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खुशियां बांटते वे लड़के

उनके काम के घंटे तय नहीं हैं, यह तय नहीं है कि उन्हें अपनी कमर पर कितने किलोग्राम वजन ढोना है, उनकी साफ-सफाई का भी कोई इंतजाम नहीं है। अधिक काम करने के बावजूद उन्हें कोई बोनस नहीं दिया जाता, उन्हें रविवार तक की छुट्टी नहीं मिलती।

देश में कुल कितने डिलीवरी बॉय होंगे, इसका कोई अधिकृत आंकड़ा नहीं है। इसकी वजह है कि इतने बड़े कारोबार में डिलीवर बॉयज अभी असंगठित हैं।

पिछले कुछ सालों में लोगों की खरीदारी की आदतें बदली हैं। घर बैठे इंटरनेट के जरिए सामान खरीदने का चलन काफी बढ़ा है। राशन, फल-सब्जी जैसी रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं की खरीदरी हो या फिर सजावट के सामान, वस्त्र, किताबें, दवाइयां, मनोरंजन की चीजें या फिर पका-पकाया भोजन, सब कुछ अब इंटरनेट पर मांग प्रेषित कर आसानी से पाया जा सकता है। इंटरनेट के जरिए यह कारोबार करने वाली अनेक कंपनियां मैदान में उतर चुकी हैं। उनमें आपसी प्रतिस्पर्धा विकसित हो चुकी है। ऐसे में वस्तुएं पहुंचाने की जिम्मेदारी वितरण करने वाले लड़कों पर आती है। हर शहर में अब युवाओं के लिए सामान वितरण का रोजगार सहज उपलब्ध है। सामान वितरण करने वाले इन लड़कों की जिंदगी कैसी है, बता रहे हैं सुधांशु गुप्त।

एक हाथ में फोन, दूसरे में हेलमेट, पीठ पर भारी-भरकम थैला, मोटर साइकिल पर सवार बीस-तीस साल उम्र के युवक, आंखों में किसी पते की तलाश… यही हैं डिलीवरी बॉयज। अधिक से अधिक सामान पहुंचाने की तेजी मानो इनके व्यवहार को भी बदल रही है। तापमान चाहे अड़तालीस डिग्री सेल्सियस हो या चार डिग्री, इनके काम करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं आता। इन्हें अपना लक्ष्य हमेशा दिखाई देता रहता है। ये जानते हैं कि लक्ष्य पूरा न करने का अर्थ है आर्थिक नुकसान। बेशक आप इनका नाम नहीं जानते, यह भी नहीं जानते कि ये कौन हैं, कहां से आए हैं, इनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि क्या है, लेकिन आप इतना अवश्य जानते हैं कि ये अब आपकी जीवन-शैली का हिस्सा हो चुके हंै। घर बैठे जो सामान आप आॅनलाइन मंगाते हैं, उन्हें आप तक पहुंचाने की जिम्मेदारी इन्हीं डिलीवरी बॉयज की है। अगर आप पीछे मुड़ कर कुछ दशकों पर नजर डालें तो पाएंगे कि उस समय डिलीवरी बॉयज की कोई अवधारणा नहीं थी। लेकिन बीसवीं सदी के अंतिम दशक में जब आर्थिक उदारीकरण, संचार क्रांति, कंप्यूटर क्रांति, इंटरनेट और वैश्वीकरण का असर भारतीय समाज पर पड़ना शुरू हो गया था, जब किसी की कल्पना में नहीं था कि फर्नीचर, एसी, कंप्यूटर, कपड़े, जूते, सौंदर्य प्रसाधन, मोबाइल और टीवी तक घर बैठे खरीदे जा सकेंगे, तभी डिलीवरी बॉयज की अवधारणा को साकार करने में जुटी थी एक कंपनी रिडिफ। शायद यह पहली कंपनी थी, जो उत्पादों को सीधे आपके घर तक पहुंचाने का प्रयास कर रही थी। रिडिफ ने भारत में आॅनलाइन खरीदारी की बड़ी संभावना देखी और ई-कॉमर्स पोर्टल की शुरुआत की। परंपरागत ढंग से खरीदारी करने के आदी भारतीय समाज को यह बात रास नहीं आ रही थी कि बिना किसी सामान को देखे, बिना हाथ लगाए और बिना किसी मोलभाव के सामान कैसे खरीदा जा सकता है। लेकिन इसी दौर में एक ऐसी नस्ल बड़ी हो रही थी, जिसने आर्थिक उदारीकरण के बाद जन्म लिया। यह पीढ़ी तकनीक प्रेमी थी। मोबाइल और कंप्यूटर पर खेल कर ही यह बड़ी हुई थी। खरीदारी के परंपरागत तरीके इसे नहीं सुहाते थे। यह अपना अधिकतर काम मोबाइल पर ही निपटाना चाहती थी। लिहाजा, दो दशकों में ई-कॉमर्स का कारोबार अरबों-खरबों में पहुंच गया। फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, मिंत्रा, अमेजन जैसी सैकड़ों कंपनियां सामने आर्इं, जो ई-कॉमर्स में अपनी किस्मत आजमा रही थीं।

