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सत्ता बनाम सिनेमा

सत्ता की बात कहते और सत्ता के खिलाफ रहते हुए राजनीतिक फिल्मों का भारतीय हिंदी सिनेमा पर खासा असर रहा है। सत्ता और समय में बदलाव के साथ फिल्में भी बदल जाती हैं। पिछले एक दशक से देखा गया है कि राजनीतिक फिल्में राजनीतिक प्रचार का औजार बन रही हैं। मुख्यधारा में राजनीति को समझाने और उघाड़ने की कोशिश करती फिल्मों का दौर खत्म होकर राजनीति करने वाली फिल्मों का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक फिल्में वैसे विज्ञापन की तरह हो गई हैं, जिसकी बुनियाद में सिनेमाई विधा है। जिस तरह से पेड न्यूज का जमीनी खबरों से कोई रिश्ता नहीं होता, उसी तरह इन प्रचारात्मक फिल्मों का सिनेमा से रिश्ता खत्म होता जा रहा हैं। सत्ता और सिनेमा के इस संबंध को बता रही हैं मृणाल वल्लरी

Author March 24, 2019 1:16 AM
राजनीति की दुनिया को साधने या उसके विद्रूप को दिखाने के लिए कभी सीधी और स्पष्ट भाषा या कहानी का सहारा लिया गया तो कभी तंज के जरिए तल्ख हकीकतों को सामने रखा गया।

मृणाल वल्लरी

सिस्टम को बदलना है तो सिस्टम में घुसना होगा… जिंदगी जीने के दो ही तरीके होते हैं! एक, जो हो रहा है होने दो, बर्दाश्त करते जाओ या फिर दो, जिम्मेदारी उठाओ, उसे बदलने की’। 2006 में राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का यह संवाद सिनेमा हॉल में गूंजा था तो सिनेमा हॉल में तालियां गूंजी थीं। यह वह साहसिक राजनीतिक फिल्म थी जिसमें मिग-21 की खरीद के जरिए रक्षा सौदों पर सवाल उठाए गए थे।

सरकारी एजंसियों ने जब युवाओं की जुबान बंद कर दी तो वे आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर लेते हैं। सत्ता के खिलाफ रेडियो स्टेशन पर कब्जे का प्रतीक दिखा कर राकेश ओमप्रकाश मेहरा आगे आने वाले दो दशकों को अपने कैमरे के फ्रेम में समेट लेते हैं। रेडियो यानी कि सामुदायिक संचार। सामुदायिक संचार पर जिसका कब्जा होगा, बात उसी की सुनी जाएगी। 2006 में जब ‘हैशटैग’ वाले सोशल मीडिया का जाल नहीं फैला था तो मेहरा ने रेडियो को ही उस सशक्त माध्यम के रूप में दिखाया, जिसके जरिए इक्कीसवीं सदी के ‘जनरल डायर’ का सामना किया जा सकता है।
‘रंग दे बसंती’ की पटकथा के पहले राकेश ओमप्रकाश मेहरा भगत सिंह पर फिल्म बनाना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने कॉलेज के युवाओं के बीच सर्वेक्षण भी करवाया। लेकिन अपने सर्वेक्षण के बाद उन्हें यह जान कर हताशा हुई कि युवाओं को भगत सिंह के बारे में न तो ज्यादा पता है, न उनके बारे में ज्यादा पता करने का उत्साह। तो फिर आज के युवाओं को भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की विरासत से कैसे जोड़ा जाए?
मेहरा यह समझ चुके थे कि आज के युवाओं के साथ आज की भाषा में ही बात की जा सकती है। फिल्म की शुरुआत घड़ी की उस सुई से होती है जब भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाया गया था, लेकिन अंत होता है दिल्लीके इंडिया गेट पर… इक्कीसवीं सदी के नागरिक समाज के साथ। इक्कीसवीं सदी के चार युवाओं के जरिए मेहरा कहते हैं कि आज के युवा समकालीन मंच पर ही संवाद कर सकते हैं और ऐसा मंच मिलते ही वे अपने समय के भगत सिंह बन जाते हैं। आमिर खान ने जिस ‘डीजे’ का किरदार निभाया है, वह पलायनवादी है। लेकिन व्यवस्था को समझने की कोशिश करने के साथ ही वह व्यवस्था के खिलाफ मजबूत दीवार बन जाता है। फिल्म स्वंतत्रता संग्राम के फ्लैश बैक में चलती है। 2006 की इस फिल्म में दिल्ली में जब पुलिस की ओर से सवाल उठाते युवाओं पर गोली चलाई जाती है तो फ्लैश बैक में जलियांवाला बाग में लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश देता जनरल डायर भी दिखाई देता है।

