ताज़ा खबर
 

कहानी: जो उसे मंजूर

अरविंद सुना रहा था कि निजी अस्पतालों का छत्रकों की तरह उग आना गरीबों के लिए मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ने जैसा है। मैं जिस अस्पताल में कुछ महीने के लिए काम कर रहा था, उसका मालिक दसवीं पास बनिया था।

Author March 17, 2019 1:38 AM
प्रतीकात्मक फोटो

सुशीलकुमार फुल्ल

अरविंद सुना रहा था कि निजी अस्पतालों का छत्रकों की तरह उग आना गरीबों के लिए मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ने जैसा है। मैं जिस अस्पताल में कुछ महीने के लिए काम कर रहा था, उसका मालिक दसवीं पास बनिया था। वह हमें टारगेट दे देता था कि हर डॉक्टर को एक दिन में इतने पैसे बनाने ही बनाने हैं और अगर वह नहीं बनाएगा तो उसके वेतन से कट जाएंगे। मैं तो हैरान रह गया, जब मेरे एक साथी डॉक्टर ने पेट दर्द से पीड़ित एक मरीज का पेट ही चीर कर रख दिया, ताकि उसका बिल ज्यादा बन जाए। बाप रे बाप। मसीहा कहे जाने वाले डॉक्टर भी आज कसाई बन गए हैं।
यहां भी डॉक्टर ने विवेक को आपरेशन थियेटर में तो अंदर कर लिया, पर दफ्तर के संबद्ध क्लर्क ने कहा- आपरेशन तो तभी होगा न, जब पहले पांच लाख रुपए जमा करवाओगे।
उसकी अमानवीयता पर सब थू थू करने लगे, पर कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। पुरु ने सोचा। वह तुरंत डॉ. संजीत कटोच के पास पहुंचा और सारी स्थिति बताई।
डॉ. कटोच ने जो बीस हजार अभी-अभी एटीएम से निकलवाए थे, वे जेब से निकाल कर उसे पकड़ा दिए। और तैसे ही यह खबर स्टाफ और छात्रों में पंहुची, सभी ने जो जिसके पास था या जो उनके खाते में था, निकलवा कर इकट्ठा किया और अस्पताल में जमा करवा दिया।
पैसा जमा होने पर ही ऑपरेशन शुरू हुआ।
०००
आईसीयू में मरघट की-सी शांति थी। संयोग ही था कि ब्रेन सर्जरी वाला डॉक्टर रिजवान आज ही दिल्ली से लौटा था। विवेक को तुरंत आपरेशन थियेटर में ले गए और उपचार शुरू हो गया था।
बाहर पूरा कॉलेज खड़ा था। सभी छात्र निस्तब्ध और गमगीन। कभी-कभी छोटी-सी गलती भी कितना बड़ा संकट पैदा कर देती है। तब लगता है कि हम तो बस कठपुतलियां हैं किसी महाशक्ति के हाथ में। कभी हम ज्यादा ही फड़फड़ाने लगें तो कोई अचानक हमारे पर कतर देता है। और हमें धरती पर पटक देता है।
लेकिन कहीं न कहीं इसका परोक्ष कारण अपनी गलती भी तो होती ही है, जिसे हम झुठलाने का ढोंग रचते हैं, लेकिन मन ही मन उसे स्वीकार भी कर रहे होते हैं। यहां रमण अपने आप को कोस रहा था। पर क्या फायदा?
०००
उसकी आंखों से टप टप आंसू गिर रहे थे।
क्षण भर में ही क्या से क्या हो गया। अभी सभी साथी हुड़दंग मचा रहे थे और उनकी खिलखिलाहट दूर तक बर्फ की परतों पर फिसलती जा रही थी। पुरु ने उसे अपनी बाहों में उठाया और वह तेजी से अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा। यह संयोग ही था कि विवेक मोटरसाईकिल से जहां पर फिसला था, वह जगह बिल्कुल एक निजी अस्पताल के सामने थी। सभी सहपाठी जल्दी-जल्दी डग भरने लगे। विवेक के सिर से खून की धार बह रही थी।
पुरु उसे बार-बार पुकार रहा था, पर विवेक बेसुध होता जा रहा था। पुरु सोच रहा था कि मां-बाप कभी यों ही बच्चों को मना नहीं करते। उसके पीछे कुछ न कुछ तर्क होता है, जीवन का अनुभव होता है। वह भी अपनी जिद पर अड़ा हुआ था कि मोटरसाईकिल ही लेगा और कुछ नहीं।
