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कहानी: झुंड

शाम को दो दिनों से अचानक कोहरा ज्यादा घना होने लगा है। गलन भी बढ़ गई है। पहाड़ों पर बर्फबारी शुरू हो गई है। फिरंगी अभी-अभी आग जला कर बैठे हैं। उन्हें सुर्ती की तलब लगी हुई है। थोड़ी देर पहले ही रोटी-चोखा खाए थे।

Author March 24, 2019 1:25 AM
प्रतीकात्मक फोटो

गोविंद उपाध्याय

शाम को दो दिनों से अचानक कोहरा ज्यादा घना होने लगा है। गलन भी बढ़ गई है। पहाड़ों पर बर्फबारी शुरू हो गई है। फिरंगी अभी-अभी आग जला कर बैठे हैं। उन्हें सुर्ती की तलब लगी हुई है। थोड़ी देर पहले ही रोटी-चोखा खाए थे। खाना खाने के बाद जाड़ा ज्यादा लगने लगता है। इसी काम के लिए तो गन्ने की खूंटी रखते हैं। बस एक बार आग पकड़ लेता है, तो बहुत देर तक आग बनी रहती है। इस समय तो सब्जी की भरमार है। घर में गोभी भी थी और पालक भी। पर बीरजुआ की महतारी की तबियत थोडी ढीली थी। तो आज चोखा से ही काम चला लिए। वह तो खाते ही रजाई में घुस गई। नीचे कथरी के ऊपर दिल्ली से बीरजुआ का लाया कंबल बिछाने के बाद थोड़ी देर में पूरा बिस्तर गरमा जाता है। अगर रात में बुढ़िया का खर्रांटा न गूंजे तो पूरी रात आंख नहीं खुलेगी।
‘का हो फिरंगी भाई, आज तो जाड़ा कहर ढाहे पड़ा है। लगता है सरसों इस बार भी ले डूबेगा। दू साल से यही हो रहा है। ऐसा पाला पड़ता है कि लाही और सरसों दोनों मराता हो जाता है।’ पूरन हाथ मलते फिरंगी के बगल में बैठ गए।
‘का करोगे भाई, जैसी विधाता की मर्जी। हमारे पास तो ऐतना खेत ही नहीं है कि तेलहन बोएं। और बताओ।… खाना-पीना हो गया न?… लाओ चुनौटी दो, सुर्ती रगड़ें। बड़ी देर से तलब लगी है। सोचे थे शनीचरी जाएंगे तो सुर्ती ले आएंगे, लेकिन आलसिया गए।’
पूरन चुनौटी पकड़ाते हुए बोले, ‘हां भाई, खाना हो गया। रोटी ही पकना था। बड़का भइया के यहां सिधरी बनी थी। एक कटोरा भिजवाए थे। संतिया की महतारी की आजकल भौजाई से खूब पट रही है। जब कुछ बढ़िया बनता है तो हमारे यहां पहुंचा देती हैं। संतिया भी उनका छोट-मोट काम कर देती है। उनका रंजितवा दिल्ली कमाने के लिए मचल रहा है। हमहू बोल दिए, गनेस इस बार आएंगे तो भेज दीजिएगा।’
पूरन का लड़का गनेस और फिरंगी का लड़का बिरजू दिल्ली में साथ ही काम करते हैं। दोनों साथ ही रहते भी हैं। गांव के तीन-चार लड़के और भी उनके साथ गए थे। गांव में मजदूरों की बहुत कमी हो गई है। लड़कों के मुंह के ऊपर अभी ठीक से रेख भी नहीं आती, सीधे दिल्ली, पंजाब और मुंबई भागते हैं। जो गांव में बचे हैं, वह भी हर साल अपनी मजदूरी बढ़ा देते हैं। गांव की यह स्थिति हो गई है कि एक मजदूर के दरवाजे पर दो-तीन कास्तकार खड़े रहते हैं। लेकिन कितना दिन… रामधार पंजाब से एक पुराना कम्पाइन लाए थे। वह खेत में ही गेहूं काट देता था। गेहूं अलग और अनाज अलग। कटाई, ओसाई का झमेला ही खत्म…। ऐसे-ऐसे केमिकल आ गए हैं कि धान में डालते ही खर-पतवार को जला देता है। निराई का झंझट ही खतम।
जिन मजदूरों के लड़के कमाने शहर निकल गए हैं, उनके रहन-सहन में थोड़ा बदलाव आ गया है। उन्हें वक्त जरूरत कर्ज भी आसानी से मिल जाता है। बेटा या भाई कमा कर आएगा तो पैसा अदा कर देगा।
गनेस और बिरजू केमिकल फैक्ट्री में काम करते हैं। पेंट बनता है। ऐसी फैक्ट्रियों में पैसा तो अच्छा मिलता है, लेकिन दस वर्ष के अंदर शरीर तमाम गंभीर बीमारियों के गिरफ्त में आ जाता है। संरक्षा की कोई उचित व्यवस्था तो होती नहीं है। मालिक कम से कम लागत में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में इनके स्वास्थ से खिलवाड़ करने में जरा भी नहीं हिचकते हैं।
