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व्यंग्य : साहित्य के अखाड़े में

मैं ठंड पी गया और सोचने लगा कि साहित्यिक गोष्ठी में क्योंकर आया? आलोचक को देखा तो उनका व्याख्यान जारी था। वे इस बात से बिल्कुल बेखबर थे कि अस्सी प्रतिशत संभागी निद्रा में डूब गए हैं..

Author नई दिल्ली | Updated: December 27, 2015 12:16 AM

गो ष्ठी अपने ‘पीक’ पर थी। मैंने साहित्यकार को कुहनी मार कर कहा: ‘आंखें खोलो प्रभो। निर्लज्जता की भी हद होती है। काव्य-मीमांसा के तत्त्वों की व्याख्या की जा रही है।’  मेरी बात पर ध्यान न देते हुए साहित्यकार बोले- ‘यार दो-तीन दिन से ठीक से सो नहीं पा रहा। घर में बच्चे सोने नहीं देते।’
‘लेकिन साहित्यिक गोष्ठी का तो खयाल करो।’ मैंने कहा।
‘खयाल करके ही तो खर्रांटे नहीं ले रहा, वरना नींद जोरों की आ रही है।’
‘फिर आए क्यों थे।’
‘सोने के लिए।’
साहित्यकार फिर निद्रालीन होकर साहित्य से बेखबर हो गए। मैंने फिर कहा- ‘यार सुनो आलोचकजी काव्य मीमांसा में रोचकता की दलील दे रहे हैं।’
‘क्या साहित्यिक गोष्ठी में निद्रा लेना खुद गंभीर रोचकता नहीं है। ऐसा करो, मित्र साहित्य में क्या कुछ होना है, उसे ध्यान से सुनो और जागने पर मुझे बता देना। मेरी खोपड़ी मत चाटो, अपना काम करो।’
मैं चुप रहा। बगल में देखा, तो दीपंकरजी ने भी आंखें ढेर रखी थीं। मैंने दीपंकरजी को हिलाया और चौकस किया। दीपंकरजी उबल पड़े- ‘सोते हो न सोने देते हो, साहित्य साहित्य की रट लगा रखी है। भैया चुपचाप सुनो। तुम्हारे हाजमे के लिए यह जरूरी है, मेरे स्वास्थ्य के लिए सोना जरूरी है।’
मैं ठंड पी गया और सोचने लगा कि साहित्यिक गोष्ठी में क्योंकर आया? आलोचक को देखा तो उनका व्याख्यान जारी था। वे इस बात से बिल्कुल बेखबर थे कि अस्सी प्रतिशत संभागी निद्रा में डूब गए हैं और वे उसकी कोई बात नहीं सुन रहे।
मैंने आलोचक से ही कहा, ‘देखिए, भाषण ऐसा दीजिए, ताकि लोग जिंदा और होश में बने रह सकें। हालात देखिए, तमाम लोग बेहोश हैं।’
वहे मेरी कब सुनने वाले थे। उनका व्याख्यान जारी था: ‘कविता की भाषा और उसका मुहावरा अब बदल देना है। उन प्रतीकों से नए कवि को हटना होगा, जो कविता को बोदा बनाते हैं। इस अर्थ में काव्यगत वैशिष्ट्य के लिए स्वयं कवि को सजग रहना चाहिए। हिंदी कविता में यह समय अत्यंत हॉच-पॉच का है- अब कवि और आदमी में फर्क नहीं रह गया है। मेरी राय में कवि को आदमी से अलग होना चाहिए। जहां तक काव्य मीमांसा की शैली और उसके वैविध्य का प्रश्न है, साहित्यकार की उन परिवेशगत सच्चाइयों को समालोचक को देखना चाहिए, जो कविता में उपस्थित नहीं होती।’