आश्चर्यजनक रूप से परंपरागत भारतीय समाज ई-शॉपिंग का इतना आदी होता चला गया कि वह जूते से लेकर पित्जा तक और कमीज से लेकर जांघिया-बनियान तक आॅनलाइन मंगाने लगा। ई-कॉमर्स से जुड़ी इन कंपनियों को उत्पादों को लोगों तक पहुंचाने के लिए जिस व्यक्ति की जरूरत सबसे ज्यादा हुई, वह है डिलीवरी बॉय। देखते-देखते भारत में ई-कारोबार 16.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया और डिलीवरी ब्वॉज इसकी रीढ़ बन गए। ये आंकड़े पढ़ कर ऐसा लग सकता है कि अगर इतने बड़े कारोबार की रीढ़ ये डिलीवरी बॉयज हैं, तो यकीनन इनका सामाजिक और आर्थिक स्तर बेहतर होगा। लेकिन ऐसा है नहीं। इनके काम की स्थितियों पर नजर डालें तो पता चलता है कि एक डिलीवरी बॉय फरीदाबाद में रहता है। सुबह सात बजे घर से निकलता है। सवा आठ बजे ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, दक्षिणी दिल्ली पहुंचता है। यानी लगभग इक्कीस किलोमीटर का सफर तय करता है। साढ़े आठ बजे उसे गोदाम पहुंचना होता है, जहां से वह पार्सल उठाता है। इसके बाद वह उन पैकेटों को लोगों तक पुहंचाने के लिए मोटरसाइकिल पर निकल पड़ता है। उसे पूरे दिन में लगभग साठ-सत्तर पैकेट पहुंचाने होते हैं। कंधे पर थैले में इन्हें दस से बीस किलो वजन ढोना होता है। इस दौरान उसे कुछ खाना-पीना भी होता है। यानी पूरा दिन थकाने वाला होता है।

एक डिलीवरी बॉय है। इलाहबाद से हिंदी साहित्य में बीए करने के बाद नौकरी की तलाश उसे दिल्ली ले आई। किसी मित्र की सिफारिश पर उसे डिलीवरी बॉय का काम मिल गया। नौकरी देने से पहले कंपनी ने उससे आधार कार्ड, पैन नंबर और ड्राइविंग लाइंसेस मांगा। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि उसने कहां तक पढ़ाई की है। कहा जा सकता है कि आवास प्रमाणपत्र और गड़ी चलाने आना इस पेशे में आने की अनिवार्य शर्तें हैं। इस डिलीवरी बॉय का कहना है कि उसे दिन में दो चक्कर लगाने पड़ते हैं। पहली खेप में पचास पार्सल पहुंचाने पड़ते हैं और दूसरी खेप में लगभग बीस। देश में कुल कितने डिलीवरी बॉय होंगे, इसका कोई अधिकृत आंकड़ा नहीं है। इसकी वजह है कि इतने बड़े कारोबार में डिलीवर बॉयज अभी असंगठित हैं। अधिकतर ई-कंपनियां डिलीवरी के काम को आउटसोर्स करती हैं। यानी डिलीवरी का काम कूरियर कंपनियां या अन्य एजेंसियां करती हैं। ये कंपनियां डिलीवरी बॉय को औसतन दस से बीस हजार रुपए प्रतिमाह और कुछ अतिरिक्त भुगतान करती हैं। इनके काम के घंटे अलग-अलग होते हैं। मसलन, दिल्ली में दो पाली में काम होता है। सुबह आठ बजे से चार बजे तक और सुबह सात बजे से शाम सात बजे तक। कहीं-कहीं तो इन्हें बारह घंटे काम करना होता है। लेकिन इन्हें औसतन नौ घंटे काम करना ही होता है। डिलीवरी बॉय का काम केवल पार्सल पहुंचाना नहीं है, बल्कि ग्राहकों की उम्मीदों और प्रतिक्रियाओं को भी गौर से देखना होता है। कई बार डिलीवरी बॉयज को खराब ग्राहक मिलते हैं और कई बार अच्छे। खराब ग्राहक का अर्थ है, जो बात-बात पर चिकचिक करे और उनका समय खराब करे। जबकि अच्छे ग्राहक अच्छी तरह बात करते हैं और बिना समय गंवाए अपना पार्सल ले लेते हैं।

