ताज़ा खबर
 

कविताएं: ‘जैसे हरी दूब भरा मैदान’ और ‘सब कबाड़’

राजकुमार कुम्भज जैसे हरी दूब भरा मैदान पश्चात्ताप नहीं उदासी नहीं, अवसाद भी नहीं ताकतवर प्रतिध्वनियों से जी चुराना या बच निकलना भी नहीं टकराने का खयाल है तो सीधे-सीधे ही दीवारों की कूद-फांद का भी कोई इरादा नहीं दीवारों की कूद-फांद का मतलब इन या उन दीवारों से उछल कर कुछ दूसरी दीवारों की […]

Author Published on: March 17, 2019 1:30 AM
प्रतीकात्मक फोटो

राजकुमार कुम्भज

जैसे हरी दूब भरा मैदान

पश्चात्ताप नहीं
उदासी नहीं, अवसाद भी नहीं
ताकतवर प्रतिध्वनियों से
जी चुराना या बच निकलना भी नहीं
टकराने का खयाल है तो सीधे-सीधे ही
दीवारों की कूद-फांद का भी कोई इरादा नहीं
दीवारों की कूद-फांद का मतलब
इन या उन दीवारों से उछल कर
कुछ दूसरी दीवारों की कैद ही होता है
स्वतंत्रता न यहां, न वहां, कहीं नहीं
जहां स्वतंत्रता नहीं, वहां मैं नहीं
मुझे तो मेरे मतलब की दीवारें ढहाना है
मैं प्रेम और दुख के सुलगते मैदान से होकर
किसी एक उज्ज्वल पगडंडी पर
रखना चाहता हूं अपने पांव और नंगधड़ंग
जानता हूं वहां नहीं होंगे चमकते चांद-तारे
जानता हूं वहां नहीं होंगे महकते पकवान
जानता हूं वहां नहीं होंगे रेशमी कार्यक्रम
वहां खत्म हो जाती हैं
हो ही जाती हैं खत्म वहां
पहाड़ों से आ रही रोशनी की किरचें
वहां बढ़ता जाता है ऊंची-नीची घाटियों का अंधेरा
किंतु बंद नहीं हो जाता है सभी फूलों का खिलना
रहे होंगे वे फूल कोई और रहे होंगे
जो जानते हैं इशारों पर नाचना और खिलखिलाना
मैं हजारों फूलों के खिलने की
आजादी चाहता हूं
मैं हजारों पक्षियों के चहचहाने की
आजादी चाहता हूं
मैं हजारों आंखों से बोलने की
आजादी चाहता हूं
मैं आदिम-आजादी की शुद्धता, पवित्रता
और लौह आवरण नियमों से मुक्ति चाहता हूं
सिर्फ किसी एक दिन के लिए नहीं, हर किसी दिन के लिए
किसी भी धूर्तता के अंत तक, किसी भी धूर्तता से परे,
छल-कपट भरे नियमों से अंत तक मुक्त
जैसे हरी दूब भरा मैदान।

सब कबाड़

घर में रखी हर किसी चीज से
जुड़ी होती है कोई न कोई स्मृति या कथा
फिर धीरे-धीरे बहुत कुछ चला जाता है
विस्मृति में कि सब कबाड़
मुस्कुराहटें भी खो जाती हैं कहीं न कहीं
अट्टहास, ठहाके और चुटकुले भी हो जाते हैं गुम
तुतलाती लोरियां तक हो जाती हैं गायब
कौन कब आया था
कौन कब गया
यह भी याद रख पाना
हो जाता है कठिन
कठिनाई भरी रातों की याद आने पर
बढ़ने लगती हैं सिर्फ व्यथाएं और मुश्किलें
घर का नायक
कब खलनायक बन जाता है
पता ही नहीं चल पाता है
बेटियां बड़ी हो जाती हैं बड़ी जल्दी-जल्दी
और अपनी बेटियों में खो जाती हैं स्त्रियां
बेटे बड़े हो जाते हैं
और घर से अलग हो जाते हैं
झर चुका होता है इठलाना
बीत चुका होता है बहलाना
मन नहीं होता है बचकाना
जिन पुस्तकों को पढ़ते-पढ़ते
सपनों की सैर को निकल जाया करते थे कभी
अकस्मात ही हो जाती हैं रद्दी
कुर्सी और मेज और रेडियो भी
बिक जाते हैं एक दिन कबाड़ में
किंतु यह क्या, वह क्या, सब कबाड़
कि मुट्ठीभर नमक तक मिल पाता नहीं
बिके कबाड़ के पैसों से?
जिन चीजों को पल-पल प्रेम किया
जिन चीजों की जीवन भर झाड़ते रहे धूल
सब कबाड़, ये कैसा जुगाड़?
शायद यही है जीवन भर का सच
कि आदमी जीवन भर इस दुनिया में
अपनी पसंद का कबाड़ इकट्ठा करता रहता है
और न जाने कैसे खुद एक दिन, एक दिन
फिर कबाड़ होके मरता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 होली आई रे…
2 नन्ही दुनिया: कविता और शब्द भेद
3 नन्ही दुनिया: बिजली वाले मास्टरजी