पुरु के पिता उमेश ने कहा था- तुम्हें छोटी कार ले देता हूं। मोटरसाईकिल तो खतरनाक होती है। बहुत लोग दुघर्टनाग्रस्त हो जाते हैं। कार अपेक्षाकृत सुरक्षित होती है।
‘कार में कौन-सा लोग नहीं मरते। भारत स्टोर वालों की कार पर बड़ा डंपर ही चढ़ गया था और सबके सब लोग अंदर ही पिचक गए थे।’ पुरु ने फुफकारते हुए कहा था।
मां ने कहा- पुरु, कार ही ले लो। कभी मां-बाप का कहना भी मान लेना चाहिए।
‘नहीं, मेरे प्रोफेसर स्कूटर पर आते हैं और मैं कार में जाऊं? नहीं, अगर आप नहीं ले कर देना चाहते मोटरसाईकिल तो न सही। मैं कार नहीं लूंगा, और स्कूटर भी नहीं। स्कूटर तो लड़कियां चलाती हैं।’ वह बिफर उठा था।
‘अरे भई, प्रोफेसर तो कैंपस में ही रहते हैं।’ मां ने कहा था।
‘मैं भी तो कैंपस में ही रहता हूं।’
यही तर्क-वितर्क कभी विवेक और उसके मां-बाप में भी हुआ होगा या सभी मामलों में होता होगा। पर फेसबुक पीढ़ी तो ‘थ्रिल’ की दीवानी है, स्पीड चाहिए, धीरे-धीरे सरकने वाला जीवन नहीं।
शायद विवेक की मां ने भी कहा होगा- बच्चा ले तो लो मोटरबाईक, लेकिन जरा संभल के चलना। पर जब कुछ हो जाता है, तो सब निरर्थक लगता है और अपनी बेबसी पर फंदा लगाने का मन होता है।
०००
बरसों बाद पहाड़ पर इतनी बर्फ पड़ी थी। चारों तरफ सफेद चादर बिछी हुई। और ठिठुरते-सिकुड़ते हुए पंछी यहां-वहां आरामदेह स्थलियों की खोज में भटक रहे थे।
विवेक इंतजार करता रहा कि मौसम खुल जाए तो वह मुर्गियों को देखने जाएगा। बस अब डिग्री पूरी होने में कुछ महीने का समय बचा था। फिर वह सरकारी नौकरी के लिए प्रयत्न करेगा। उसके पिता कहते हैं कि सरकारी नौकरी में भविष्य सुरक्षित रहता है और प्राइवेट नौकरियों में तो कंपनी वाले अर्क निकाल लेते हैं। उसे आश्चर्य हुआ था, जब उसके कालेज का ही एक पार्टटाइमर अध्यापक सम्मानजनक नौकरी छोड़ कर सरकारी अस्पताल में प्रयोगशाला सहायक लग गया था। पच्चीस हजार महीने की नौकरी छोड़ कर आठ हजार की सरकारी नौकरी में लगना कितना कष्टप्रद रहा होगा।
पर यह समय की सच्चाई थी। छोटी-सी सरकारी नौकरी निकलती तो स्नातक, स्नातकोत्तर स्तर की डिग्रियां थैले में डाले हुए सैकड़ों प्रार्थी दफ्तरों पर धावा बोल देते। उस की खुशकिस्मती थी कि उसे पशुचिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय में प्रवेश मिल गया था और उसे प्रदेश से बाहर नहीं जाना पड़ा था। उसकी मां सावित्री ने कहा था- बेटा, खूब मन लगा कर पढ़ो और नाम कमाओ। हमने तो जैसे-तैसे जीवन में काम चला लिया। यह भी भगवान का ही शुक्र है कि तुम्हें दाखिला मिल गया। आम आदमी के लिए बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाना तो बहुत मुश्किल होता जा रहा है।
‘मां, आपको अब कोई चिंता नहीं करनी। मैं कॉलेज से निकलते ही क्लास वन अफसर लग जाऊंगा और आपके सब रोने-धोने खत्म कर दूंगा।
पिता रामपाल ने कहा- बेटा, पहले पढ़ाई पूरी कर लो। फिर बड़े-बड़े सपने देखना। आजकल सरकारी नौकरी इतनी आसान नहीं है।
विवेक को पिता का कमेंट अच्छा नहीं लगा था, पर वह चुप ही रहा। शायद उसका अतिउत्साह ही था कि उसने क्लास वन अधिकारी बनने की पहले ही घोषणा कर दी।
०००
सड़क पर बर्फ ही बर्फ गिरी हुई थी। उसका एक्सपेरिमेंटल फार्म लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर था। साथियों ने सोचा कि पैदल ही चला जाए। फिर रमण ने कहा- बंधुओ, पैदल जाता हुआ आदमी भी तो फिसल सकता है। क्यों न आज मोटरसाईकिलों पर ही चलें। मौज-मस्ती भी हो जाएगी और काम भी। पता भी चल जाएगा कि हम कितने कुशल हैं बाइकिंग में।