दिवाली जैसे त्योहारों पर अक्सर डिलीवरी बॉयज को अधिक काम करना होता है। त्योहार के मौके पर लोग बहुत ज्यादा उपहार भेजते हैं। इसलिए उन्हें अधिक से अधिक पार्सल डिलीवर करने होता है। एक डिलीवरी बॉय का कहना है कि दिवाली जैसे त्योहारों पर पार्सल लोगों तक पहुंचाना ऐसा लगता है कि हम लोगों के बीच खुशियां बांट रहे हैं। स्नैपडील, फ्लिपकार्ट, अमेजन और ईबे जैसी कुछ कंपनियों में दिवाली की छुट्टी होती है, जबकि कुछ अन्य कंपनियां दिवाली पर छुट्टी के बजाय अतिरिक्त पैसा देती हैं। डिलीवरी बॉयज भी दिवाली पर काम करना पसंद करते हैं। खासकर वे लोग, जो अकेले रहते हैं। परिवार के लोग भी डिलीवरी बॉय के रूप में काम कर रहे व्यक्ति को इसलिए काम की छूट दे देते हैं कि इससे घर में पैसा ज्यादा आएगा। दरअसल, डिलीवरी बॉयज का पूरा जीवन चक्र पैसे के ही इर्दगिर्द घूमता है। वे अपने पेशे का सम्मान इसलिए भी करते हैं, क्योंकि आखिर इस काम ने उन्हें रोजगार से जोड़ा है।  भारतीय समाज खानपान का शौकीन है और पिछले दो दशक में रेस्तरां और होटल संस्कृति ने भी अपने पांव पसारे हैं। अब मध्यवर्गीय परिवारों में मेहमान आने पर खाना घर में बनाने के बजाय होटल या रेस्तरां से मंगा लिया जाता है। स्थानीय स्तर पर खुले ये होटल और रेस्तरां कुछ किलोमीटर के दायरे में न्यूनतम खरीद पर मुफ्त घर पहुंचाने की सुविधा देते हैं। यह काम भी डिलीवरी बॉयज ही करते हैं। खाद्य उद्योग में काम करना डिलीवर बॉय इसलिए ज्यादा पसंद करता है, क्योंकि यहां ‘अतिरिक्त’ आय होने की अधिक संभावना होती है। और फिर डिलीवरी के लिए लंबा सफर भी तय नहीं करना पड़ता। हां, इस क्षेत्र में लगे डिलीवरी बॉयज को इस बात का तनाव अवश्य रहता है कि भोजन समय पर पहुंच जाए। पित्जा जैसे पदार्थों के लिए तो बाकायदा पहुंचाने का समय भी दिया जाता है, यानी इतने मिनट में पित्जा पहुंच जाएगा। गौर से देखें तो पिछले दो दशकों में युवाओं को रोजगार मुहैया कराने में ई-कॉमर्स ने अहम भूमिका निभाई है। छोटे शहरों, कस्बों यहां तक कि दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों के वे युवक, जिन्हें यह समझ नहीं आता कि वे नौकरी के लिए कहां जाएं, वे डिलीवरी बॉय के रूप में काम कर अपना परिवार चला रहे हैं। आज पूरे देश में लाखों की संख्या में डिलीवरी बॉयज काम कर रहे हैं, लेकिन काम की परिस्थियां अनुकूल नहीं हैं। अगर आप बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी में हैं, तो संभव है कि आप तय वेतनमान पर हों और अन्य नौकरियों जैसी सुविधां भी मिल रही हों। लेकिन अधिकतर डिलीवरी बॉयज या तो कूरियर कंपनियों से जुड़े हैं या प्लेसमेंट एजेंसियों से।

