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कविताएं: पानी नहीं मिलने पर, मैं कोई छिछला तालाब नहीं और जब से खुद के नदी

मैं कोई छिछला तालाब नहीं, जो हर कंकड़ की चोट को, तरंगों में बदलता फिरूं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

डॉ विवेकानंद

(1)
पानी नहीं मिलने पर,
पेड़ की पतली डाल भी
छुरी बन जाती है।

और, बौखलाए हुए लंगड़े की
बैसाखी भी
बंदूक में बदल जाती है।

शायद इतना ही कह देना,
आज काफी होगा।

क्योंकि मैंने सुना है कि-
खौलते पानी का रंग,
थोड़ी-सी चाय से ही
बदला जा सकता है।

लेकिन यह बात,
उन लोगों की समझ में नहीं आती
जिनकी हर सुबह की शुरुआत
खौलते पानी को,
हलक से नीचे उतार लेने के साथ ही होती है।

और, इसके बाद भी,
जिनका दावा है
कि खौलते पानी में
जिंदा बछड़ा फेंक देने से,
उसके चमड़े की कीमत
लगभग चैगुनी हो जाती है।

वकील नहीं होते हुए भी
मुझे उस दिन का इंतजार है,
जब एक मोटा बनिया
और
बया चिड़िया,
एक साथ अदालत में पेश होंगे
क्योंकि
कल रात की आंधी-पानी में
उन बया परिवारों ने
फुटपाथ पर ही दम तोड़ दिया
जिनके घोंसले,
बेडरूम की सेक्सी लाइट में
बदल गए।
लेकिन सवाल सिर्फ बछड़े
या बया चिड़ियों का ही नहीं,
हम सब आपका भी है
क्योंकि-
अलग-अलग किस्म के जीव
होते हुए भी,
ली जा रही जान की चीख़
एक-सी हो जाती है।
और,
बौखलाए हुए लंगड़े की
बैसाखी भी-
बंदूक में बदल जाती है,
शायद इतना ही कह देना
आज काफी होगा…।
(2)
मैं कोई छिछला तालाब नहीं
जो हर कंकड़ की चोट को
तरंगों में बदलता फिरूं।
मैं सब कुछ सह लूंगा चुपचाप
उस पानी भरे गिलास की तरह
जिसमें बर्फ के टुकड़े,
चुपचाप गल जाते हैं…
किंतु बाहरी सतह पर उभर आर्इं
पानी की बूंदों पर
मेरा कोई जोर तो नहीं, प्रिय…!
(3)
जब से खुद के नदी
और तुम्हारे सागर होने का
अहसास हुआ है,
तब से सोचती हूं-
‘इतनी नदियों को निगला,
रे, कितना खारापन उगला…?’
(4)
हमने माना कि-
तुम आकाश हो
और, पूरी पृथ्वी समेट लेने की
औकात है तुझमें।
कितने रंग बदलता है आकाश…!
क्या यह नहीं बताओगे हमें…?

(5)
सांसों की कटौती कर
एक बैलून फुलाया था,
जो फूट गया।
काले गुलाब के भ्रम में
नागिन का फन थाम लिया,
रे, किसको अपना मान लिया…!

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