jansatta ravivari Story: When Embarrassed Jackie - कहानी: जब शर्मिंदा हुआ जैकी - Jansatta
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कहानी: जब शर्मिंदा हुआ जैकी

जैकी ने अपनी आपबीती बता दी। तब जेसी भालू भड़क उठा- ‘तुम लोगों को अक्ल कब आएगी। जरा-जरा सी बात पर शर्त लगाया करते हो। अब रुको जरा’- कहते हुए जेसी भालू दुकान के भीतर गया और फौरन ही एक शीशी ले आया।

Author May 13, 2018 5:08 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

विप्रम

पिछले दिनों की बात है। आसमान में बादल छाए हुए थे। ठंडी हवा बह रही थी। मौसम सुहाना था। तभी जंगल में चिंकू खरगोट ने टीटी गिलहरी से कहा- चलो टीटी, नदी पार रामबाग चलते हैं। वहां जामुन खाएंगे। आम खाएंगे। मौज मनाएंगे। हां भइया, आजकल आम और जामुन की बहार है। हरियाला मौसम है। मिट्ठू तोता भी बता रहा था। वहां मोटे-मोटे काले जामुन लगे हैं। पेड़ों पर मीठे-मीठे आम लटक रहे हैं- फुदकते हुए टीटी गिलहरी बोली थी। दोनों आगे बढ़ते, तभी जैकी डॉगी आ गया। उसे देख कर चिंकू खरगोश ने मजाक में अपने कान हिलाए। जैकी डॉगी ने जब यह देखा तो इठला पड़ा- ऐसे तो मैं भी हिला सकता हू। चाहे जितनी देर तक अपने कान खड़े रख सकता हू। जैकी भइया, तुम मेरा क्या मुकाबला करोगे। मेरे कान तो वैसे भी सदा खड़े रहते हैं- मुस्कराते हुए चिंकू खरगोश ने कहा था। सुन कर जैकी तिलमिला कर रह गया। फिर कुछ सोचते हुए बोला- चीकू, तू अपने को इतना होशियार मत समझ। देख, मेरे कान भी खड़े हो गए हैं। यह तो ठीक है। पर भइया, तुमने मुझे चीकू क्यों कहा। मुझे तो लग रहा है कि तुम मेरे खड़े कानों से जल रहे हो। तभी तो मुझको चीकू पुकार रहे हो। चिंकू खरगोश ने टीटी गिलहरी की ओर देखते हुए कहा। इस पर टीटी जोर से खिलखिला कर हंस पड़ी। जैकी तमतमा उठा। पर उसने अपने गुस्से को प्रकट नहीं होने दिया। लंबी सांस भरते हुए वह बोला- ‘ठीक है चिंकू, शर्त लगाते हैं। मैं अपने कान खड़े किए हुए ही जेसी भालू की दुकान तक जाऊंगा और ऐसे ही खड़े कानों से यहां लौट आऊंगा।’ ‘अगर यह तुम कर पाए तो मैं तुम्हें चार आम और ढेर सारी जामुन बदले में दूंगा। मगर तुम्हारे साथ गवाह के तौर पर टीटी जाएगी। ठीक है, जैकी भइया!’ तभी वहां खींखूं बंदर भी आ गया। चिंकू खरगोश ने उसे सारी बात बता दी। तब खींखूं बंदर खिकियाया- ‘जैकी भइया! अब देर क्यों करते हो? हो जाओ शुरू। पर याद रखना जैकी भइया, अगर तुम शर्त हार गए तो तुम्हें दुगुने आम और जामुन देने होंगे। है मंजूर?’ ‘हां!’ जैकी डॉगी ने एक नजर तीनों पर डाली। फिर चल पड़ा। पीछे-पीछे टीटी फुदकती हुई चलने लगी। कुछ कदम चलने पर जैकी इठलाते हुए चलने लगा। उसके कान सीधे खड़े थे। पीछे से टीटी गिलहरी ने टोका- ‘भइया, ऐसे चलोगे तो तुम्हारे कान कहीं बैठ न जाएं।’ ‘ये मेरे कान हैं! मैं इन्हें बैठने दूंगा तभी तो बैठेंगे।’ कहते हुए जैकी अब मटकने लगा था। उसे देख टीटी गिलहरी हंसने लगी। तभी न जाने कहां से एक मक्खी जैकी के दाहिने कान में घुस गई। उसके कान में भिन भिन की आवाज होने लगी। डर के मारे उसने अपनी गर्दन हिलाई। एक-दो झटके भी दिए। फिर भी मक्खी बाहर नहीं निकली तो उसने अपनी गर्दन जोर-जोर से हिलानी शुरू कर दी। यह देख टीटी हंसती हुई बोली- ‘भइया, ए खेल-तमाशा क्यों कर रहे हो?’

