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ओ मांझी रे!

मांझी’ शब्द के आते ही एक समूचा नदी दृश्य उभर आता है : धारा का, नाव का, और उसे खेते हुए व्यक्ति का, जो खे रहा है वह मांझी है। और यह मांझी जब गाता है तो बन जाते हैं ‘मांझी गीत’, जिनकी एक बड़ी समृद्ध परंपरा, नदियों से भरे-पूरे हमारे देश में न जाने कबसे चली आ रही है।

Author March 24, 2019 1:34 AM
प्रतीकात्मक फोटो

प्रयाग शुक्ल

मांझी’ शब्द के आते ही एक समूचा नदी दृश्य उभर आता है : धारा का, नाव का, और उसे खेते हुए व्यक्ति का, जो खे रहा है वह मांझी है। और यह मांझी जब गाता है तो बन जाते हैं ‘मांझी गीत’, जिनकी एक बड़ी समृद्ध परंपरा, नदियों से भरे-पूरे हमारे देश में न जाने कबसे चली आ रही है। ए ‘मांझी गीत’ अब बहुत से ‘यू ट्यूब’ पर उपलब्ध हैं। मौलिक मांझी गीतों से अधिक वे, जो मांझी प्रसंग से, हिंदी-बांग्ला में विशेष रूप से फिल्मों में पिरोए गए हैं। ‘सुजाता’ फिल्म के मांझी गीत- ‘सुन मेरे बंधु सुन मेरे मितवा’ की, और ‘बंदिनी’ के ‘ओ मेरे मांझी ले चल पार, ले चल पार’ की याद तो सहज ही हो आती है। दोनों ही गीत, न जाने कितनों के प्रिय गीत हैं। इन दोनों के ही स्वर-संगीत सृजनकर्ता सचिन देव बर्मन हैं, जो त्रिपुरा के थे और बंगाल के लोकगीतों से विशेष रूप से प्रभावित थे। बंगाल, और बांग्लादेश, यों भी ‘मांझी गीतों’ के ‘गढ़’ रहे हैं- छोटी-बड़ी नदियों के कारण। और वहां मांझी गीतों की एक बड़ी परंपरा ‘भटियाली’ के रूप में बनी रही है।

