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कहानी : दुख में रे मनवा…

साहब, कहीं चलना है क्या?’ कहते हुए सुखवीर ने अपने रिक्शे को इंजीनियर राजीव सक्सेना के आगे खड़ा कर दिया। ‘अरे नहीं नहीं, कोई दूसरा ढूंढ़ लेता हूं।’ शायद सुखवीर की अधेड़ उम्र को देखते हुए साहब ने कह दिया

Author नई दिल्ली | December 27, 2015 12:02 AM

साहब, कहीं चलना है क्या?’ कहते हुए सुखवीर ने अपने रिक्शे को इंजीनियर राजीव सक्सेना के आगे खड़ा कर दिया। ‘अरे नहीं नहीं, कोई दूसरा ढूंढ़ लेता हूं।’ शायद सुखवीर की अधेड़ उम्र को देखते हुए साहब ने कह दिया।

‘साहब, मैं आपको आपकी जगह तक पहुंचा दूंगा, जरा बैठिए तो सही।’ रिक्शावाले ने कहा।
साहब हार मान कर रिक्शे पर बैठ गए। साहब के बैठते ही रिक्शा मंथर चाल में चल पड़ा। हवा शायद सुखवीर के शरीर को जानती थी, वह भी उसी दिशा में बहने लगी, जिधर वह रिक्शे को खींचे जा रहा था।
‘और साहब, ई शहर तो बहुत बड़ा है। इहां मेरी रोजी-रोटी चलेगी न? दो वक्त की रोटी नसीब होगी न?’ कहते हुए रिक्शावाले ने बातचीत शुरू की।

साहब झुंझलाए हुए थे। उनके सरकारी चौपहिए ने आज दगा दे दी थी। ड्राइवर गाड़ी स्टार्ट करते हुए परेशान हो गया था। साहब चार-पांच अर्दलियों से गाड़ी को धक्का भी लगवा चुके थे। कोई परिणाम नहीं निकला।
खिसियाए हुए साहब के मोबाइल पर उनकी धर्मपत्नी भी खिसिया उठी थीं- ‘गाड़ी की आशा में और देर लगा देना। कहीं रिक्शा या आॅटो नहीं दिख रहा है क्या?’
यही सोच कर, साहब रिक्शे से ही घर आ रहे थे।

सुखवीर ने फिर टोका- ‘साहब, हम गरीबन से बात करने में कौनो हरज है का? जरा बतियाय लो। बात करत-करत रास्ता तुरंते कट जात है और हमें दुक्खो-दर्द नहीं सताता है।’
साहब रिक्शावाले की बातों का कोई जवाब नहीं दे रहे थे। वे तो बस अपने कार्यालय के कामों में ही अब तक उलझे थे। मन अब भी कार्यालय में था।

सुखवीर की अधेड़ उम्र को देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि वह मजबूत नहीं है। बस देखने वाले को न जाने क्यों उसमें एक अजीब-सी लाचारी दिखने लगी थी। वह लाख छिपा कर भी कुछ न कुछ उघार ही देता। शरीर अब भी गठीला होने का सबूत दे रहा था। कोई चेहरे को पढ़ने वाला निश्चित ही यह पढ़ लेता कि सुखवीर ने केवल सुख की चादर ओढ़ी है। बदन पर एक ही कपड़ा था, जो हवा के झोंके में उड़-उड़ कर उसके श्याम तन से लुका-छिपी कर रहा था।

साहब आज वर्षों बाद रिक्शे पर सवार हुए थे। आज रिक्शे की सवारी करते-करते वे यादों की सवारी करने लगे। कार्यालय में उलझा उनका मन अचानक यादों के जाल में उलझ गया। उन्हें लगा वे बचपन में पहुंच गए हैं। वे रिक्शे पर सवार अपने पांच-छह दोस्तों के साथ विद्यालय जा रहे हैं। साहब के चेहरे से अब भी बालपन नहीं गया था। किसी बच्चे के साथ अगर अब भी यूनीफॉर्म पहन कर बैठ जाएं तो उनमें वे खूब फबेंगे। बस पद के कारण मनुष्य हमेशा दिखावे में रहता है। उसकी मर्यादा की सीमा बनाता है। साहब में दोनों ही रूपों का बेजोड़ मेल हो गया था।

