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मृत्यु वरण की आजादी

इच्छा मृत्यु के अधिकार को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। कुछ लोगों का मानना रहा है कि जिस तरह व्यक्ति को जीवन का अधिकार है, उसी तरह उसे अपनी इच्छा के मुताबिक मृत्यु का वरण करने का अधिकार भी मिलना चाहिए। इसे लेकर देश की सर्वोच्च अदालत भी समय-समय पर असमंजस की स्थिति में देखी गई है। सरकार का तर्क रहा है कि इच्छा मृत्यु को आत्महत्या की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। पर जिन लोगों के लिए असाध्य बीमारियों की वजह से जीना दूभर हो गया हो, उन्हें इस तर्क पर जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जीवित रखना भी किसी सजा से कम नहीं होता। इसलिए अब सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष स्थितियों में इच्छा मृत्यु को उचित ठहराया है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं श्रीशचंद्र मिश्र।

Author Published on: May 13, 2018 3:30 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

श्रीशचंद्र मिश्र

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इच्छा-मृत्यु को व्यक्ति का अधिकार माना है। यानी जिस तरह व्यक्ति को अपनी जिंदगी अपनी पसंद से जीने का अधिकार है उसी तरह वह अपनी मौत चुनने को स्वतंत्र है। पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आत्महत्या को वैध नहीं ठहराता। इच्छा-मृत्यु के लिए सर्वोच्च अदालत ने कुछ दिशा-निर्देश तय किए हैं। वही व्यक्ति इच्छा-मृत्यु का वरण कर सकता है, जो लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हो और उसके बचने की कोई गुंजाइश न हो। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला 2017 में संसद में पास हुए मैंटल हैल्थ केयर विधेयक का विस्तार है। इस विधेयक से एक लंबी वैचारिक बहस के बाद आईपीसी की धारा 309 में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बरसों से अमल में आ रही इस धारा के तहत आत्महत्या की कोशिश को अपराध माना जाता था। यह धारा ब्रिटिश काल की देन है। हालांकि एक सदी पुरानी इस धारा के दायरे में आए बमुश्किल गिने-चुने लोगों को किसी अदालत ने सजा सुनाई है। अदालतें समय-समय पर आत्महत्या की कोशिश को अपराध मानने की व्यवस्था को असंवैधानिक भी ठहरा चुकी हैं। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के सामने जो मामला आया वह एक पुलिसकर्मी की आत्महत्या की कोशिश से जुड़ा था। बंबई हाई कोर्ट ने उसे अपराधी नहीं माना था। महाराष्ट्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील की। 29 अगस्त, 1996 को संविधान के दायरे में रहते हुए बंबई हाईकोर्ट के फैसले को तो निरस्त कर दिया, लेकिन पुलिसकर्मी को सजा देने या न देने के अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए उसे रिहा कर दिया। मुंबई पुलिस में उन्नीस साल तक हैड कांस्टेबल रहे उस कर्मी ने एक दुर्घटना में अपना मानसिक संतुलन खो दिया था। उसी वजह से 1985 में उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की थी। यह बहस लगातार होती रही कि क्या इच्छा-मृत्यु को कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए? इस बहस के दो पहलू थे। एक पक्ष यह था कि क्या लंबे समय से निष्क्रिय हालत में पड़े रहने वाले व्यक्ति की जीवन रक्षक प्रणाली हटा कर उसे मृत्यु का वरण करने का अधिकार नहीं दे दिया जाना चाहिए! अगर परिस्थितियों और मुश्किलों से तंग आकर कोई व्यक्ति आत्महत्या की कोशिश में बच जाता है, तो उसे अपराधी क्यों माना जाए?

इच्छा-मृत्यु का विवाद न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर टकराव का भी मुद्दा बनता रहा है। सुप्रीम कोर्ट इच्छा-मृत्यु को सिर्फ संविधान से नहीं, नैतिकता, धर्म और चिकित्सा विज्ञान से जुड़ा मामला भी मानता रहा। इसीलिए इस संवेदनशील मुद्दे पर सभी की राय जानने के लिए उसने 2014 में सभी राज्यों से राय मांगी थी। सरकार का विरोध इस बात पर हमेशा रहा कि वह इच्छा-मृत्यु को सिद्धांत के रूप में नहीं मान सकती। उसका मानना था कि ऐसी व्यवस्था का दुरुपयोग हो सकता है। उसका विरोध इस बात पर भी था कि इस सवाल पर कोई भी फैसला करना सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह संसद और विधायिका का काम है कि वह व्यापक बहस के बाद आम राय से कोई रास्ता तलाशे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे स्वीकार किया। पर गैर-सरकारी संगठन ‘कामन कॉज’ की जनहित याचिका पर विचार करते हुए 2014 में उसे लगा कि इस मुद्दे पर देश भर में बहस होनी चाहिए। वैसे आत्महत्या या इच्छा-मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर निर्देश देता रहा है। 1994 में उसका निष्कर्ष था कि आत्महत्या अपराध नहीं है।