कभी-कभी सोचता हूं, ‘मांझी’ प्रसंग के गीत ही, लोक गीत हों, कविताएं हों- उन सबके प्रति गहरी उत्सुक्ता, क्यों जागती है? क्यों लगते हैं वे इतना अधिक मर्मस्पर्शी। इसका एक ही उत्तर मिलता है, कि जब मांझी नदी की धारा के बीच से किसी को ‘गुहार’ लगा रहा होता है, तो हम भी उस ‘गुहार’ का एक हिस्सा बन जाते हैं, और चाहे ग्रामवासी हों या नगरवासी, अपनी जगह से स्थानांतरित होकर, हम नदी के विस्तार में, खुले आकाश के नीचे पहुंच जाते हैं, और वहां मांझी के नाव खे रहे होने के साहस को सराहने लगते हैं। उसके ‘अकेलेपन’ में, उसके दुख-सुख में, उसके शब्दों में, कई जीवन-मर्म झलक उठते हैं।
हां, ‘मांझी’ गीतों में और उसके प्रसंग से लिखी गई रचनाओं में, या तो ‘मांझी’ किसी को ‘गुहार’ लगाता है, या फिर कोई ‘मांझी’ को ही अपना दुख-दर्द सुनाने का एक बहुत अच्छा पात्र मान लेता है। याद कीजिए कवि केदारनाथ अग्रवाल का वह मर्मभरा गीत : ‘मांझी न बजाओ वंशी मेरा मन डोलता, मेरा मन डोलता है जैसे जल डोलता, जल का जहाज जैसे प्रतिपल डोलता…’ तो सचमुच मांझी के कुछ गाने-बजाने से हमारा मन डोलने लगता है। एक नई ही अनुभूति होती है, जीवन-जगत को लेकर। मांझी एक रूपक, एक प्रतीक, एक बिंब भी बन जाता है- ‘पार’ कराने वाला, संदेश पहुंचाने वाला! एक गीत यह भी है न, ‘माझी रे जइयो पिया के देश…’
जयशंकर प्रसाद का वह गीत तो मेरे प्रिय गीतों में है : मांझी साहस है खे लोगे, जर्जर तरी भरी पथिकों से… झड़ में क्या खोलोगे? हां, पार कराने वाले से हमारी प्रत्याशा बड़ी होती है। वह हमारी हिम्मत बढ़ाना चाहते हैं। यह बहुतों का अनुभव होगा कि जब वे नाव पर बैठे होंगे, और मांझी स्वयं न गा रहा होगा, तो उससे उन्होंने गाने का आग्रह किया होगा। मांझी स्वर बहुत अलग जो होता है।
कभी-कभी तो कुछ अत्यंत तरल, अत्यंत विह्वल गीत गायकों ने मानो स्वयं ‘मांझी बन कर’ गाए हैं, या मांझी के सुर में सुर मिला कर गाए हैं। भूपेन हजारिका की वह आवाज विहृल कर देती है न, आकुल-व्याकुल… ‘गंगा बहती हो क्यूं…‘’
नदी और गाने का भी तो एक संबंध है। नदी पर हों या उसके निकट… बहती हुई धारा मानों कंठ को खोल देती है। हरिवंश राय ‘बच्चन’ इस प्रसंग में कितना याद आते हैं, जिन्होंने लिखी हैं ये पंक्तियां :
‘कोई पार नदी के गाता…
आज न जाने क्यों होता मन
सुन कर यह एकाकी गायन,
सदा इसे मैं सुनता रहता,
सदा से यह गाता जाता!
कोई पार नदी के गाता!’
मांझी गीतों को सुन कर भी तो यही लगता है कि बस उन्हें सुनते जाएं! मांझी में ‘बिछुड़न’ का एक भाव भरा हुआ है। वह अपनी नाव के साथ, तट से तो बिछुड़ता ही है, गृह से भी बिछुड़ता है, भले ही कुछ घंटों या दिनों के लिए… यह ‘बिछुड़न’ उसके स्वर को मानो स्वत: आर्त बना देती है। मांझी गीत, आर्त कंठ की पुकार ही तो हैं। वे सन्नाटे को भेदने वाले भी हैं। वर्षा ऋतु में यह आर्तकंठ विशेष रूप से मर्म-बेधी हो उठता है। ऊपर बादल हैं, नीचे जल है, बादलों के कारण एक अंधेरी-सी छाया चारों ओर फैली हुई है- ऐसे में ‘मांझी’ भला चुप कैसे रह सकता है। उसके मन में हलचल स्वाभाविक है।
मांझी गीतों में मानो इसीलिए एक तड़ित-त्वरित गति का एहसास भी छिपा होता है। वे ‘तेजी’ से हमारी ओर आते हैं। हमसे टकराते हैं। धारा के जल का स्पर्श लिए, हवाओं की गूंज लिए, हमारे मन में उतरते हैं।
‘मांझी’ कहते ही, वे तमाम फोटो, चित्र, फिल्म दृश्य, भी तो स्मृतियों से निकल कर ‘सजीव’ हो उठते हैं, कभी न कभी देखे हुए। वे सजीव हो उठते हैं तो इसलिए भी कि हमने स्वयं ‘साक्षात’ मांझी को देखा होता है। निकट से, दूर से, बहती जल-धारा में जाते हुए। सन 2000 से 2008 के बीच में, वर्ष में एक-दो बार गुवाहाटी जाता था। ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठ कर, गुजरने वाली स्टीमरों, बड़ी-छोटी नावों को देखा करता था। और सिर्फ गुवाहाटी में क्यों, केरल, महाराष्ट्र, बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश की नदियों में भी तो देखा है मांझियों को, दो-चार बार सुने हैं, उनसे गीत भी, अनायास, आग्रह करके। वे अलग-अलग भाषाओं और जनपदीय बोलियों में उपलब्ध हैं। पर, फिर स्वीकार करूं कि एसडी बर्मन जैसे गायकों/ संगीतकारों के ‘सृजित’ मांझी गीत-संगीत में बांधे गए गीत-हमें अधिक याद आते हैं। कारण यही कि हम नगरवासी उन्हें ही अधिक सुनने के आदी रहे हैं- यह आनंद भी उठाते हुए कि उनके पीछे ‘लोक’ की शक्ति भी समेटी गई है। हां, बिना लोक के स्रोत के ‘मांझी’ गीतों, कविताओं की सृष्टि संभव कहां है!
जब रूना लैला के स्वर में सुनता हूं, ‘सुजन मांझी रे कोन धारे लगाइबो तोमार नाव’ (सुजन मांझी किस घाट पर अपनी नाव लगाओगे!) या फिर यह गीत सुनता हूं ‘मांझी बाहिया जाओ रे’ (मांझी बहते जाओ रे) तो, मन में बहती हुई धारा के बीच, कई तरह की गतिबिधियों की कल्पना करने लगता हूं। यह नोट करना भी जरूरी है कि मांझी के गीत या उसको संबोधित गीत, सिर्फ दु:ख-सुख, और आर्त पुकार वाले ही नहीं होते! वे आनंद वाले भी होते हैं, जब मांझी अपना कंठ अपने चारों ओर के सुंदर वातावरण के साथ पिरो देना चाहता है। वे सौंदर्यबोधी भी होते हैं- हर हाल में अनिवार्यत:।
‘निराला’ ने लिखा है न,
‘बांधो’ न नाव इस ठांव ‘बंधु’
पूछेगा सारा गांव बंधु!
वह यहीं नहाती थी फंस कर,
आंखें रह जाती थीं हंस कर…’
तो, माझी के लिए, खेने वाले के लिए, ‘बंधु’ संबोधन, एक और आयाम प्रकट करता है! उसके साझीदार, राजदां होने का आयाम! हां, कई आयाम हैं, मांझी गीतों के, कोई एक नहीं।
महादेवी वर्मा लिखती हैं :
‘घटाएं घिर आर्इं घनघोर,
बेग मारुत का है चहुं ओर,
कौन पहुंचा देगा उस पार!’
‘मांझी’, बंधु है। खेवनहार है। अपने आप में निपुण एक व्यक्ति है। साहस का प्रतीक है। जलधारा के, प्रकृति के कोई रहस्य जानता है…
तो फिर मांझी गीतों में भी यही सब गुण होने ही हैं। इन सबमें एक आकर्षण है! ०

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