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नन्ही दुनिया- कहानी: बंटू

बंटू का घर दूसरी मंजिल पर था। बंटू को छत पर जाना, छत पर टहलना बड़ा अच्छा लगता था। छत पर जाने का एक और विशेष कारण था, जिससे वह अक्सर छत पर जाया करता था। उसकी मां ने छत पर काफी गमले लगा रखे थे।

Author Published on: March 24, 2019 2:26 AM
प्रतीकात्मक फोटो

सीमा श्रोत्रिय

बंटू का घर दूसरी मंजिल पर था। बंटू को छत पर जाना, छत पर टहलना बड़ा अच्छा लगता था। छत पर जाने का एक और विशेष कारण था, जिससे वह अक्सर छत पर जाया करता था। उसकी मां ने छत पर काफी गमले लगा रखे थे। गमलो में बहुत से सुंदर-सुंदर मनोहारी फूल लगे हुए थे। बंटू काफी-काफी देर तक उन फूल-पत्तियों को बारीकी से निहारता रहता था। फिर सारा हिसाब रखता कि कौन-सा फूल कब खिला है, कौन-सा फूल मुरझा गया है और कौन-सी पत्ती किस फूल की है? कब कली फूल बन कर रिझा जाती और कब भंवरा अपने मीठे गुंजन से बंटू को आनंदित कर देता, यह मस्ती में पता ही नहीं चल पाता। नील गगन से जब कभी बरखा की फुहारें बंटू के मुंह पर पड़तीं तो वह ताली बजा-बजा कर आनंद से झूमने लगता। बंटू को एक-एक फूल से बड़ा प्यार था। मानो वह उनसे ऐसे बातें करता जैसे वह किसी सजीव से बात कर रहा हो।
प्रकृति के नियम के मुताबिक भंवरे गुंजायमान करते और मधुमक्खियां खिले फूलों पर बारंबार मंडराती रहतीं। सभी जीव अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते। पर बंटू कभी भी किसी को परेशान नहीं करता। वह उन सभी को बड़ा प्यार करता। ठंडी-ठंडी बयार चलती तो उसको बड़ा आनंद आता। वर्षा के समय बंटू पत्तियों पर पड़ी बरखा के जल की छोटी-छोटी बूंदों को हाथ में लेने का निरर्थक प्रयास करता। जब वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं होता तो बड़ा परेशान हो जाता। उसकी मां आवाज देतीं तो बड़े भोलेपन से कहता, मां अपने बच्चों को छोड़ कर कैसे आऊं? मेरे बिना इनका खयाल कौन रखेगा? उस समय उसकी मां बंटू की भोली-सी सूरत को देख कर मुस्कुराए बिना न रहती।
बंटू को प्रकृति से अद्भुत प्रेम था। सुबह-शाम बिना नागा किए वह छत पर ऐसे भागता जैसे उसका छत से कोई अटूट नाता हो। छत पर रखे गमलों के लगे पौधों-फूलों के अलावा आसपास की हरियाली को बढ़ाने वाले पेड़ों के बाशिंदे पक्षियों के कलरव में उसका मन रम जाता।
एक दिन जब सूरज छिप गया तो मां के बार-बार बुलाने पर बंटू नीचे आया तो थोड़ी देर में उसे कुछ आवाजें सुनाई दीं। बंटू ने अनुमान लगाया कि आवाजें तो छत पर से आ रहीं थीं। अब बंटू बेचैन हो उठा। उसे लगा, जैसे उसके फूलों पर कोई संकट आ गया है और फूल बंटू को अपनी मदद के लिए पुकार रहे हो। उसने सोचा, अगर अब वह छत पर गया, तो मां निश्चित रूप से उसे डांट लगाएंगी। हां, उसे अंधेरे में ऊपर जाने में भी तो डर लगेगा और अगर वह ऊपर नहीं गया तो पता नहीं उन फूलों का क्या होगा?
आवाजें लगातार बढ़ती जा रही थीं। झींगुरों की आवाजें जैसे रुनझुन-रुनझुन कोई गीत गा रही हों। बंटू यकायक बोल उठा, मां चलो ऊपर चलते हैं, मेरा हवा में घूमने का मन हो रहा है। मां अपने बेटे को अच्छी तरह जानती थी। वह समझ गई जरूर बंटू के मन में कोई खिचड़ी पक रही है, तभी वह ऊपर जाने का बहाना बना रहा है। पर मां अपने बेटे की बात टाल नहीं पाई और बंटू के साथ ऊपर छत पर चली गर्इं। ऊपर जाने पर जैसे ही मां ने बिजली जलाई तो देखा कि एक झींगुर को बिल्ली ने मुंह में दबा रखा है और झींगुर छटपटा रहा है। यह देख कर बंटू को बड़ा गुस्सा आया। उसने आव देखा न ताव, तुरंत एक पत्थर उठाया और बिल्ली के ऊपर बड़ी तेजी से मार दिया। बिल्ली कूद कर भाग गई। मां बड़ी कौतूलता से देख रही थी। मां बोली, तुमने एक छोटे से कीड़े को बचाने के लिए एक और जीव को क्यों पत्थर मारा? क्या तुम्हें बिल्ली से प्यार नहीं है। तब बंटू ने कहा, नहीं मां, ऐसी बात नहीं है। दरअसल ये बड़े जीव छोटे जीवों को खा जाते हैं। हमें सभी जीवों से प्यार करना चाहिए। अपने लाड़ले के मुंह से ऐसी बड़ी बात सुन कर मां अवाक रह गर्इं। सच ही कहा गया- हमें सभी जीवों पर दया करनी चाहिए।

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