यादों में साहब घिरते जा रहे थे। उन्होंने देखा, रास्ते में सड़क बन रही है। काले-काले अलकतरे को देख कर राजीव जानना चाह रहा है कि इस अलकतरे से क्या होता है? सभी बच्चे बारी-बारी से रिक्शे वाले अंकल से सवाल कर रहे हैं। रिक्शे वाले अंकल भी अपनी जानकारी के अनुसार उन बच्चों के सवालों का जवाब दे रहे हैं, उन्हें हंसा भी रहे हैं, कई सीखें भी दे रहे हैं। राजीव तो बस एक सवाल का उत्तर चाहता है- अंकल, बताओ इस अलकतरे से क्या होता है?

‘बेटा, ई अलकतरा से सड़क पर पड़ी ये बड़ी-छोटी गिट्टियां एक-दूसरे से चिपक जाती हैं। इससे ई सख्त और टाइट हो जाती हैं। सड़क मजबूत बन जाती है। तभी तो रोज-रोज हजारों गाड़ियों के चलने से भी ई टाइटे रहती है। जब अलकतरा की मात्रा कम डाली जाती है तो ऊ सड़क तुरंते टूट जाती है। फिर गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा, इसका पता नहीं चल पाता है।’
रिक्शावाले अंकल रज्जो से पूछ बैठते हंै- ‘और रज्जो, तू बड़ा होकर क्या बनेगा?’
रज्जो एक सांस में बोल पड़ता है- ‘जी अंकल, मुझे तो इंजीनियर बनना है। एक ईमानदार और मेहनती इंजीनियर।’

‘अरे वाह, बेटवा तोहरे मन की मुराद पूरी हो। तुम जो चाहो, वही तुझे नसीब हो’- रिक्शावाले अंकल प्राय: सभी बच्चों को यही दुआ देते हैं। दुआ करते समय उनके चेहरे पर संतोष की एक गहरी मुद्रा बन जाती है। उन्हें लगता है कि उन बच्चों को उन्होंने दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज तोहफे में दे दी है।
साहब न जाने किन बातों में खोए हैं। उन्हें सुखवीर की कोई बात सुनाई नहीं देती।
उस अधेड़ उम्र रिक्शावाले ने यह मान लिया कि साहब को मुझ छोटे लोगों से बातचीत करना पसंद नहीं है। तभी तो साहब कोई उत्तर नहीं दे रहे हैं। वह कभी धीमे स्वर में, तो कभी तेज स्वर में एक गीत गुनगुनाने लगा-
दुख में रे मनवा, सुख में रे मनवा,
नाचो रे मनवा, तू मेरे अंगनवा।
यह गीत सुन कर साहब अचानक चौंक पड़े। उन्हें यह तक याद नहीं रहा कि वे एक इंजीनियर हैं। उन्हें लगा वह रिक्शेवाला अंकल सब बच्चों के सवालों का जवाब देकर अब गीत गुनगुना रहा है और वे अचानक रज्जो बन गए हैं। रज्जो बना राजीव सक्सेना तुरंत बोल पड़ा- और अंकल, आप हम लोगों को यही गीत क्यों सुनाते हो?

सुखवीर का पैर अचानक रिक्शे के पैडल पर थम गया। वह थोड़ा रुका, उसे समझते देर न लगी कि साहब शायद उन बच्चों में से ही कोई एक बच्चा हैं, जिन्हें वह आज से तकरीबन तीस-बत्तीस साल पहले विद्यालय से घर और घर से विद्यालय छोड़ने का काम करता था।

साहब के प्रश्न और उसकी गति को पहचानते हुए सुखवीर तुरंत बोल पड़ा- ‘ऐसन बात है न बुतरू, चाहे दुख में रहो या सुख में रहो, मन खूब प्रसन्न रक्खो। उदासी में कब्बो नहीं जियो। समय बहुते बलवान होता है। अपने मन को अपने ही वश में रक्खो और उसके साथ खेलो-कूदो। ई गाना गा-गाकर हम खूब्बे खुश रहते हैं।’
‘हां सुख्खू अंकल, आपका यह गाना तो मन को भी खूब भाता है। मैं जब बड़ा हो जाऊंगा तो भी इस गाने को गा-गाकर आपको याद करता रहूंगा।’

