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बाबा, गीता और प्रवचन

विनोबा भावे को गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना गया है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान 18 जनवरी से 14 जुलाई, 1932 तक विनोबा धुले जेल में बंद थे। इन दौरान उनके ‘गीता प्रवचन’ को कैदियों के साथ जेल के अधिकारी भी मनोयोग से सुना करते थे। उन्होंने मराठी में व्याख्यान दिए, जो बाद में हिंदी समेत कई भाषाओं में पुस्तक रूप में आया।

महात्मा गांधी 1925 में ‘यंग इंडिया’ में कहते हैं कि जब निराशा मेरे सामने आ खड़ी होती है और जब मुझे कहीं से कोई रोशनी नहीं दिखाई पड़ती, तो मैं गीता की शरण लेता हूं।

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गीता का मान इतना ज्यादा है कि इसे प्राच्य दर्शन का आधार माना गया। इसको लेकर व्याख्या और प्रवचन का सिलसिला आज भी जारी है। सृष्टि, जीवन, कर्म और काल के बारे में गीता का चिंतन सार्वदेशिक और सार्वकालिक महत्व का है। गीता में कुल अठारह अध्याय हैं, जिनमें छह कर्मयोग, छह ज्ञानयोग और आखिर के छह अध्याय भक्तियोग पर आधारित हैं। यह एक ऐसा ग्रंथ है जिस पर दुनियाभर की विभिन्न भाषाओं में संभवत: सबसे ज्यादा भाष्य, टीका, व्याख्या, टिप्पणी, निबंध और शोधग्रंथ लिखे गए हैं। गीता का सबसे पहला भाष्य आदिगुरु शंकराचार्य ने लिखा, जिसे ‘शांकर भाष्य’ कहा जाता है। संत ज्ञानेश्वर, तिलक, परमहंस योगानंद, महात्मा गांधी, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, महर्षि अरविंद, एनी बेसेंट, विनोबा भावे और ओशो आदि ने भी गीता पर गहरा चिंतन किया है। सबने इसे देखने-समझने की नई दृष्टि विकसित करने की कोशिश की है।

महात्मा गांधी 1925 में ‘यंग इंडिया’ में कहते हैं कि जब निराशा मेरे सामने आ खड़ी होती है और जब मुझे कहीं से कोई रोशनी नहीं दिखाई पड़ती, तो मैं गीता की शरण लेता हूं। वे कहते हैं कि निराशा के इन क्षणों में उन्हें गीता का कोई न कोई श्लोक ऐसा दिखाई पड़ जाता कि विषम हालात में भी वे मुस्कराने लगते हैं। विनोबा भावे को गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना गया है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान 18 जनवरी से 14 जुलाई, 1932 तक विनोबा धुले जेल में बंद थे। इन दौरान उनके ‘गीता प्रवचन’ को कैदियों के साथ जेल के अधिकारी भी मनोयोग से सुना करते थे। उन्होंने मराठी में व्याख्यान दिए, जो बाद में हिंदी समेत कई भाषाओं में पुस्तक रूप में आया।

विनोबा कहते हैं कि मेरा कोई दर्शन नहीं है, मेरे अंदर दर्शन और बोध की तलाश करने वाले निराश होंगे क्योंकि उन्हें मुझमें सिर्फ आकृति दिखेगी, वह भी बाह्य। इसी बात को कहते हुए वे आगे कहते हैं कि ‘गीता प्रवचन’ ही ‘बाबा का दर्शन’ है। गौरतलब है कि जैसे गांधी का संबोधन ‘महात्मा’ बना, उसी तरह लोग विनोबा को ‘बाबा’ कहते थे। यह संबोधन विनोबा का भी प्रिय रहा। इसलिए अनेक मौकों पर खुद के लिए उन्होंने बाबा शब्द का प्रयोग किया है। वे कहते हैं, ‘गीता प्रवचन मेरी जीवन की गाथा है और वही मेरा संदेश है।’ गीता पर अपनी बात कहते हुए विनोबा कई प्रसंगों में काफी रोचक बात और बोधगम्य बात कहते हैं। वे कहते हैं कि आसक्तिअच्छी चीज की भी नहीं होनी चाहिए। आसक्ति हमेशा ही अनर्थ लाती है। जैसे क्षय के कीटाणु यदि भूल से भी फेफड़ों में चले जाएं तो सारा जीवन भीतर से खा डालते हैं। उसी तरह आसक्ति के कीटाणु भी असावधानी से सात्विक कर्म में शरीक हो गए तो स्वधर्म सड़ने लगेगा। सात्विक स्वधर्म में भी राजस और तामस की दुर्गंध आने लगेगी। अत: कुटुंब रूपी यह बदलने वाला स्वधर्म यथासमय छूट जाए तो बेहतर है।

