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बच्चों की कहानी: मिन्नू की विजय

कोच, नीलू गैंडे की देखरेख में भारी दंगल का आयोजन किया जा रहा था। लूमू भैंसा, लंबू जिराफ, गोलू हाथी और गप्पू दरियाई घोड़ा लगातार दंड पेल रहे थे। कसरत करते हुए प्रत्येक पहलवान को देख कर लग रहा था कि जैसे असली विजेता वही हो।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

दिनेश चमोला ‘शैलेश’
नंद वन में वार्षिक खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन था। नीमू चूहा स्थानीय संयोजक था। दूर-दूर के गांवों से शहरों तक मुनिदी कराई गई थी। कई प्रतियोगिताएं एक साथ आयोजित की जा रही थीं। झबरू भंवरा सभी को भाला फेंकने की प्रतियोगिता में रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती दे रहा था। रेंगली गिरगिट लंबी कूद पर कब्जा करने की गुपचुप घोषणा कर चुकी थी। आनंद वन के उत्तर में घीसू नेवले के नेतृत्व में खो-खो की जिला स्तरीय प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। कोच, नीलू गैंडे की देखरेख में भारी दंगल का आयोजन किया जा रहा था। लूमू भैंसा, लंबू जिराफ, गोलू हाथी और गप्पू दरियाई घोड़ा लगातार दंड पेल रहे थे। कसरत करते हुए प्रत्येक पहलवान को देख कर लग रहा था कि जैसे असली विजेता वही हो।

केतु लकड़बग्घे ने सीटी बजाई और दंगल शुरू हुआ। देखते ही देखते गोलू हाथी ने सभी को चित कर दिया। कोच नीलू गैंडे ने गोलू को विजयी करार देने से पहले चुनौती दी- ‘इस विशाल जीव समुदाय में है कोई माई का लाल?… पहलवान… चाहे कोई छोटा हो या बड़ा जीव… जो गोलू हाथी के साथ दंगल के लिए तैयार हो? कद्रदानो! दंगल में आकर केवल शरीर से नहीं, बल्कि बुद्धिकौशल से भी कर सकता है चमत्कार। क्या कोई है नहीं ऐसा, जो भिड़ सके गोलू हाथी के साथ?’

एक क्षण के लिए तो मानो खामोशी ही पसर गई पांडाल में। लेकिन कुछ समय बाद मिन्नू चींटा, चड्डी पहन मूछों पर ताव देता हुआ कुश्ती के मैदान में उतरा। गोलू हाथी की उसे देख जोर से हंसी छूट गई। उसे अपने साथ यह एक प्रकार का मखौल-सा लगा। अहंकार और क्रोध में उसने अपने सूपनुमा कान फड़फड़ाए तो मिन्नू चींटे ने अपने दो पैरों से जोर से मिट्टी उड़ेली, गोया कह रहा हो- ‘बच्चू! तेरी खैर नहीं अब!’

गोलू हाथी सोचता कि यह पिद्दी-सा चींटा क्या कुश्ती लड़ेगा?… कहां एक बेजान-सा तिनका… कहां भारी-भरकम पहाड़? केतु लकड़बग्घे ने फिर से सीटी बजाई। गोलू को लगा कि उसने अत्यंत बलशाली लूमू भैंसे, लंबू जिराफ और गप्पू दरियाई घोड़े तक को पानी पिला दिया… भला यह पिद्दी सा चींटा किस खेत की मूली है? इसके लिए पांव और शरीर तो क्या, अकेली सूंड़ ही मसलने को काफी है। उसने आगे के दोनों पांवों से मिट्टी उड़ेली और जोर से सूंड़ दे पटकी मिन्नू चींटे की ओर।

चारों ओर धूल ही धूल हो गई। दर्शक चिंता में डूब गए कि मिन्नू चींटा जाने गोलू हाथी के दांव में आकर कब का जीवन से हाथ धो चुका होगा। लेकिन गोलू हाथी के बदलते दांवों की हरकतों से उन्हें लगा कि अभी भी मिन्नू चींटा जरूर जीवित है कहीं न कहीं।

कुछ धूल का गुब्बार छंटा तो गोलू हाथी चिंघाड़ता हुआ जमीन पर चित्त गिर गया। दरअसल, मिन्नू चींटे ने गोलू हाथी की सूंड़ में जोर से काट लिया था। गोलू हाथी मारे दर्द के तिलमिलाता और छटपटाता रहा और मिन्नू चींटा धूल से बुरी तरह लिपटा हुआ पांडाल से बाहर निकला… एक विजेता योद्धा की तरह।

सभी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब नीमू चूहे ने पांडाल से खेलमंत्री महोदय को दंगल में जीत हासिल करने के उपलक्ष्य में मिन्नू चींटे को सम्मानित करने तथा ‘खेल श्री रत्न’ पुरस्कार देने के लिए मंच पर बुलाया। मिन्नू के सिर पर ‘खेल श्री रत्न’ का खिताब रखते ही पूरा का पूरा पांडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया। जहां छोटे जीवों की यह ऐतिहासिक जीत थी, वहीं बड़ी जीवों के लिए इससे बड़े शर्म और अपमान की कोई बात नहीं थी। ऐसा आनंद वन के इतिहास में पहली बार हुआ था।

गोलू हाथी अभी भी बीच-बीच में मिन्नू चींटे के डंक की पीड़ा से रह-रह कर कराह रहा था। ताकतवर केवल बड़े आकार का विशाल जानवर ही हो, हर बार यह आवश्यक नहीं होता। इसलिए जीवन में बड़ा आकार नहीं, बुद्धि का कौशल होता है, इसे मिन्नू चींटे ने सिद्ध कर के दिखा दिया था। इस बात को गोलू हाथी आज भली-भांति समझ गया था। ०

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