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बढ़ाएं परिचय की डोर

शादी-विवाह या किसी दूसरी खुशी के मौकों पर आयोजित समारोहों में जाना सभी को अच्छा लगता है। मगर कई बार ऐसे समारोहों में जाना खासा उबाऊ हो जाता है, जहां आप मेजबान के परिवार के अलावा किसी और को नहीं जानते। ऐसे में महिलाओं की स्थिति अजीब हो जाती है। कई बार पति अपने दोस्तों के साथ मशगूल हो जाते हैं, तो पत्नी अकेली पड़ जाती है। वह अकेली किसी कोने में बैठी पार्टी के खत्म होने का इंतजार करती रहती है। ऐसे अवसरों पर वे लोग अधिक लुत्फ उठाते हैं, जो अपरिचित से भी परिचय बना कर बातचीत का सिलसिला शुरू कर देते हैं। समारोहों में ऊब से बचने का यह सबसे अच्छा तरीका है कि आप वहां कोई परिचित तलाशने के बजाय किसी भी अपरिचित से किसी बात पर बातचीत शुरू कर दें। फिर बातों का सिलसिला चल निकलता है और आप ऊब से बच जाते हैं। समारोहों में ऊब से बचने के तरीके बता रही हैं सुमन बाजपेयी।

Author March 10, 2019 2:07 AM
प्रतीकात्मक फोटो

सुमन बाजपेयी
नीता की कॉलेज की दोस्त मनीषा ने जब उसे अपने घर पार्टी पर बुलाया तो वह बहुत उत्साहित हो गई थी। बरसों बाद वह उससे मिलने वाली थी। मनीषा के पति का तबादला कुछ दिनों पहले ही इस शहर में हुआ था। दिल्ली के एक संभ्रांत इलाके में रहने वाले एक उच्च पदाधिकारी के घर पार्टी हो और लोगों की भीड़ न हो, ऐसा तो मुमकिन नहीं। हालांकि नीता ने सोचा था कि छोटा-सा पारिवारिक जलसा होगा, पर मनीषा की कोठी का विशालकाय लॉन तो मेहमानों से भरा हुआ था। उसकी निगाहें इतनी भीड़ में किसी परिचित को ढूंढने लगीं, शायद स्कूल-कॉलेज के जमाने की कोई अन्य सहेली आई हो या कोई अपना ही जानकार यहां मिल जाए। पर अनजान चेहरों से उसकी निगाहें टकरातीं। कुछ देर बाद आकर मनीषा ने अपने पति से उसे मिलवाया और ‘फील कंफर्टेबल’ कह कर फिर भीड़ में खो गई।

पार्टी के दौरान वह यही सोचती रही कि काश इतने सारे लोगों के बीच कोई तो परिचित निकल आए, जिसके साथ जाकर वह खड़ी हो सके और बात कर सके। पति टूर पर थे, इसलिए उसे अकेले ही आना पड़ा था। उसका सारा उत्साह खत्म हो चुका था और वह बिना खाना खाए चुपचाप पार्टी से निकल आई।
सारिका एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती है। साधारण से परिवार की लड़की के लिए बड़ी-बड़ी पार्टियों, खासकर कॉकटेल पार्टी में जाना किसी बड़ी असुविधा से कम नहीं होता। नई-नई नौकरी थी, कंपनी की पार्टी है, इसलिए जाना ही पड़ेगा, ऐसा निर्देश उसे मिला था। हिचकते हुए जब वहां पहुंची, तो पहले तो उस माहौल को देख उसे बहुत हिचकिचाहट हुई। महिलाएं तक ड्रिंक कर रही थीं। वह इन सब चीजों की न तो आदी थी, न ही किसी को पार्टी में जानती थी। अपने पदाधिकारियों के बीच जाकर वह खड़ी होने की हिम्मत भी नहीं कर सकती थी। लेकिन जब तक पार्टी खत्म हो नहीं हो गई, उसे वहां ठहरना ही पड़ा, क्योंकि उसके बॉस ने उससे यही कहा था। क्या करती वह, पूरी पार्टी के दौरान वह सबसे कोने वाली खाली कुर्सी पर बैठी रही। उसे घबराहट भी हो रही थी कि कहीं उससे कोई कुछ पूछ न बैठे।