सवाल है कि ‘रंग दे बसंती’ का मौजूदा संदर्भ क्या हो सकता है!
दरअसल, विंग कमांडर अभिनंदन जब मिग-21 विमान से दुश्मन को टक्कर देने गए और पाकिस्तान की गिरफ्त में आकर भी सकुशल भारत लौट आए तो जिन लोगों ने ‘रंग दे बसंती’ फिल्म देखी होगी, उन्हें उसकी याद जरूर आई होगी, जिसमें मिग विमानों को भारतीय लड़ाकू पायलटों का ताबूत बताया गया था। उस समय भी सुरक्षा एजंसियों ने इस फिल्म पर सवाल उठाए थे।
लेकिन अभिनंदन की सुरक्षित वापसी के बाद मिग हादसों के उन आंकड़ों को भी याद किया गया, जिसके कारण हमारे कई जवान शहीद हो चुके हैं। सवाल पूछे गए कि क्या आज के माहौल में ‘रंग दे बसंती’ जैसी फिल्म बन सकती है?
‘रंग दे बसंती’ के पहले भी ऐसी फिल्में बनी हैं, जिसने सत्ता को तड़पा कर रख दिया था। सीधे-सीधे नहीं तो ‘रोटी, कपड़ा और मकान’, ‘मजदूर’, ‘लीडर’ जैसी फिल्में सत्ता से सवाल करती रही हैं। 1984 में आई फिल्म ‘आज का एमलए रामअवतार’ में नायक कहता है कि ‘वे लोग मुझे तो मार सकते हैं लेकिन मेरी आवाज को नहीं कुचल सकते हैं…।’ दसारी नारायण राव निर्देशित इस फिल्म में मुख्य भूमिका राजेश खन्ना ने निभाई थी। इस फिल्म में भ्रष्टाचार से तंग जनता मंत्री के खिलाफ एक नाई को खड़ा कर देती है। फिल्म टिकट खिड़की पर तो बहुत नहीं चली थी, लेकिन सियासत और सिनेमा पर बहस जरूर हुई थी।
‘किस्सा कुर्सी का’ रहा हो या ‘आंधी’, सिनेमाकार सियासत पर हाथ आजमाते रहे हैं। अनिल कपूर अभिनीत ‘नायक’ में एक आम आदमी के एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बन कर सत्ता और व्यवस्था को बदलने की कहानी है। वह सत्ता की मनमानी और आम लोगों के बीच हकमारी के खिलाफ असंतोष के अभिव्यक्त होने की कहानी थी, लेकिन एक तरह से वह भी जनता का राजनीतिक प्रशिक्षण थी। यह अलग बात है कि इस तरह के फिल्मी हल जमीनी हकीकत से दूर होते हैं।

राजनीति की दुनिया
राजनीति की दुनिया को साधने या उसके विद्रूप को दिखाने के लिए कभी सीधी और स्पष्ट भाषा या कहानी का सहारा लिया गया तो कभी तंज के जरिए तल्ख हकीकतों को सामने रखा गया। इस लिहाज से देखें तो राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था पर तंज करने में अनुषा रिजवी व महमूद फारुकी की ‘पीपली लाइव’ के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। बाजार से संचालित हो रहे मीडिया के गिरते स्तर को यह फिल्म जिस ऊंचाई पर जाकर देखती है, वह भारतीय सिनेमा में सहेज कर रखे जाने लायक है। इसके दृश्य आज के मीडियाई बर्ताव के इतने करीब हैं कि कई बार यह फिल्म डॉक्यूमेंटरी की तरह लगती है। पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों में यह फिल्म विद्यार्थियों को इसलिए दिखाई जाती है कि मीडिया जैसे जिम्मेदारी के मैदान में पांव रखने के बाद आपको क्या नहीं करना चाहिए।
इससे इतर श्याम बेनेगल की ‘वेलडन अब्बा’ पूरे सत्तर साल के भ्रष्टाचार को हास्य और व्यंग्य के साथ ढाई घंटे में समेट लेती है। बावड़ी की चोरी के जरिए मनरेगा जैसी सरकारी झंडाबरदार योजनाओं के भ्रष्टाचारियों के समर्पित हो जाने की महागाथा है ‘वेलडन अब्बा’। ‘फोटोशॉप वाले फेक न्यूज’ की खतरे की घंटी भी श्याम बेनेगल ने इस फिल्म में बजा दी थी। हालांकि, यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि किसी गंभीर समस्या को लक्षित करने के लिए व्यंग्य का सहारा कितना उपयोगी है। हास्य या व्यंग्य की चाशनी में लिपटे तीरों से सत्ता को बहुत परेशानी नहीं होती है।