बिरजू को तो असर होने भी लगा है। उसके छाती में दर्द होने लगा है। उसे नौकरी करते आठ साल हो भी तो गए हैं। वह अब पुराने कर्मचारियों में गिना जाता है। वह बगल वाले गांव के रहमत अली के साथ आया था। रहमत तो तीन साल बाद ही दुबई चला गया। बिरजू इस फैक्ट्री से ही चिपका रह गया। ऐसा नहीं कि उसने निकलने का प्रयास नहीं किया। लेकिन इतनी पगार और कहां मिलनी थी। बिरजू दो साल और करेगा। ढाई लाख तक की व्यवस्था हो जाएगी। तब वह भी अपने बड़े भाई बनारसी की तरह संझौली में दुकान खोलेगा। बड़े भाई माई-बाबूजी से अलग रह रहे हैं। वहीं संझौली में ही रहते हैं। उनके दोनों बच्चे स्कूल जाते हैं। बनारसी भाई की तो किराने की दुकान है। वही बोले थे, ‘बिरजू, हम तो नहीं पढ़ पाए, लेकिन अपने बच्चा लोगों को पढ़ाऊंगा।’
बनारसी भाई जालंधर में किसी किराना व्यापारी के यहां काम करते थे। वहीं उन्होंने काम सीखा था। बाबूजी अठ्ठारह में ही उनका गौना करा दिए थे। भाभी पांच तक पढ़ी थी। वह तो और पढ़ना चाहती थी। लेकिन उनके गांव में बस प्राइमरी ही था। भाई से ज्यादा समझदार थी। भाई जब उन्हें जालंधर ले जाने लगे तो बोलीं, ‘हम उहां जाकर क्या करेंगे? एक ठो बोझा ही तो होंगे। आप हमेशा परदेस में ही तो नहीं रहेंगे। दू पइसा जोड़िए। फिर अपना छोटा-मोटा काम शुरू करेंगे। नइहर में मजूरी करते थे। सुसरा में भी करेंगे। आप हमें पइसा मत भेजिएगा। जमा करिएगा। हम अपना भर का तो कमा ही लेंगे।’
बनारसी भाई पांच साल जालंधर में टिके रहे। साल में एक बार गांव आते थे। वह भी दू-चार दिन के लिए। आज उसी मेहनत की फसल दोनों काट रहे हैं। माई जरूर नाराज रही थी, ‘सबके लरिका परदेस जाते हैं, त घर में दू पइसा आने लगता है। बनारसी भी भेजता था। लेकिन उसकी मेहरारू पता नहीं कान में का फूंकी है कि घर मनीआर्डर आना बंद हो गया।’
चौदह में बनारसी भाई की शादी हुई थी और पांच साल बाद गौना…। लेकिन उनके गौना के बाद ही बनारसी भाई की चाल बदल गई। उनकी बदली चाल को देखने बाद ही फिरंगी आज तक बिरजू का विवाह ही नहीं किए। सोलह साल की उम्र से बिरजू कमा रहा है। चौबीस का हो गया। इतनी उम्र में तो बनारसी भाई दो बच्चों के बाप हो गए थे।
फिरंगी आग खोदते हुए पूरन से बोले, ‘यार, बनारसी की तरह, बिरजुआ भी रंग बदल रहा है। अब जब भी रुपए के लिए बोलो, बहाना बनाना शुरू कर देता है। सोच रहे थे, छोटे-छोटे दो कमरे बनवा लेते। तब उसका विवाह करते। बहुरिया की डोली पक्के घर में उतारते। लेकिन उसके लक्षन देख कर नहीं लगता कि वह घर बनवाएगा। बियाह बाली उमर तो हो ही गई है। सही रिश्ता मिले तो अब बियाह कर ही दूंगा। बाकी ऊ जाने और उनका भाग्य…।’
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गनेस भी दो साल पहले, सत्रह की उम्र में आया था। अब उन्नीस का हो गया। वह पूरा पैसा घर भेजता है। उसे अभी दिहाड़ी ही मिलती है। तीन सौ पचास रुपए२ रोज। दस हजार रुपया महीना…। चार हजार में उसका काम चल जाता है। बाकी वह घर भेज देता है। बिरजू समझाया भी, ‘थोड़ा पैसा बचा लिया करो। घर तो बड़का खोभार है, जितना भी डालोगे कम ही पड़ेगा। यहां की जिनगी आसान है का…? गांव की मजूरी सात घंटा से ज्यादा की नहीं है। और यहां पक्का आठ घण्टा…। खूने चूसता है मालिक। हमारे झुंड में सात लोग थे। आज हम अकेले टिके हैं। किसना चौदह लोगों के झुंड में आया था। कुछ ताला बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते थे और कुछ स्टील के बर्तन वाले कारखाने में…। आज गांव में बैठा है। मुआजा अगोर रहा है। दाहिना हाथ प्रेस में दबा कि पूरा पंजा गायब हो गया। कमाने के काबिल नहीं रहा, तो महतारी-बाप अलगिया दिए। मेहरारू भी भाग गई। हम मजदूर हैं गनेस। हमें सारी जिनगी हाथ-पांव चलाना है। यह शरीर ही हमारा धन है। जब शरीर कमजोर होने लगेगा तब?’