उधर जैकी परेशान था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे? उसे डर लगने लगा था- कहीं कान में घुसी मक्खी उसके कान का पर्दा न फाड़ दे। फिर तो वह बहरा हो जाएगा। कुछ सुन न सकेगा। किसी का कहा समझ नहीं पाएगा। बड़ी मुश्किल हो जाएगी। इन विचारों से वह जमीन पर लोट-पोट होने लगा। दौड़-दौड़ कर उसने दो-तीन चक्कर भी लगाए। फिर भागते हुए जेसी भालू की दुकान पर पहुंच गया। उसे देख जेसी भालू खों-खों करता पूछने लगा- ‘क्या हुआ जैकी, जो तू इतनी उछल-कूद कर रहा है? अरे! तू तो मिट्ठी में भी सना हुआ है?’
‘बड़े भइया, मेरे कान में मक्खी घुस गई है।’ हड़बड़ाते हुए जैकी ने बताया। उसे जेसी भालू ने डांटा- ‘अबे यार, एक मक्खी ही तो घुसी है। उससे डर रहा है? लेकिन यह मक्खी तेरे कान में घुसी कैसे?’
जैकी ने अपनी आपबीती बता दी। तब जेसी भालू भड़क उठा- ‘तुम लोगों को अक्ल कब आएगी। जरा-जरा सी बात पर शर्त लगाया करते हो। अब रुको जरा’- कहते हुए जेसी भालू दुकान के भीतर गया और फौरन ही एक शीशी ले आया। उसका ढक्कन खोल कर जैकी के दाहिने कान में कुछ उंड़ेल दिया। फिर उसका मुंह बार्इं ओर कर दिया। कुछ देर बाद जेसी ने पूछा- ‘क्यों, भिनभिनाहट अब भी हो रही है?’

नहीं बड़े भइया! मुंह चलाते हुए जैकी डॉगी ने बताया था। इस पर जेसी भालू ने उसका दाहिना कान जमीन की ओर झुका दिया। फिर मुस्कराते हुए बोला- ‘बड़ा तीस मारखां समझता है अपने आपको। देख, तेरे कान में सरसों का तेल डाला है मैंने। तेल के साथ ही मक्खी बाहर आ जाएगी। देखना, शायद अब तो वह निकल भी गई होगी।’ ‘हां बड़े भइया, अब नहीं है’- हाथ जोड़ते हुए जैकी ने धन्यवाद दिया। तब जेसी भालू ने उसे समझाया- ‘मेरी एक बात गांठ बांध लो, जैकी! अब कभी किसी से शर्त न लगाना। शर्तों पर कोई काम नहीं किए जाते। बल्कि इससे आपस में शत्रुता और हो जाती है।’जैकी अब सचमुच अपनी जिद पर शर्मिंदा था। उसने जाते-जाते कहा- ‘बड़े भइया, आपने मेरी आंखें खोल दीं। मुझे अब समझ आ गई है। मैं अपनी गलती पर अफसोस मनाने चिंकू खरगोश के पास जा रहा हू। उसे भी समझाऊंगा कि शर्त लगाना अच्छी बात नहीं। चल टीटी, अब लौट चलें।’

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