1996 में उसने कहा था कि सम्मान से जीने के अधिकार में सम्मान से मरने का अधिकार भी शामिल होना चाहिए। लेकिन तब उसने स्पष्ट कर दिया था कि इस पर फैसला विधायिका को करना है। अब संसद में मेंटल हेल्थ केयर बिल पास हो जाने और सुप्रीम कोर्ट से इच्छा-मृत्यु को हरी झंडी मिल जाने के बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि कहीं इससे आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ावा तो नहीं मिलेगा। यह सवाल उन देशों में भी उठा, जहां आत्महत्या की कोशिश को अपराध नहीं मानने का कानून पहले से है। उन देशों का मानना है कि आत्महत्या की कोशिश से बचे लोगों को सहानुभूति की ज्यादा जरूरत है, बजाय इसके कि अपराधी मान कर उन्हें मानसिक यातना दी जाए। दुनिया के सिर्फ पच्चीस देशों में ऐसे प्रयास को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इच्छा-मृत्यु के दो रास्तों पर बरसों से बहस चल रही है कि उनमें से कौन-सा मानवीय है। जिस मरीज के बचने की कोई सूरत न हो उसे डॉक्टर जहर का इन्जेक्शन दे दे या परिजनों की सहमति से जीवन रक्षक प्रणाली हटा ले। यह मसला व्यक्ति के मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ भी है। सवाल है कि क्या किसी व्यक्ति को यह निश्चय करने का अधिकार होना चाहिए कि अगर उसकी बीमारी ठीक होने का कोई रास्ता नहीं बचा है तो उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर न रखा जाए। डॉक्टरों का कहना है कि कई बार कृत्रिम प्रणाली पर मरीज को लंबे समय तक रखा जाता है। मरते समय तक वह आईसीयू में मशीनों के बीच अकेला पड़ा रहता है। परिजनों और मित्रों से बातचीत कर आखिरी सांस लेना उसे नसीब नहीं हो पाता।