डिलीवरी बॉयज की असंतोषजनक स्थितियां लगभग दो साल पहले उस समय सुर्खियों में आई जब ई-कॉमर्स की शीर्ष कंपनियां फ्लिपकार्ट और मिंत्रा के डिलीवरी बॉयज हड़ताल पर चले गए। उनका कहना था कि उनके काम के घंटे तय नहीं हैं, यह तय नहीं है कि उन्हें अपनी कमर पर कितने किलोग्राम वजन ढोना है, उनकी साफ-सफाई का भी कोई इंतजाम नहीं है। अधिक काम करने के बावजूद उन्हें कोई बोनस नहीं दिया जाता, उन्हें रविवार तक की छुट्टी नहीं मिलती। उनकी मांग थी कि यह तय होना चाहिए कि एक डिलीवरी बॉय कितने पार्सल रोज ले जाएगा, सभी डिलीवरी बॉयज को पहचान-पत्र मिलना चाहिए और ईएसआईसी कार्ड दिया जाना चाहिए। उस हड़ताल ने वास्तव में पूरे देश के डिलीवरी बॉयज की स्थितियों को बयान किया। इन स्थितियों में आज भी कोई बदलाव नहीं हुआ है। गूगल ने अवश्य एक वीडियो इस तरह का बनाया था, जिसमें डिलीवरी बॉयज की निस्वार्थ सेवा को सम्मानित किया गया था। लेकिन अगर गौर से देखें तो यह एक पेशेवर काम है, डिलीवरी बॉयज अपने काम की तनख्वाह लेते हैं और बेहतर सेवाएं देते हैं। उन्हें सम्मानित करने के बजाय जरूरी है कि उन्हें काम करने का बेहतर अवसर और सुविधाएं दी जाएं, उनके साथ ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की तरह व्यवहार न किया जाए। ई-कॉमर्स अगर भारत में अपने पांव पसार रहा है, तो यह भी जरूरी है कि उसकी रीढ़ कहे जाने वाले डिलीवरी बॉयज को भी इसका लाभ मिले, उनका जीवन स्तर बेहतर हो, उन्हें सम्मान की नजर से देखा जाए। क्योंकि यही वे लोग हैं जो आपको घर बैठे आपकी इच्छा का सामान पहुंचा रहे हैं, आपके बीच खुशियां बांट रहे हैं। ०

 

फिल्मों में भी हैं…
भारतीय फिल्मकारों को हमेशा नए विषयों की तलाश रहती है। जब बीसवीं सदी दम तोड़ रही थी, तो भारतीय समाज में डिलीवरी बॉयज के रूप में नए किरदार आकार ले रहे थे। फिल्मी दुनिया से जुड़े लोग इन किरदारों के आसपास फिल्में बुनने लगे थे। हालांकि डिलीवरी बॉयज को लेकर हॉलीवुड में पहले भी फिल्में बन चुकी थीं। 1984 में एक फिल्म आई थी ‘डिलीवरी बॉयज’। इस फिल्म में कुछ डिलीवरी बॉय अपना एक नृत्य दल बनाते हैं। इस समूह का अगुआ होता है ब्रुकलिन। कुछ लड़के पित्जा डिलीवरी बॉय के रूप में काम करते हैं। यह दल एक डांस प्रतियोगिता में भाग लेता है। इस प्रतियोगिता को महिला अंत:वस्त्र बनाने वाली एक कंपनी प्रायोजित करती है। फिल्म एक अन्य नृत्य दल के साथ संघर्ष पर आधारित थी। ‘डिलीवरी बॉयज’ नाम से ही हिंदी में भी फिल्म बनी। 2014 में ‘पित्जा’ नाम से एक फिल्म आई। लेकिन ‘अंबे्रला’ नाम से डिलीवरी बॉयज के जीवन पर बेहद खूबसूरत फिल्म बनी। इस फिल्म में डिलीवरी बॉय की तमाम तकलीफों और परेशानियों को बेहद कलात्मक ढंग से चित्रित किया गया। जबकि ‘पित्जा’ फिल्म का निर्माण सिद्धार्थ राय कपूर ने किया था। फिल्म की कहानी पित्जा डिलीवरी बॉय अक्षय और उनकी पत्नी पार्वती के ईर्द गिर्द घूमती है। फिल्म के नायक का डिलीवरी बॉय होना यह बता रहा था कि डिलीवरी बॉयज हमारे जीवन का हिस्सा बनते जा रहे हैं। ०

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