मैं बोर हो गया था, इसलिए कहा: ‘अगर कविता में सच्चाई है ही नहीं, तो वह खोजी कहां से जाए। देखिए आप तनिक साहित्य का खयाल करके उसे सुपाच्य बनाए रखिए। ऐसा न हो कि इस गरिष्ठता के कारण उपस्थित तमाम साहित्यकार अपना हाजमा ही खराब कर बैठें।’
मेरी इस बात पर वक्ता आलोचक बोले: ‘ऐसा है, हाजमा उसी का बिगड़ेगा, जो जागेगा। अच्छा है कि आप भी शयन करें।’
‘रास्ता इसके सिवा और रहा भी क्या है! पर आप अकेले यह सब क्यों कर रहे हैं।’
‘लाला यह साहित्यिक गोष्ठी है। इसमें सोने और जागने की परवाह नहीं की जाती। असलियत यह है कि सो कोई नहीं रहा, तमाम लोग आंखें बंद करके गंभीरता से चिंतन-मनन से डूबे हैं। एक तुम ही ऐसे हो जो गोष्ठियों के विधान से परिचित नहीं हो। अभी तुम कहोगे कि भाषण से क्या होगा, तो इसका जवाब यह है कि देश में अब बिना भाषण के कुछ नहीं होने वाला।’
‘आप सही फरमाते हैं, बिना भाषण के नींद नहीं आती। पर इस गोष्ठी का औचित्य क्या है?’ मैंने पूछा।
‘औचित्य… साहित्य अकादेमी ने आयोजन के लिए पांच हजार रुपए दिए हैं। टीए, डीए और खर्चे के हजार मैं ले जाऊंगा, शेष आयोजक डकारेगा कुछ साथियों के साथ मिल-बैठ कर। ऐसे में बचे साहित्यकार सोएं नहीं, तो जाग कर क्या कर लेंगे। मुझे मजबूरी में जागना पड़ा है। वर्ना इतना बेवकूफ तो मैं भी नहीं हूं।’ वक्ता आलोचक ने कहा।
‘साहित्य अकादेमी गोष्ठियों के लिए रुपया क्यों देती है?’ मैंने पूछा।
आलोचक ने दांत पीसे और आयोजक को जगा कर बोले- ‘यार गोष्ठियों में गैर-साहित्यिक लोगों को बुलाते ही क्यों हो?’ मेरी ओर इशारा करके उन्होंने कहा- ‘यह जीव सर्वथा असाहित्यिक है। साहित्य की रट तो लगा रखी है, पर उसकी गंभीरता से नावाकिफ है। अगर इसे साहित्य की गंभीरता का तनिक भी आभास होता तो यह अब तक सो गया होता। इसे तो लोगों को सोते देख कर परेशानी हो रही है।’
आयोजक ने नैन उघारे, पैर समेटे और मेरी ओर घूम कर देखने के बाद कहा: ‘आप भाषण दीजिए, बंदर को अदरक देते ही क्यों हैं। मामला साहित्य का है, इसे हल्का मत करिए, वर्ना लोग जाग जाएंगे। हमें सबको सोता छोड़ कर यह स्थान तत्काल छोड़ना है, वरना सबको जलपान कराना पड़ेगा।’

मैं लपक कर बोला- ‘क्या साहित्यिक गोष्ठियों में जपपान की व्यवस्था होती ही नहीं?’
‘यहां केवल व्यवस्था होती है, इसलिए प्यारे मित्र तुम तो अपना काम करो, साहित्यकार कभी जलपान नहीं करता। मदिरापान करता है वह तो।’ फिर वे आलोचक से बोले- ‘मेरी राय में तुम अपने लक्ष्य में सफल हो गए हो। गोष्ठी के सारे प्रतिभागी बेहोश हैं, हमें यह स्थल अब छोड़ देना चाहिए।’
आयोजक और आलोचक ने थैला उठाया और गोष्ठी स्थल पर साहित्यकारों को औंधे मुंह पड़ा छोड़ कर चल दिए। मैंने साहित्यकारों को जगाया तो वे सब मुझ पर पिल पड़े- ‘कम्बख्त गैर-साहित्यिक है। सारी गोष्ठी का मजा किरकिरा करता रहा है। अच्छी-भली नींद आ रही है, पर सोया न सोने दिया। आगे से इसे मत बुलाओ।’
मैंने कहा- ‘वक्ता और आयोजक नदारद हैं, आप लोग सोते रहे, वे भाग छूटे।’
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत चरितार्थ हुई, सब के सब बोले- ‘तुम भी क्यों नहीं चले गए पाजी।’
मुझे बहुत पीड़ा हुई कि गोष्ठियों के स्वरूप को ये लोग क्योंकर भद्दा बनाने लगे हैं। इसी पीड़ा को लेकर घर लौट आया।

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