गनेस को बिरजू ही लाए थे। पांच लड़कों के झुंड के साथ आया था। बाकी सड़क बनाने के काम वाले ठेकेदार के साथ जुड़ गए। गनेस पेंट फैक्ट्री में लग गया। यहां पैसा ज्यादा था और रिस्क भी। लेकिन अभी तो गनेस को पैसा चाहिए। बहन के शादी में खेत रेहन हो गया है। उसे छुड़ाना जरूरी है। सब कुछ ठीक रहा तो खेत जल्द ही वापस मिल जाएगा। उसे कमाता देख कर छोटका काका अपने बेटे तुलसी को भी पिछली बार साथ ले जाने पर जोर दे रहे थे। तुलसी तो अभी चौदह का भी नहीं हुआ है। गनेस ने समझाया था, ‘काका अभी दो-तीन साल और रुक जाइए। अभी तुलसी बहुत छोटा है। हमहीं सत्रह के उमर गए थे तो भी अठ्ठारह लिखवाए थे। चौदह को अठ्ठारह लिखना थोड़ा मुश्किल है। हां! बड़का काका से वादा किए थे, मालिक से बात कर लें तो अगली बार के झुंड में रंजीत भाई को दिल्ली ले चलेंगे।’
कहां धैर्य रख पाए छोटका काका। मुंबई वाले झुंड के साथ तुलसिया को भेज दिए। किसी होटल में बर्तन धोता था। छह महीने बाद ही वापस आया था। माई बता रही थी, ‘बस हाड़ भर रह गया था, उसकी देह में। दस बजे दिन से बारह बजे रात तक खटाते थे सब। नींद ही नहीं पूरी हो पाती थी। छोटकी काकी रो रही थी। लड़का जिंदा मिल गया, उहे बड़ी बात है।’
गनेस और बिरजू कारखाने में ही रहते हैं। दो कमरे में बीस लोग। खाना सामूहिक बनता है। ‘खोराकी’ का पंद्रह सौ रुपया महीना लगता है। चेहरे बदलते रहते हैं। कोई गांव जाता है, तो वापस ही नहीं आता है। कोई यहां छोड़ कर, दूसरी जगह काम पकड़ लेता है। केमिकल में काम करने का मतलब अब लोग समझने लगे हैं। कुछ का शरीर दो-तीन साल में ही जवाब देने लगता है। सबसे ज्यादा लोगों के फेफड़े में संक्रमण होता है और फिर थोड़े परिश्रम में ही सांस फूलने लगती है। ऐसे भी लोग हैं, जो बीस-बीस साल से डटे पड़े हैं। बिरजू भी तो अभी तक जमा ही है। लेकिन अब उसकी भी छाती में कभी-कभी चुभन महसूस होती है। लेकिन कंपनी के डॉक्टर की दवा से ही आराम मिल जाता है। डॉक्टर तो कहता है कि गैस का दर्द है।
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पूरन और फिरंगी बहुत देर से आग तापते रहे हैं। फिरंगी अंदर से बहुत दुखी हैं। बड़ा लड़का जबसे संझौली में दुकान खोला है, वहीं का होकर रह गया। बिरजू दिल्ली में ही पड़ा रहता है। घरवाली का बड़का आॅपरेशन हो चुका था। बच्चेदानी में घाव हो गया था। बच्चेदानी निकाल दी गई थी। मेहनत मजूरी लायक शरीर नहीं था। छोटा-मोटा काम ही कर सकती थी। जोगिंदर बाबू के यहां बर्तन-झाड़ू का काम करती है। तबियत तो बिरजू के पैदा होने के बाद से ही ठीक नहीं रहती थी। लेकिन चार-पांच साल काट ले गई। फिर खून गिरने लगा था और तब पता चला था असली रोग के बारे में।… फिरंगी के पास कहां था पैसा। उस समय जोगिंदर बाबू सामने आए थे मदद के लिए। ठीक हो गई बिरजू की महतारी। तभी से वह जोगिंदर बाबू के परिवार के यहां सेवा में लगी है। फिरंगी अब पचास पार कर चुके। मेहनती शरीर है। काम से कभी नहीं घबराते हैं।