बदलता रहा है सत्ता और सिनेमा का संबंध

मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती’ गाते हुए मनोज कुमार ‘उपकार’ में नए भारत को दिखाते हैं। यह वह समय था जब लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा लगाया था। यह फिल्म लाल बहादुर शास्त्री और कांग्रेस की नीतियों को घर-घर पहुंचाने के लिए बनाई गई थी। लाल बहादुर शास्त्री जानते थे कि मनोज कुमार जैसा लोकप्रिय अभिनेता ही सरकार के नारे को घर-घर पहुंचा सकता है। ‘हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के…’, ‘छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी’, ‘हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए’ जैसे गीतों से लैस फिल्में नए भारत के प्रचार के लिए सत्ता के साथ करार कर रही थीं। शायद सच यह है कि नेहरू का दौर बीतने और इंदिरा गांधी के आपातकाल का असर था कि सत्ता को आईना दिखाने वाली फिल्मों में पर्दों पर भी बेचैन करने वाले सवाल पूछे जाने लगे थे। ‘आंधी’ और ‘किस्सा कुर्सी का’ के जरिए इंदिरा गांधी की राजनीति के विवादास्पद पहलुओं पर कैमरा रोल हो रहा था।
बीसवीं सदी बीतने के साथ इक्कीसवीं सदी का सिनेमा सत्ता की मनोहारी छवियों से इतर अपने-अपने हिस्से का पाठ रच रहा था। ऐसी फिल्मों का एक सिलसिला है, जिसमें कई बार राजनीति की दुनिया पर्दे पर लोकप्रियता के कारोबार का जरिया बनी। लेकिन फीचर फिल्मों की कहानियां जिस तरह काल्पनिक तत्त्व के साथ परोसी जाती रही थीं, उसमें वह विश्वसनीयता जमीन नहीं पकड़ पाती थी, जो कुछ निर्देशकों के दावों को मानें तो ‘काफी शोध करके’ बनाए गए थे। ‘गैंग्स आॅफ वासेपुर’ में सत्ता और माफिया के संबंध को सिहराने वाली स्याह छवियों के साथ दर्शाया है। इसमें ‘लोकनायक ने जलाया ये कैसा दिया/ कोयला के भाव बिकले पिया’ के जरिए सत्ता और माफिया की जंग में फंसी झारखंड की पूरी जनता का दर्द उभार दिया गया है। फिल्म में कहानी की प्रस्तुति की शैली ऐसी रही कि दर्शकों के लिए उसे किसी सच की तरह स्वीकार करना भी आसान रहा।
अब तक सिनेमा में अगर राजनीति तो उसका स्वर आमतौर पर सत्ता के सामने सवाल रखने के तौर पर ही दर्ज किया जाता रहा था। लेकिन सिनेमा सत्ता को अपनी-अपनी नजर से देखते रहा है। ‘काई पो चे’ और ‘फिराक’ गुजरात दंगों पर बनी दो अलग नजरिए की फिल्म हैं। ये दोनों फिल्में राजनीतिक बिसात पर तैयार समाज के सच को दिखाने के साथ-साथ अपने-अपने हिस्से की राजनीति करती भी दिखाई देती हैं। मगर बड़ा पर्दे पर राजनीतिक छौंक से लैस फिल्में अब तक मनोरंजन की खुराक पूरा करने के बावजूद सत्ता के बरक्स दिखती थीं, अब वहां चेहरा बदल रहा है। ‘सुई धागा’ से लेकर ‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’ राजग सरकार की मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत जैसी दूसरी झंडाबरदार योजनाओं या कार्यक्रमों का प्रचार भर बन कर रह गई। फिल्म के नाम पर छूट लेकर ‘परमाणु’ में भारत की आण्विक शक्ति एक खास कालखंड की सत्ता का महिमामंडन करती है। तथ्य के रूप में किसी घटना के आधार पर बनी फिल्म में भी यह छूट कैसे मिल गई कि भारत जैसे देश के परमाणु कार्यक्रम में होमी जहांगीर भाभा से लेकर इंदिरा गांधी की भूमिका ही गायब हो।
दरअसल, एक लोकप्रिय माध्यम के रूप में सिनेमा का जैसा विस्तार हुआ है, लोगों तक इसकी पहुंच बढ़ी है, राजनीति की दुनिया और खासतौर पर सत्ता ने इसका औजार के रूप में इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है। यह बेवजह नहीं है कि अब सिनेमा की भाषा भी बदली है।
2014 में मौजूदा सत्ता के आने के पहले के राजनीतिक मुद्दों और सरकारी रुख या नीतियों को कठघरे में खड़ा करने वाली फिल्में बड़े बजट की तहत बनाई गई हैं और उसकी धूम ‘देशभक्ति’ फिल्म के तौर पर मची। मसलन, ‘बेबी’ में भारतीय जासूसों को विदेशों में पकड़े जाने के बाद जहां पहले यानी 2014 के पहले की सरकार ने कैसे मरने के छोड़ दिया और कैसे उन पर देशद्रोही होने का ठप्पा लग गया और बाद की सरकार ने कैसे उन सबको देशभक्ति के तौर पर सम्मानित किया। देशभक्ति की भावना से लैस या इस भावना में आक्रामक उभार वाली फिल्मों की बाढ़-सी आई है तो इसकी राजनीति समझना कोई मुश्किल काम नहीं है।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित और कंगना रनौत द्वारा निर्देशित व अभिनीत ‘मणिकर्णिका’ में इतिहास के तथ्यों से छेड़छाड़ के आरोप लगे हैं। वहीं 2014 में चुनावों के पहले एक किताब आई- ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’। पांच साल बाद 2019 में चुनावों के पहले इस किताब पर फिल्म बनती है। 2014 में आई किताब के आवरण पृष्ठ पर मनमोहन सिंह की तस्वीर थी। जब 2019 में इस किताब का नया संस्करण लाया गया तो उसके आवरण पर अनुपम खेर अभिनीत इसी फिल्म के चरित्र मनमोहन सिंह की तस्वीर थी, यानी अनुपम खेर की तस्वीर।
गौरतलब है कि संजय बारू मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार थे और मनमोहन सिंह के भाषण भी वे ही लिखा करते थे। यानी इस फिल्म का मकसद अपने दर्शकों के बीच यही समझ थोपना है कि संजय बारु, मनमोहन सिंह से ज्यादा होशियार थे। इस फिल्म को भाजपा के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से भी प्रचारित किया गया था। इसी के साथ राजग सरकार के लक्षित सैन्य हमले पर बनी फिल्म ‘उड़ी’ भी ‘सरकार के शौर्य’ का प्रचार बनी। केंद्रीय मंत्री से लेकर भाजपा नेताओं ने इसके प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी।
जाहिर है, बॉलीवुड की फिल्में पहले जहां सत्ता से सवाल करती थीं, सत्ता के बरक्स जनता के हक में खड़ी होती थीं, आज सत्ता के हक और हित में उसके लिए प्रचार का जरिया बनती नजर आ रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि कला का यह माध्यम सत्ता की राजनीति के लिए विज्ञापन की भूमिका में आने के बाद क्या अपनी अहमियत को पहले जैसा बनाए रख सकेगा!