उलझा हुआ है इच्छा-मृत्यु का मामला
ज्यादातर देशों में आत्महत्या की कोशिश को अपराध के दायरे से बाहर रखने की पहल तो की है। मगर नैतिक और धार्मिक कारणों से इच्छा-मृत्यु के सवाल पर वहां भी उलझन की स्थिति है। बीमारी, प्रेम प्रसंग, गरीबी या अन्य कारणों से दुनिया भर में लोग बड़ी संख्या में आत्महत्या करते हैं। यह उनका निजी फैसला होता है। इच्छा-मृत्यु का फैसला कई लोगों की राय पर टिका होता है, इसलिए इच्छा-मृत्यु को कानूनी मान्यता देने का सवाल दुनिया के कई देशों में बहस का मुद्दा बनता रहा है। 1939 में हिटलर ने बीमार और अपंग सैनिकों को दया-मृत्यु दे दी थी। बहरहाल, पिछली आधी सदी में कई देशों में इस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ़ा जा सका है कि इच्छा-मृत्यु को अगर मान्यता दी जाए तो किस रूप में? स्काटलैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, इजराइल, फ्रांस आदि में इच्छा-मृत्यु को अपराध न मानने का कानून ठुकराया जा चुका है। नीदरलैंड में यह फैसला डॉक्टरों पर छोड़ दिया गया है। स्विटजरलैंड में किसी को सम्मानजनक मौत देने को गैरकानूनी नहीं माना जाता। यही वजह है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद ज्यूरिख का फीस लेकर लोगों को मृत्यु का वरण कराने वाला संगठन ‘डिगनिटास’ खूब फल फूल रहा है और उसकी कारगुजारियों की वजह से उस पर आरोप लगा है कि उसने स्विटजरलैंड को आत्महत्या का पर्यटन स्थल बन दिया है। 1998 में ‘डिगनिटास’ की स्थापना हुई थी। मृत्यु का वरण कराने के लिए यह संगठन करीब सात लाख रुपए लेता है। दुनिया भर में संगठन के सात हजार से ज्यादा सदस्य हैं। 1998 से 2013 तक यह संगठन जर्मनी के 840 लोगों समेत कई देशों में 1701 लोगों को मौत का उपहार दे चुका है। इनमें एक भारतीय भी है। 1980 में वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ राइट टू डाइ सोसायटीज का गठन हुआ। तेईस देशों में आज इसके अड़तीस संगठन हैं। जहां तक देशों की बात है, तो अलबानिया ने इच्छा-मृत्यु को वैध बनाने की दिशा में पहल की। 1995 में वहां कानून बना, जिसमें व्यवस्था है कि अगर परिवार के तीन या ज्यादा सदस्य सहमत हों तो मरीज की जीवन रक्षक प्रणाली हटाई जा सकती है। जर्मनी की फेडरल अदालत ने 2010 में एक अर्जी पर इस तरह की मौत की इजाजत दे दी थी। फ्रांस में 2009 के ‘एंड ऑफ लाइफ’ कानून में डॉक्टरों को निर्देश दिया कि अंतिम स्थिति में पहुंच चुके मरीज को बचाए रखने के लिए अतिरिक्त अधिकतम उपाय न करें। इंग्लैंड में 1935 में दया-मृत्यु के समर्थन में एक सोसायटी बनी, लेकिन वह ज्यादा सक्रिय नहीं रह पाई। हाउस ऑफ कामंस में 2004 में और हाउस ऑफ लार्ड्स में जहर देकर मौत को मान्यता देने का बिल खारिज हो जाने के बाद वहां अब एक निजी बिल पर बहस छिड़ गई है। इसमें उस वयस्क को, जिसके छह महीने से कम समय तक जीने की आशंका हो, उसे अपना जीवन खत्म करने का अधिकार देने की व्यवस्था है। दो डॉक्टर मरीज की हालत की पुष्टि करेंगे और अगर मरीज राजी हो जाए तो एक डॉक्टर दवा देकर उसकी जीवन लीला खत्म कर देगा। वरिष्ठ डॉक्टरों ने इस व्यवस्था का समर्थन किया है। लेकिन चर्च इसके विरोध में डटा रहा है। अमेरिका के ओरेगान प्रांत में 1997 में कानून बना कि इच्छा-मृत्यु चाहने वाले डॉक्टरों के परामर्श से दवा लेकर अपना जीवन खत्म कर सकते हैं। तबसे 1173 लोगों ने डॉक्टरों की सलाह ली और 752 ने खुद अपनी जान दे दी। 2006 में तब के राष्ट्रपति जार्ज बुश के विरोध के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को बरकरार रखा। 2008 में इसी तरह का कानून वाशिंगटन में अमल में आ गया। 1975 में डेरेक हंफ्री ने स्तन कैंसर से पीड़ित अपनी पत्नी की मरने में मदद की। पांच साल बाद हंफ्री ने कैलिफोर्निया के सांता मोनिका में अपने घर के गैराज में मृत्यु का अधिकार देने वाले अमेरिका के पहले संगठन ‘हेमलॉक’ सोसायटी की स्थापना की। मकसद लाइलाज मरीजों को पीड़ा से मुक्ति दिलाना और डॉक्टरी मदद से मौत देने के कानूनों की वकालत करने का था। जून 1990 में डॉक्टर जैक केवोरकियान ने तीस डॉलर की सुसाइड मशीन बनाई। आठ साल में इस मशीन की मदद से एक सौ तीस लोगों ने अपनी जान दी। उनका मानना था कि यह भी डॉक्टरों की जिम्मेदारी है कि मृत्यु में लोगों को अपना सहयोग दें।