साहब भी इस गाने को गाने लगे थे।

अचानक रिक्शा सड़क पर एक ठोकर से टकराया, असंतुलित होते-होते बचा। भला हो उस ठोकर का कि साहब यादों के धुंधलके कैद से आजाद हो गए थे। चालक और सवारी दोनों संभल गए। दोनों चुप थे। इतने चुप कि लब कब से बोले ही न हों। दोनों को लगा शायद किसी ने मेरी बात तो नहीं सुनी?
सुखवीर से रहा नहीं गया। इस बार एक उम्मीद थी। शायद साहब बातचीत कर लें। आखिर उसने साहब से पूछ ही लिया- ‘साहब, आप कौनो नौकरी में हैं का?’
साहब की चुप्पी सचमुच टूट गई थी। वे बोल पड़े- ‘हां, मैं सिविल इंजीनियर हूं।’
‘आप कहां से पढ़े-लिक्खे हैं साहब?’
‘कुछ दिनों की पढ़ाई बिरौली से हुई और उसके बाद मैंने कटिहार में पढ़ाई की है’- कह कर साहब चुप हो गए।
‘अरे बिरौली से!’ सुखवीर चैंका
‘क्यों, बिरौली का नाम आपने सुना है क्या?’ साहब ने कहा।
‘जी साहब, मैं भी वहीं का हूं।’
‘आपका क्या नाम है चाचा?’
‘सुखवीर कहो साहब या सुख्खू कह लो।’ रिक्शे वाले ने कहा।
इस बार साहब से नहीं रहा गया। उन्होंने आखिर पूछ ही लिया- ‘क्या आप वही सुख्खू अंकल हैं, जो हम चार-पांच बच्चों को घर से स्कूल और स्कूल से घर ले जाया-आया करते थे।’
‘हां साहब, कुछ बच्चों को हम आज से तीस-बत्तीस बरस पहिले स्कूल लाता-ले जाता था।’
साहब चहक पड़े- ‘मैं रज्जो हूं अंकल, रज्जो, पहचानिए मुझे।’

सुखवीर के रिक्शे की गति इस बार पूरी तरह थम गई। दोनों रिक्शे से बीच राह पर ही उतर गए। साहब ने रिक्शे वाले के पैर छू लिए। पनियाई आंखें लिए वे बोल पड़े- ‘अंकल, तुम्हारी दुआ लग गई। देखो, मैं इंजीनियर बन गया हूं। पापा के ट्रांसफर के बाद हम लोग कटिहार आ गए थे। बस आपकी यादें हमारे साथ बनी रहीं। मेरी पहली पोस्टिंग आरा में हुई थी। फिर मैं पिछले साल से यहीं भागलपुर आ गया हूं। और अंकल, आप यहां कब से हो?’
‘अरे बेटवा, अभी दो-तीन दिन ही हुए हैं इस शहर में आए हुए।’
‘वो दलवीर चाचा कहां हैं?’

दलवीर का नाम सुनते ही सुखवीर की आंखों में आंसू आ गए। आंसू को तो बस कोई बहाना चाहिए आंखों की गिरफ्त से बाहर निकलने का। और वह बहाना सुखवीर के आंसुओं को अनजाने ही मिल गया था।
आंसुओं को देख कर साहब पूछ बैठे- ‘अंकल, आपकी आंखों में आंसू…’
‘नहीं तो बेटवा, बस यों ही कुछ बातें…’
‘अरे अंकल, घर पर तो सब ठीक है न? अंकल, क्या हुआ? कोई बात है तो कहिए न। मैं कोशिश करूंगा आपके होठों पर फिर से खुशहाली लाने की।’