‘नहीं यार, मैं तो पैदल ही चलना चाहूंगा। पहले ही बड़ी मुश्किल से मेरे मां-बाप ने मुझे मोटरसाईकिल लेकर दिया है। व्यर्थ में क्यों खतरा मोल लेना।’ विवेक ने स्पष्ट कहा।
रमण बोला- यार, बड़े डरपोक हो। लाओ मुझे दे दो चाबी और तुम पीछे बैठो। मैं चलाऊंगा।
विवेक असमंजस में था। फिर उसने मोटरसाईकिल निकाल ही ली। दोस्तों के ताने भी कितने सुनता।
सड़क पर बर्फ ही बर्फ बिछी हुई थी। अभी एक-दो सप्ताह पहले सड़क के किनारे खुदाई करके टेलीफोन की किसी निजी कंपनी ने तारें बिछाई थीं। उससे सड़क किनारे पर ऊंची-नीची हो गई थी और मोटरसाईकिल वालों को ज्यादा दिक्कत हो रही थी। कई लोग फिसले भी, लेकिन बच गए। विवेक के मन में पहले ही डर था और वह संभल-संभल कर मोटरसाईकिल चला रहा था। पीछे बैठा रमण कह रहा था- और तेज, और तेज। मोटरसाईकिल है, गधी पर तो नहीं बैठे। विवेक ने थोड़ा-सा रेस दिया और पीछे से आई तेज बस ने उसका संतुलन बिगाड़ दिया।
बस फिर क्या था। वह सड़क पर पड़ा था और मोटरसाईकिल उसके ऊपर। रमण छिटक कर एक ओर जा गिरा था। उसका रूममेट पुरु दौड़ा आया और उसने विवेक को दोनों बाजुओं में उठा लिया और वे सब अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड की ओर भागे।
‘ओह, यह क्या हो गया? मैंने ही उसे मौत के मुंह में धकेल दिया। मैं ही उसका हत्यारा हंू।’ रमण जोर-जोर से रो रहा था।
‘रमण, वह ठीक हो जाएगा । अभी तो हमें उसे अंदर पंहुचाना है डॉक्टर के पास। डॉक्टर कहते हैं कि हेड इंजरी होने पर जो पहला घंटा होता है, वह गोल्डन आवर होता है और दुर्घनाग्रस्त व्यक्ति के बचने के पूरे चांस होते हैं। हौसला रखो और अंदर चलो।’ एक दूसरे सहपाठी ने कहा था।
पुरु की आंखों से आंसू टप टप बह रहे थे, पर वह फिर भी दौड़ा जा रहा था। रमण गुमसुम पीछे-पीछे चल रहा था मरियल कुत्ते-सा।
०००
वह धीरे-धीरे ठीक हो रहा था या कम से कम उसके साथियों को ऐसा लगता था और डॉक्टर की रिपोर्ट भी तो यही कहती थी, लेकिन वह अभी बोलने नहीं लगा था। बस कभी-कभी लगता वह बोलने की कोशिश करना चाहता है।
आज अचानक उसे फिर उसी अस्पताल में लाया गया, तो सबका माथा ठनका। उसे घर भेजा था, ताकि वह घर के परिवेश में जल्दी ठीक हो जाए, पर घर से चंडीगढ़ और फिर वहां से इस पहाड़ी अस्पताल में लौटना। चंडीगढ़ अस्पताल में वह कोमा में चला गया, तो फिर सबकी दुआ परमात्मा से ही थी। पुरु सोच कर चकरा गया, लेकिन किससे क्या कहे। उसने डॉक्टर को कहते सुना कि सैप्टिसीमिया हो गया है। ब्रेन इन्फेक्शन से परमात्मा ही बचा सकता है। लेकिन हो गई तो आरपार का युद्व छिड़ जाता है। पूरा कॉलेज इंतजार में था और डॉक्टर ने बाहर निकल कर कहा- ‘ही इज नो मोर। आई एम सॉरी।’
विवेक के माता-पिता वहां शांत खड़े थे। पिता ने शीश झुका कर कहा- ‘जो उसे मंजूर।’ मां फफक रही थी। सारा कॉलेज बिलख रहा था।
रमण पागलों की तरह विवेक के पांव में लोट रहा था और चिल्ला रहा था- ‘मुझे मारो, मैं ही उसका हत्यारा हूं। मैंने ही उसे उकसाया था।’
पखेरु उड़ चुका था अपनी अनंत यात्रा पर। समय को कब कौन साध पाया। कोई कभी नहीं जान पाया।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App