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मुद्दा : रोजगार का चुग्गा फेंकते संगठन

आज के जमाने में रोजगार के बिना रोटी का जुगाड़ संभव नहीं है। खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। परंपरागत पेशे खत्म हो रहे हैं। गांवों से शहरों की तरफ पलायन लगातार बढ़ रहा है..

Author नई दिल्ली | Updated: December 27, 2015 12:16 AM
एशिया की अर्थव्यवस्था पर केंद्रित ‘रोजगार-विहीन विकास’ रिपोर्ट 2018 में कहा गया है कि भारत में हर साल 81 लाख नए रोजगार सृजित करने की नितांत आवश्यकता है।

आज के जमाने में रोजगार के बिना रोटी का जुगाड़ संभव नहीं है। खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। परंपरागत पेशे खत्म हो रहे हैं। गांवों से शहरों की तरफ पलायन लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में जगह-जगह रोजगार मुहैया कराने वाली संस्थाएं खुल गई हैं। उनके लिए इस बाजार में ग्राहकों की कोई कमी नहीं है। अब ज्यादातर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियां भी विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए इन सलाहकार संस्थाओं की मदद लेती हैं। घरेलू नौकर, चौकीदार, ड्राइवर, सहायक, सुरक्षा गार्ड से लेकर बड़े पदों पर भी कर्मचारी मुहैया कराने वाली ऐसी संस्थाओं की गिनती लाखों में है। इनके करार विदेशी कंपनियों के साथ भी होते हैं जो देश ही नहीं, विदेशों में भी नौकरियां मुहैया कराती हैं। नौकरी दिलाने के एवज में कंपनी और कर्मचारी से इन एजेंसियों का कमीशन पहले से तय होता है, जो नौकरी की रैंक के मुताबिक होता है। कई ऑनलाइन कंपनियां भी नौकरी दिलाने के लिए मुफ्त और भुगतान सेवाएं देती हैं।

सुनने-देखने में बड़ी व्यवस्थित और लुभावनी लगने वाली यह व्यवस्था असल में इतनी सरल है नहीं। कई संस्थाएं ईमानदारी से अपना काम करती हैं, तो कई जगहों पर रोजगार सलाहकार संस्थाओं की आड़ में मानव तस्करी का गोरखधंधा भी खूब पनप रहा है। मानव तस्करी करने वाले गिरोहों को रोजगार एजेंसियों की आड़ में दोहरा फायदा होता है। एक तो इससे आसानी से कानून की नजर इन पर नहीं पड़ती। दूसरा, शिकार ढूंढ़ने नहीं पड़ते, काम-धंधे की चाह रखने वाले खुद इनके पास आ जाते हैं। अच्छी आय और नौकरी का झुनझुना थमा कर ये कंपनियां और एजेंट गरीब तबके के लोगों को आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं।

देश भर में इनका एक व्यवस्थित नेटवर्क है, इनके एजेंट उन राज्यों, गांवों, कस्बों में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं, जहां गरीबी और भुखमरी ज्यादा है। शहर और विदेशों में अपने बच्चों को अच्छा भविष्य देने और घर की माली हालत सुधरने की उम्मीद में कई परिवार इनके झांसे में आ जाते हैं। इसके लिए एजेंसियां परिवार के जानकार लोगों का सहारा लेती हैं। कई जगहों पर तो मां-बाप जानबूझ कर बच्चों और लड़कियों को बेच देते हैं, जिसकी एवज में उन्हें अच्छी रकम मिल जाती है। इससे कुछ दिन तक तो घर का चूल्हा-चौका चल जाता है- इस बात से बेखबर कि इसके आगे अब उनके बच्चों की जिंदगी क्या और कैसी होगी? बहुत-से मामलों में मां-बाप जिंदगी भर अपनी औलाद को दोबारा देख ही नहीं पाते।

शहरों में लाने के बाद ये एजेंसियां पार्ट टाइम और फुलटाइम शिफ्ट के हिसाब से इन औरतों, लड़कियों, बच्चों को काम पर भेजते हैं और कई बार उन्हें बेच भी देते हैं। जहां काम के एवज में इन्हें सिर्फ एक हजार से चार हजार रुपए दिए जाते हैं, जबकि प्लेसमेंंट एजेंसियों का कमीशन इससे बीस गुना तक ज्यादा होता है। बद से बदतर हालात में भी काम के घंटे तय नहीं होते। ये घरेलू नौकर आमतौर पर चौदह से सोलह घंटे तक काम करते हैं। शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का शिकार भी होते हैं। कितने ही ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें लोग इनका बलात्कार तक करने से नहीं चूकते।

नौकरी के लालच में इन एजेंसियों के चंगुल में फंसे इन लोगों की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। कहीं इन्हें भीख मंगवाने का धंधा करने वाले गिरोहों को बेच दिया जाता है, तो कहीं लड़कियों को वेश्यावृति के हवाले कर दिया जाता है। अनेक युवाओं और बच्चों को अंग व्यापार की बलि चढ़ा दिया जाता है।