रिक्शावाले अंकल इस बार तो फफक-फफक कर रोने लगे। साहब ने मरहम लगे घाव को अनजाने में ही किसी जंग खाए हथियार से कुरेद दिया। उन्होंने न जाने कौन-सी गलत बात कह दी, उसे पता ही नहीं चला। साहब ने सिसकती आवाज में कहा- ‘अंकल बताइए न क्या हुआ?’
‘अरे बेटवा, घर-द्वार के बंटवारे में हम दूनों भाइयों में पहले थोड़ा झगड़ा हुआ। ऊ झगड़ा खूब्बे बढ़ गया। इत्ता बढ़ा कि…’
साहब की जिज्ञासा बढ़ गई। वे बोल पड़े- ‘अंकल, आगे बताइए न।’
‘होगा क्या बेटवा, दलवीर भैया दू-चार लठैत को बुला कर हमको पिटवा दिया। हमार जवान बेटवन को भी इतना मारा कि दम फुला लिया। तुम्हारी चाची को गए तो बीस बरिस हो गया। एक बहू थी, जिससे ऊ लठैतों ने जोर-जबरसी किया तो ऊ भी बहुरिया गले में फंसरी लगा ली। थाना-पुलिस में जावे की अब मेरी कउनो इच्छा नहीं रही। सब कुछ छोड़-छाड़ कर ई शहर आया हूं। मेहनत-मजूरी करके बाकी थोड़ी जिनगी बिता लूंगा।’ बोलते-बोलते रिक्शावाले की आंखें सूख चुकी थीं। ‘और रज्जो, चलो बैठो, मैं तुम्हें घर छोड़ आऊं।’ रिक्शेवाले ने कहा।

साहब को लगा आज पहली बार वह अपनी जिंदगी में गहरी पीड़ा में है। उसकी इच्छा नहीं हुई कि वह रिक्शे पर बैठे। वह पैदल ही बातचीत करते हुए आगे बढ़ने लगा। सुखवीर ने भी दुबारा रिक्शे पर बैठने को नहीं कहा।
चलते-चलते साहब सोच में पड़ गए- रिश्तों में आज इतनी कड़वाहट क्यों आ गई है? भाई, भाई का ही घर उजाड़ कैसे सकता है? भला हो ईश्वर का, जो मैं अकेला हूं।
चलते-चलते दोनों घर तक पहुंच गए थे। साहब ने बेल बजाई। दरवाजा खोलते ही मैडम, साहब पर बरस पड़ीं- और लेट कर देते। अभी तो रात के नौ ही बजे हैं। बारह बजने में तो अभी तीन घंटे बचे थे। और साथ में ये कौन है?

साहब ने पत्नी को चुप रहने का इशारा देकर सारी बातें एक ही सांस में कह दिया।
कोमल मैडम अपने नाम के अनुरूप ही कोमल स्वभाववाली थी। उसने रिक्शे वाले अंकल को आदर से घर में बिठाया। सभी ने मिल कर भोजन किया।
सुखवीर को साहब ने आज घर पर ही रोक लिया। वह कई दिनों बाद आज फिर से चैन की नींद सो रहा था। उधर साहब पूरी रात सो नहीं सके।

सुबह साहब ने बिरौली के थाना प्रभारी से बात की और सुखवीर की सारी बातें कह सुनार्इं। थाना प्रभारी ने पूरे मामले को अपने स्तर से देखा तो मामला सही निकला। तीन दिनों के बाद ही दलवीर की गैर जमानती वारंट पर गिरफ्तारी हुई। इससे पहले उन्होंने कुछ ले-देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन थाना प्रभारी ने उनसे एक मोटी रकम लेकर सुखवीर को मुआवजे के रूप में दे दिया।

अब साहब कुछ राहत महसूस कर रहे थे। वे मानते थे कि अन्याय सहना भी एक अन्याय है। मुआवजे की राशि से साहब ने अपने कार्यालय के पास ही सुखवीर की चाय स्टॉल की दुकान खुलवा दी। बाकी बचे रुपयों को उनके नाम से खाता खुलवा कर उसमें रखवा दिया।
साहब भी कभी-कभी सुख्खू अंकल के टी स्टॉल पर चाय पीने आ जाते थे। सुख्खू अंकल, रज्जो को देख कर कह उठते- गाना सुनोगे बेटवा कि चाय पीयोगे!

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