पूरन के पास बहुत लेथन है। चार लड़कियां थीं। दो का ब्याह कर चुके थे। उसके बाद गनेस था, जो इस समय दिल्ली में कमा रहा था। पति-पत्नी और एक बेटी मजदूरी करते हैं। दूसरी वाली अभी दस साल की है। वह बकरी चराती है। पूरन को लगता है, अगर गनेस ऐसे ही पैसा भेजता रहा, तो वह जल्द ही तीसरी बेटी का विवाह कर देंगे। पैंतालिस के तो वह भी हो गए हैं। लेकिन जित्तन से बात हुई है। वह अबकी बार उन्हें भी ले जाएगा जालंधर। कपड़ा बनाने वाली मिल में लगवा देगा। दो साल भी रुक गए तो खोराकी के बाद पच्चीस-तीस हजार कमा ही लेंगे। पूरन यह बात जब फिरंगी को बताए तो वह चौंक गए। फिर कुछ सोचते हुए धीरे से बोले, ‘जाओ भाई, तुमहू जाओ। हमही लोग गांव में गिद्ध जैसे बैठे रहेंग।े… हमारे जांगर में कोई कमी थोड़े ही आई है। किसी जवान आदमी से ज्यादा मेहनत कर सकते हैं। लेकिन सारा जिनगी तो गांव में ही काट दिए। अब इस उमर में परदेस का जाना। मजूरी ही तो करनी है। दू पैसा कम ही सही।’
रात काफी हो गई थी। पूरन सुर्ती ठोक कर फिरंगी की तरफ बढ़ाए, ‘अब चलते हैं भाई। नेउर बाबा का कल गन्ना छीलने जाना है।’
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पूरन लुधियाना गए। बारह लोगों का झुंड था। जित्तन के कंपनी में तीन लोग की जरूरत थी। बाकी नौ लोग दस-पंद्रह दिन तक भटकने के बाद नौकरी पा ही गए। पूरन को एक लोडर पर काम मिला था। पैसा ज्यादा नहीं था, लेकिन परदेस में खाली नहीं बैठा जा सकता था। पूरन लोडर ड्राइवर के साथ रहने लगे। सोचे तो यही थे कि दो साल बाद ही घर जाएंगे, लेकिन बचत ज्यादा नहीं थी और ड्यूटी भी लंबी थी। दिन भर गोदाम से माल निकाल कर दुकानों में पहुंचाना होता था। गत्ते के डिब्बों में बिस्कुट और पिसे मसाले के पैकेट भरे होते।… बीस महीने में बाद वापस आए तो दस हजार ही पास में था।
गनेस और बिरजू भी गांव जा रहे थे। बिरजू को अब वापस नहीं आना था। उसने बड़े भाई से बात कर ली थी। बनारसी भाई बिसातखाने की दूकान खोलने की सलाह दे रहे थे, शृंगार का सामान… सब आइटम रखो। बढ़िया चलेगा।’
गनेस को वापस फिर दिल्ली आना था। बिरजू की जगह उसके साथ बड़का काका का लड़का रंजित होगा। पिता जालंधर से आने के बाद से बीमार थे। मियादी हो गया था। बुखार टूट ही नहीं रहा।
बिरजू और गनेस गोरखपुर स्टेशन पर उतरे और प्लेटफार्म पर खड़े होकर शरीर सीधा करने लगे। जनरल डिब्बे में बैठना कहां होता है। सिकुड़ कर, एक-दूसरे पर लद कर यात्रा करनी पड़ती है। संडास तक में आदमी बैठे रहते हैं।
बिरजू देख रहा था, स्टेशन पर दिल्ली-मुंबई जाने वाले मजदूरों का झुंड बैठा हुआ था। ट्रेन आने में अभी देर थी, लेकिन झुंड लाइन में बदलने लगा था। कुछ घबराए चेहरे भी थे, जो शायद पहली बार गांव से निकले थे। बीच-बीच में उनके चेहरे पर एक मासूम उत्सुकता तैर जाती। बिरजू को लगता कि यह सब बनारसी, बिरजू, गनेस, रंजीत, तुलसी किसना… और जित्तन हैं। जो शहर में एक सपने के साथ जा रहे हैं…। बिरजू बुदबुदाया, ‘हे! ईश्वर। इनकी यात्रा मंगलमय हो।…’

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