दायरा हुआ है विस्तृत
अनगिनत लोगों की भीड़ में भी पार्टी के दौरान खुद को अकेला महसूस करने की स्थिति से आजकल नीता जैसी अनेक महिलाएं गुजरती हैं। और यह भी सच है कि ऐसी स्थिति महिलाओं को ही ज्यादा झेलनी पड़ती है, क्योंकि पुरुष तो फिर भी बातचीत का सिलसिला कायम कर ही लेते हैं। कुछ नहीं तो ड्रिंक करने के बहाने ही अनजान लोगों से परिचय कर लेते हैं। महिलाएं अपने संकोची स्वभाव के कारण अनजान लोगों के बीच स्वयं को बहुत असहज महूसस करती हैं।
शहरीकरण ने जहां एक ओर पार्टियों के ट्रेंड को हवा दी है, वहीं समाज का फैलाव और लोगों का दायरा विस्तृत हो जाने की वजह से अपरिचित लोगों की संख्या में भी बढ़ोतरी हो गई है। एक समय था जब समाज छोटा था और अधिक से अधिक लोग एक-दूसरे को जानते थे। इसलिए जब भी वे किसी भी समारोह या पार्टी आदि में मिलते थे, तो एक-दूसरे से परिचित होने के कारण किसी को भी न तो अकेलापन लगता था न ही बोरियत महसूस होती थी। पार्टी भी तब किसी उत्सव से कम नहीं होती थी। हंसते-खिलखिलाते एक अपनापन इस कद्र कायम रहता था कि भीड़ में भी अकेले होने का एहसास होने का सवाल ही नहीं उठता था।

अपरिचय का घेरा
आज पार्टी देना अगर एक ओर स्टेटस सिंबल बन गया है, तो उसमें शामिल होना भी लोगों को किसी शान से कम नहीं लगता। किसी होटल में पार्टी हो या फार्म हाउस में तो बड़े गर्व से बताया जाता है कि हम वहां आमंत्रित हैं। फिर चाहे वहां पहुंच कर यह एहसास ही क्यों न हो कि मेजबान के सिवाय और तो कोई जानकार वहां है ही नहीं। मेजबान आखिर कितनी देर तक आपको कंपनी दे सकता है, बस बैठे रहिए किसी कोने में स्नैक्स कुतरते हुए। तब तो यही लगता है कि जल्दी से खाना खाएं और वहां से खिसकें। पति-पत्नी साथ गए हों, तब भी पत्नी को अकेलापन झेलना पड़ जाता है। शर्माजी के एक मित्र के घर पार्टी थी, पत्नी को भी आमंत्रित किया था। वहां पहुंचे तो मिसेज शर्मा ने देखा कि उनका परिचित तो वहां कोई भी नहीं था, यहां तक कि उस मित्र की पत्नी से भी वे पहली बार मिल रही थीं। शर्माजी के वे पुराने मित्र थे, इसलिए वे भी किसी को नहीं जानते थे। वैसे भी मित्र के दफ्तर के लोग वहां ज्यादा थे। कुछ देर बाद तो शर्माजी मित्र के साथ शराब पीने में इतने व्यस्त हुए कि उन्हें याद भी नहीं रहा कि उनकी पत्नी अकेली बैठी बोर भी हो सकती हैं।

बचें पार्टी फोबिया से
जिन महिलाओं के पति शराब पीने के शौकीन होते हैं, उन्हें अनजान लोगों की पार्टी किसी दुस्वप्न से कम नहीं लगती है। पति तो शराब के बहाने लोगों से घुल-मिल जाते हैं और पत्नी सैकड़ों की भीड़ में भी अकेली बैठी बोर होती रहती है। वैसे भी आज के समय में कोई भी किसी से परिचय बेवजह करने का इच्छुक नहीं होता है। यही वजह है कि कुछ लोगों के लिए पार्टी किसी फोबिया से कम नहीं होती है। वहां जाने के नाम से उनके मन में डर पैदा हो जाता है। लेकिन अपनी तरफ से परिचय करने की पहल कर आप इस फोबिया से निकल सकती हैं।अगर आपकी कोई परिचित किसी समूह में खड़ी है और आप उस समूह में किसी और को नहीं जानतीं तो इस बात की प्रतीक्षा न करें कि आपकी वह परिचित आपका परिचय दूसरों से कराएगी। खुद आगे बढ़ कर अपना नाम बताएं और बातचीत आरंभ करें। विषय कोई भी हो सकता है, करेंट अफेयर्स से लेकर किसी की साड़ी या नौकरी के बारे में। इसके लिए आपको दुनिया में क्या चल रहा है, इसकी खबर रखनी होगी। अपने अकेलेपन को दूर करना है, तो दूसरे की बात को ध्यान से सुनें, चाहे आपको उसमें दिलचस्पी हो या न हो, इससे बातचीत का क्रम बना रहेगा और सामने वाला भी आपसे बात करने को उत्सुक होगा। पार्टी की भीड़ में चाहे अकेलापन महसूस कर रही हों, पर किसी कोने में जाकर बैठने की गलती न करें। बल्कि परिचय की डोर बढ़ाने की कोशिश करें। इससे आप बेहतर ढंग से पार्टी का आनंद ले सकेंगी।

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