दिलचस्प है कि आज जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है तो इससे बचाव और सेहत की सुरक्षा के लिहाज से कई सारे अध्ययन हो रहे हैं, कई तरह के प्रयास विभिन्न स्तरों पर चल रहे हैं। पर इन सबके बीच एक वैचारिक और दार्शनिक मंथन और विमर्श यह भी शुरू हुआ है कि इस पूरे संकट को सभ्यता के संकट के तौर पर देखा जाए। बहुत तफ्सील में न जाएं तो भी इतना तो समझ में आता ही है कि हम सबने जीवन में अपनी इच्छाओं का, अपनी सुविधाओं का, अपने हितजनों का एक छोटा-बड़ा दायरा बना लिया है और हम इनकी हर हाल में हिफाजत चाहते हैं।

यह मामला संवेदना का नहीं बल्कि एक ऐसी आसक्ति का है जिसके मूल से जीवन की क्षणभंगुरता का सत्य तो गायब है ही, इस बात को भी नजरअंदाज किया गया है कि जीवन का अर्थ सिर्फ कर्म में है। बाकी सब औचित्यहीन है, निरर्थक है। विनोबा गीता पर अपने प्रवचन में कहते हैं कि अर्जुन ने युद्ध के खिलाफ कृष्ण के सामने जो दलील दी था, वह गलत नहीं थी। दो विश्वयुद्धों के परिणाम दुनिया ने प्रत्यक्ष देखे हैं। पर सोचने की बात इतनी ही है कि वह अर्जुन का तत्वज्ञान (दर्शन) नहीं था, कोरा प्रज्ञावाद था। कृष्ण इसे अच्छे से जानते-समझते थे। इसलिए उन्होंने उस पर जरा भी ध्यान न देकर सीधा अर्जुन के अंदर बैठे मोह के नाश का तय किया।

अर्जुन मोहवश या यों कहें कि आसक्ति के कारण युद्ध टालना चाहता था। गीता इस मोह का ही प्रत्याख्यान है। आप देखेंगे कि कुरुक्षेत्र में रण शुरू होने से ठीक पहले अर्जुन अहिंसा की ही नहीं, संन्यास की भी भाषा बोलने लगता है। पर यह सब करते हुए वह कहीं से अपने स्वधर्म की शिनाख्त नहीं कर पाता है। गीता के अपने संदेश में कृष्ण इसे गहराई से साफ करते हैं और अर्जुन को स्वधर्म की पहचान के लिए जागरूक करते हैं।

स्वधर्म का महत्व उसकी स्थूलता या सूक्ष्मता में नहीं बल्कि उसकी मौलिकता में, उसकी अपिरहार्यता में है, उसकी निर्विकल्पता में है। यह कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि जिसे कोई बड़ा समझकर ग्रहण करे और कोई छोटा समझकर छोड़ दे। वह न बड़ा होता है, न छोटा। वह बस हमारे नाप का होता है। यह भी कि स्वधर्म वैसा धर्म नहीं है जैसा हम धर्म को लेकर आम समझ रखते हैं। वह हिंदू, इस्लाम या ईसाई जैसा धर्म कतई नहीं है। हम में से हरेक को संसार में अपना स्वधर्म तात्विक विवेक के साथ तय करना होगा और इस विवेक का मूलाधार है आसक्तिमुक्त होना। गीता के माध्यम से दी गई विनोबा की यह सीख हमें जीवन को लेकर कई तरह के भ्रम और मोह से उबारती है।

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