे। साहित्य और कलाओं के अलावा उनका मन कहीं और रमा ही नहीं। अच्छा-खासा पुश्तैनी व्यवसाय होने और उसे संभालने के लिए बाध्य किए जाने के बावजूद उन्होंने अपने को उससे एक तरह से अलग ही रखा। स्वतंत्र वृत्ति और अध्ययन, चिंतन के चलते उनका मिजाज काफी कुछ दार्शनिक जैसा था, जो कि उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट दीखता है।
(आयोजन : सूर्यनाथ सिंह)

 

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