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मानव के गीत

घुरहू के घर, चना-चबेना छप्पन भोग प्रधान के। झुलसे हुए करील दूर से भीट ताकते पान के। कर्जे में है गांव समूचा सांसें जैसे मछली जाल फंसी, दिन कुछ ऐसे कटें कि जैसे चढ़े कलाई चूड़ी कसी-कसी; चेहरों पर झुर्रियां कि जैसे खेत कटे हों धान के। घुरहू के घर, चना-चबेना छप्पन भोग प्रधान के। […]

Author नई दिल्ली | December 27, 2015 12:01 AM

घुरहू के घर,

चना-चबेना
छप्पन भोग
प्रधान के।
झुलसे हुए करील दूर से
भीट ताकते पान के।

कर्जे में है गांव समूचा
सांसें जैसे मछली जाल फंसी,
दिन कुछ ऐसे कटें कि जैसे
चढ़े कलाई चूड़ी कसी-कसी;
चेहरों पर झुर्रियां कि जैसे
खेत कटे हों धान के।

घुरहू के घर,
चना-चबेना
छप्पन भोग
प्रधान के।
झुलसे हुए करील दूर से
भीट ताकते पान के।

2

दरवाजे अपने हैं
ताले गैरों के।
आंगन में हिस्से हैं
नत्थू-खैरों के।

अपने खेत, फसल अपनी
खलिहान दूसरों के,
माथे पर उपजाऊ
लिखना पड़े उसरों के;
नंगी पीठों पर
अरसे से बने हुए
मिटते नहीं निशान
बड़ों के पैरों के।

बहरे हुए शोर को सुनते
अंधे सूरज तकते,
हम कोल्हू के बैल हो गए,
सबसे हंकते-हंकते,
उम्र कट गई
वृत्तों पर चलते-चलते
मन में रहे हौसले
लम्बी सैरों के।

दक्ष हो गए हम
सलीब पर टंगे-टंगे हंसने में,
जोरदार मछुआरे की वंशी में
खुंद फंसने में
तपे उम्र भर
कुंदन होने की खातिर
बन कर हम रह गए
छदाम कुबेरों के।

3

जलती आंखें कसी मुट्ठियां
भटक गई या हुई पालतू
इस इमारतों के जंगल में।

ऐसी दौड़ कि सर-ही सर हैं
पांवों के नीचे कंधे हैं,
या तो आदमखोर नजर है;
या फिर लोग निपट अंधे हैं;
कौम कि जैसे भेड़-बकरियां
पैदा होते हुई फालतू
होने चली जिबह मक्तल में।

जिसे पा गए उस पर छाए
सबमें गुण हैं अमरबेल के,
सीढ़ी अपनी सांप और के
ऐसे हैं कायदे खेल के:
इकतरफा हो रही कुश्तियां
ऊपर वाले देख हाल तू
कोई नियम नहीं दंगल में।

4

कारिंदों ने लूटे मेले।
राजा पंसासारी खेले।
सारी रात नींद में चलते
दिन भर हाथ होम में जलते,
रोज भाग्यरेखा मिटती है
इतनी बार हाथ हैं मलते;

उम्र कट गई खड़े हाट में
दाम लगे बस आने-धेले।
राजा पंसासारी खेले।

शहर पिटारा जादूगर का
सब करते हैं खेल नजर का,
भागीरथी कहां तक तारे
रोज बढ़े परिवार सगर का;

नंगे पांव बचाना भाई
बिखरा कांच, जाल हैं फैले।
राजा पंसासारी खेले।

5

गरदन में पड़े कसे
फंदों से नाते हैं।
फैले हैं हाथ और
खुले बहीखाते हैं।।

पिंजरे-पिंजरे डोला
रटे शब्द भर बोला,
आदमी-नथे, कंधे पके बैल सा-
बोला;
पीठ हो गई पत्थर
धौल यों जमाते हैं।

6

ताल भरता
सूखता हर साल,
पर यही है
अब नदी का हाल।

एक तो पानी बहुत कम
दूसरे लोहू घुला,
प्यास का मारा शहर
कहता- कि जो भी है पिला,

मुस्तकिल
डाले हुए हैं जाल।
ताल भरता
सूखता हर साल,
पर यही है
अब नदी का हाल।

7

गांव छोड़ा शहर आए,
उम्र काटी सर झुकाए,
ढूंढ ली खुशियां इनामों में।
जुड़ गए कुछ खास नामों में।

मां नहीं सोई
भिगोकर आंख
रातो-रात रोई,
और हर त्योहार
बापू ने किसी की
बाट जोही;

मींच आंखें सो नहीं पाए,
बांध कर उम्मीद पछताए,
हां-हुजूरी में सलामों में।
खो गए बेटे निजामों में।।

घर नहीं कोई यहां
दरबार हैं
या हैं दुकानें,
जो हंसी लेकर चले
उस पर पुती हैं
सौ थकानें,

कामयाबी के लिए सपने
बेच डाले-रात दिन अपने
सिर्फ कुछ खोटे छदामों में।
खो गए रंगीन शामों में।
…………..

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