12 अप्रैल को प्रदर्शित होगी ‘पीएम नरेंद्र मोदी’

‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के बाद सिनेमा घरों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर आधारित फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ भी 12 अप्रैल को प्रदर्शन होने के लिए तैयार है। ओमुंग कुमार द्वारा निर्देशित इस फिल्म में विवेक ओबेराय मुख्य भूमिका में हैं। इसके निर्माता संदीप सिंह ने एक बयान में कहा, ‘यह फिल्म मेरे हृदय के बेहद नजदीक है। पहले पोस्टर को काफी प्यार मिला था। अब मुझे दूसरा पोस्टर जारी होने का बेसब्री से इंतजार है’। फिल्म में अमित शाह की भूमिका अभिनेता मनोज जोशी निभा रहे हैं। विवेक ओबेराय नरेंद्र मोदी की भूमिका निभा रहे हैं।

रामायण और महाभारत की जमीन
‘रामायण’ और ‘महाभारत’ भारतीय दृश्य साधनों पर सबसे ज्यादा लोकप्रिय कार्यक्रम रहे हैं। शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मुसलिम तबका नाराज हो गया था। एक धर्मनिरपेक्ष अदालत के धर्मनिरपेक्ष फैसले को तुष्टीकरण की भेंट चढ़ा दिया गया, जिससे हिंदू तबका नाराज हो गया था। कांग्रेस को हिंदुओं के बीच भी अपनी जमीन बनानी थी और इसी समय टेलीविजन सेट पर ‘रामायण’ आने लगता है। यह धार्मिक धारावाहिक देश के ज्यादातर लोगों की आस्था को टेलीविजन सेट से जोड़ता है। इसके बाद ‘महाभारत’ की लोकप्रियता चरम पर पहुंचती है। इन दो धारावाहिकों के किरदारों का इस्तेमाल पहले कांग्रेस ने किया। लेकिन इसके आधार पर जो धार्मिक जमीन बनी, वह आरएसएस के लिए ज्यादा मुफीद थी। राजग सरकार के आने के बाद फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) का पहला अध्यक्ष महाभारत में ‘युधिष्ठिर’ की भूमिका निभाने वाले गजेंद्र चौहान को बनाया गया था, जिनकी क्षमता पर गहरे विवाद पैदा हुए थे।

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