छिड़ती रही है कानूनी बहस

आत्महत्या का मुद्दा भारत में एक सामाजिक समस्या होने के नाते बहसों में उतना नहीं उलझा, जितनी इसकी कानूनी मीमांसाएं हुर्इं। इसे लेकर कई तरह के सवाल और आशंकाएं अदालतों के सामने आती रहीं। 1994 में पी. रत्नम बनाम केंद्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने सवाल आया कि क्या भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 301 के तहत आत्महत्या की कोशिश असंवैधानिक है या धारा 309 में इसे अपराध माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने तब इन दोनों मान्यताओं को खारिज कर धारा 301 को क्रूर और अपमानजनक बताया था। अदालत का निष्कर्ष था यह व्यक्ति पर दोहरी मार है। एक पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए वह अपनी जान लेने की कोशिश करता है और बच जाने पर उसे ज्यादा यातना भुगतनी पड़ती है। 1996 में ज्ञान कौर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1994 की अपनी व्याख्या बदल कर कहा कि जीवन के अधिकार में मृत्यु का अधिकार शामिल नहीं है। इसी के बाद बहस छिड़ी कि लाइलाज मरीज को दया-मृत्यु देने का कानून बनाया जाना चाहिए। 1995 में बंबई हाई कोर्ट के सामने नरेश मारोत राव सारवरे का मामला आया, जिसमें अदालत का मानना था कि दया-मृत्यु नरसंहार है। 1997 में त्रिचूर के रिटायर अध्यापक थामस मास्टर ने अपील की कि उन्हें अपनी मौत का समय, जगह और तरीका चुनने का अधिकार दिया जाए। हाईकोर्ट में अर्जी ठुकराए जाने के चार साल बाद थामस ने फांसी लगा ली। नोट छोड़ा- ‘मौत से भयंकर है अशक्त रहना।’ विधि आयोग ने 2006 में दया-मृत्यु के लिए विधेयक का मसविदा तैयार करने का सुझाव दिया था। सालों से कोमा में पड़ी मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग को दया-मृत्यु देने की इजाजत वाली याचिका पिंकी विरानी ने दायर की थी। 16 दिसंबर, 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सरकार को नोटिस दिया। 7 मई, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दया-मृत्यु के लिए दिशा निर्देश जारी किए और जीवनरक्षक प्रणाली हटाने और इन्जेक्शन देकर सांस रोकने में फर्क बताया। 11 अगस्त, 2012 को विधि आयोग ने डॉक्टरी मदद से दया-मृत्यु देने की सिफारिश की। इस सारी कवायद के बावजूद यह तय नहीं हो पाया कि दया-मृत्यु को किस रूप में वैध माना जाए। लोगों को मृत्यु का अधिकार दिलाने के लिए पिछले डेढ़ दशक से आंदोलन चला रहे ज्यूरिख स्थित संगठन ‘डिगनीटास’ के इक्यासी साल के संस्थापक लुडविग ए. मिनेली का कहना है कि भारत में तो दया-मृत्यु की इजाजत देने में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए। भारतीय दर्शन में मृत्यु को लेकर ज्यादा उदार नजरिया रहा है। लुडविग का मानना है कि आत्महत्या का लेबल हटा देने से आत्महत्या की प्रवृत्ति कम ही होगी। विभिन्न अदालतों में समय-समय पर जिन लोगों ने मृत्यु का अधिकार मांगा है उनका तर्क है कि महाप्रस्थान, निर्वाण, समाधि काशी यात्रा जैसे इच्छा-मृत्यु के रूप सनातन काल से भारतीय परंपरा का हिस्सा रहे हैं और समाज में वे मान्य रहे हैं। मनुस्मृति में भी कहा गया है कि अपनी तमाम इच्छाएं और जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद व्यक्ति को विरक्त हो जाना चाहिए और मृत्यु आने तक हवा और पानी पर ही निर्भर रहना चाहिए। एक व्यक्ति, जिसके बचने की रत्ती भर भी आस न हो, उसे निष्क्रिय हालत में कृत्रिम प्रणाली पर टिकाए रखना क्या उसके और उसके परिजनों के खिलाफ क्रूरता नहीं है। कानून अपनी जगह है, लेकिन व्यावहारिक रूप से दया-मृत्यु भारत में हो रही है। अक्सर परिजन अपने मरीज के बचने की आस छोड़ देते हैं। वे मरीज को पीड़ा से मुक्ति दिलाना चाहते हैं। कुछ मामलों में परिजन अपने मरीज को जीवन रक्षक प्रणाली पर ज्यादा समय तक रखने का खर्च उठाने की स्थिति में भी नहीं होते। कई कानूनविदों का मानना है कि जीवन के अधिकार से मृत्यु का अधिकार जुड़ा है। कोई व्यक्ति जब ऐसी स्थिति पर पहुंच जाए कि मृत्यु एकमात्र विकल्प बचे तो उसे अपना जीवन खत्म करने की इजाजत दे दी जानी चाहिए। समाज और धर्म से जुड़े कई लोग अत्यधिक पीड़ा की स्थिति में मरीज को दया-मृत्यु देने का समर्थन करते ही हैं। हालांकि कुछ डॉक्टरों का मानना है कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों का जीवन बचाने के और तरीके खोजे जाने चाहिए। दया-मृत्यु या इच्छा-मृत्यु को सामान्य रूप से एक विकल्प के तौर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। दया-मृत्यु या इच्छा-मृत्यु को वैध बना देने से उसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ सकती है। इसके लिए निश्चित रूप से कुछ कड़े दिशा निर्देश तय करने होंगे। दया-मृत्यु का समर्थन करने वाले भी इसके पक्ष में है। लेकिन बहस सिर्फ दया-मृत्यु पर नहीं है। गैर-सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ की मांग है कि सम्मानजनक मौत का अधिकार बुनियादी अधिकार माना जाए। सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला इसी की पुष्टि करता है।