नौकरी का झांसा देने वाले इन गिरोहों का जाल काफी मुस्तैद है, जिसमेंं कई बार बड़े सरकारी अफसर, नौकर, डॉक्टर भी शामिल होते हैं। फर्जी दस्तावेज तैयार करने से लेकर दूसरे देशों मेंं सप्लाई करने तक की पूरी प्रक्रिया इतनी पुख्ता होती है कि खुद शिकार व्यक्ति आखिर तक कहानी का छोर नहीं पकड़ पाता। जब तक बात खुलती है, तब तक सब खत्म हो चुका होता है। अब आधुनिक दास प्रथा का एक नया युग जन्म ले चुका है।

इस समय हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति है। कुल जनसंख्या का करीब अठठ्ईस फीसद। अगर इस ऊर्जा को हम सही ढंग से इस्तेमाल कर पाएं तो यह दुनिया में हमारी अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा दोनों बदल सकती है। पर इस युवा ताकत को साधने के लिए हमारे पास तकनीकी शिक्षा और योजना है ही नहीं। ऐसे में जब पढ़े-लिखे लोगों के लिए रोजगार नहीं है, तो अनपढ़ लोगों की दशा क्या होगी? सरकार खुद मानती है कि हमारे यहां चौरानबे फीसद कामगार गैर-संगठित क्षेत्र में लगे हैं। यानी ऐसे उद्योग जो या तो पंजीकृत नहीं हैं या फिर फल-सब्जी बेचने, रिक्शा चलाने, दुकान जैसे स्वरोजगारों से लोग अपनी रोजी कमा रहे हैं। ऐसे में रोजगार का जाल कोई फेंके तो शिकार खुद को कैसे बचाए?

दुनिया भर में करीब अस्सी प्रतिशत मानव तस्करी देह-व्यापार के धंधे के लिए होती है और बाकी बंधुआ मजदूरी, भीख मंगवाने, मानव अंगों की खरीद-फरोख्त के कारोबार के लिए होती है। देश ही नहीं, दुनिया भर के सैक्स रैकट को ज्यादातर लड़कियां इन रोजगार सलाहकार एजेंसियों की आड़ में ही सप्लाई होती हैं।

ए शिया में भारत ऐसी घटनाओं का केंद्र बन रहा है, जहां से देश ही नहीं विदेशों में भी यहां से बच्चे और लड़कियां बेचे जाते हैं। विदेशों में श्रमशक्ति मंहगी है और हमारे यहां रोजगार एक बड़ी किल्लत। हमारे यहां सस्ते मजदूर आसानी से मिल जाते हैं। इसलिए विदेशों में यहां के लोगों की मांग ज्यादा है। विदेश में रोजगार का आकर्षण ज्यादा है, जिसके चलते लोग आसानी से उस ओर खिंचे चले जाते हैं। देश के पूर्वोत्तर राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड से बड़ी तादाद में लड़कियों, औरतों को नौकरी का झांसा देकर ये फर्जी रोजगार एजेंसियां लाती हैं। सबसे ज्यादा लोग झारखंड, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से लाए जाते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 2009-2012 के बीच कर्नाटक में मानव तस्करी के सबसे ज्यादा- तेरह सौ उन्यासी- मामले सामने आए। तमिलनाडु में दो हजार दो सौ चौबीस मामले दर्ज हुए और आंध्र प्रदेश में दो हजार एक सौ सत्तावन मामले उजागर हुए। नेपाल और बांग्लादेश से भी मानव तस्करी बड़े पैमाने पर होती है। राजधानी दिल्ली इन गतिविधियों का केंद्र है। यहां घरेलू नौकरों, जबरन शादी, भीख, सैक्स-रैकटों का गैर-कानूनी धंधा खूब फल-फूल रहा है। हर साल कितने ही ऐसे मामले सामने आते हैं, जिसमें बच्चे, औरतें, लड़कियां नौकरी के वादे के साथ यहां लाए गए और शारीरिक, मानसिक यातना से लेकर देह-व्यापार और भीख के धंधे में धकेल दिए गए।

यहां मुद्दा सिर्फ रोटी और रोजगार है, लेकिन इसका क्षेत्र इतना विकराल है कि उसने समाज का रूप-रंग ही बदल दिया। रोजगार देना ही आज अपने आप में इतना बड़ा रोजगार बन चुका है कि सलाहकार संस्थाओं के पीछे छिपे अमानवीय चेहरे बचपन और समाज को निगल रहे हैं। जब ऐसे सामाजिक मुद्दों पर बात होती है तो हमें कानून और व्यवस्था की याद सबसे पहले आती है। हमारे यहां कानून लागू होने से पहले उससे बचने वाली तरकीबें अमल में आ जाती हैं।

इन नकली और फर्जी रोजगार एजेंसियों के कानून की पकड़ में न आने की एक बड़ी वजह है कि इनमें से बहुत सारी संस्थाएं पंजीकृत होती ही नहीं हैं, जिसकी वजह से ये गिनती में आ ही नहीं पातीं। जब तक कोई गिरोह धरा न जाए तब तक इनका भंडाफोड़ नहीं होता। इसलिए पुलिस के लिए भी इन्हें दबोचना दूभर काम है। पकड़े जाने तक ये अपना काम कर चुकी होती हैं। यानी चंगुल से छूटने के बाद बच्चों को सुधारगृह और लड़कियों, औरतों को जेल या नारी निकेतन की ही राह मिलती है। घर का दरवाजा दोबारा देखने वाले लोग कम ही होते हैं।

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