आत्महत्या एक व्यसन भी
आत्महत्या, दया-मृत्यु, इच्छा-मृत्यु और मृत्यु के अधिकार को संवैधानिक मानने की बहस के बीच सही गलत का फैसला भले न हो पाए, भारत में जान देना एक अजीब तरह का व्यसन भी रहा है। तमिलनाडु में तो यह सामान्य जीवन का हिस्सा बन गया है। उस पर राजनीति का रंग चढ़ने से यह प्रवृत्ति सम्मानजनक मानी जाने लगी है। यही वजह है कि तमिलनाडु में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है। प्रेम, बीमारी, प्रताड़ना या किसी सामाजिक-पारिवारिक समस्या की वजह से 2013 में एक लाख 34 हजार 799 लोगों ने अपनी जान ली। यह संख्या उससे पिछले साल की तुलना में 64.5 फीसद ज्यादा थी। 2013 में हर एक घंटे में औसतन पंद्रह लोगों ने आत्महत्या की। एक समय आत्महत्या की प्रमुख वजह गरीबी, बेरोजगारी और कारोबार में घाटे को माना जाता था। ये वजहें अभी भी हैं, लेकिन औसत के मामले में नाकाम प्रेम, पारिवारिक झगड़ों और बीमारी के बाद अब आत्महत्या की तीसरी सबसे बड़ी वजह बन गया है। प्रेम में नाकामी हर रोज बारह लोगों की जान ले लेती है। तमिलनाडु में तो अपनी जान देने को लालायित रहने वालों की कुछ और विचित्र वजह है। 2014 में जब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को सजा हुई तो करीब बीस लोगों ने आत्महत्या की कोशिश की। जयललिता को राजनीति में लाने वाले एमजी रामचंद्रन अक्सर बीमार रहते थे। एक बार वे गुर्दे के इलाज के लिए अमेरिका गए तो उन्हें चाहने वाले यह क्षणिक विछोह भी सहन नहीं कर सके। राज्य के कई हिस्से में लोगों ने आग लगा कर, जहर पीकर या ट्रेन के आगे कूद कर जान दे दी। जब एमजीआर का निधन हुआ तो कई महिलाएं ‘सती’ हो गईं। ऐसी घटनाएं लोगों का अपने नेताओं के प्रति अगाध प्रेम तो जाहिर करती ही हैं, खुद को पीड़ा पहुंचा कर अपने ‘भगवान’ के कष्ट दूर करने की संतुष्टि भी इससे जुड़ी है। द्रविड़ संस्कृति में खुद जीवन का अंत करने को एक कलात्मक अभिव्यक्ति माना गया है। आज के समय में भी ऐसी मान्यताओं को बदलने की राजनीतिक स्तर पर कोई कोशिश नहीं हुई है। इसके बजाय राज्य की राजनीति जान दे देने के जुनून को बढ़ावा देने की ही कोशिश करती है। दोष सिर्फ राजनेताओं का नहीं है। लोग भी आत्महत्या करने वालों का सम्मान करते है। एक लोककथा के अनुसार गरीबी से तंग आकर एक महिला ने सात बच्चों के साथ कुएं में कूद कर जान दे दी थी। विरुधनगर जिले के अर्चनापुरम में उसे आज भी देवी की तरह पूजा जाता है और उसकी याद में हर साल वहां मेला लगता है। इच्छा-मृत्यु की इजाजत और आत्महत्या की कोशिश को अपराध के दायरे से बाहर रखने की पहल निश्चित रूप से मानवीय है। कोशिश इस बात की भी होनी चाहिए कि आत्महत्या की प्रवृत्ति लोगों में पनपे ही नहीं। इसके लिए एक आदर्श सामाजिक ताना अगर बन पाए तो क्षणिक आवेग या निराशा की स्थिति में अपने जीवन का अंत करने को ही अंतिम पर्याय मान लेने की लोगों की सोच को बदला जा सकता है।


1994 में पी. रत्नम बनाम केंद्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने सवाल आया कि क्या भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 301 के तहत आत्महत्या की कोशिश असंवैधानिक है या धारा 309 में इसे अपराध माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने तब इन दोनों मान्यताओं को खारिज कर धारा 301 को क्रूर और अपमानजनक बताया था। अदालत का निष्कर्ष था यह व्यक्ति पर दोहरी मार है। एक पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए वह अपनी जान लेने की कोशिश करता है और बच जाने पर उसे ज्यादा यातना भुगतनी पड़ती है।

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