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सहज समाधि भली

गोरखनाथ ने तो समाधि का एक सूत्र इस तरह भी दिया- ‘हबकि न बोलिबा, ठमकि न चलिबा, धीरे धरिबा पांव/ गरब न करिबा, सहजे रहिबा, भणत गोरख राव’। सहज समाधि का यह रास्ता कितना सहज है। मगर इतना सहज होता, तो शायद आज जीवन में इतनी जटिलताएं न होतीं।

इसलिए आजकल कारपोरेट कंपनियां अपने कर्मचारी का चयन करते वक्त सबसे पहले यही देखती हैं कि उसमें अपने पर अभिमान करने की कितनी क्षमता है। वह कितने अभिमान के साथ अपने किए का बखान कर सकता है। वह अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए कितनी अच्छी भाषा का इस्तेमाल कर पाता है। नौकरियों के लिए जितने भी आवेदन मंगाए जाते हैं, उनके साथ ‘आत्मवृत्त’ नत्थी करना होता है। वह आत्मवृत्त यानी बायोडाटा दरअसल, व्यक्ति के अपने सारे किए पर अभिमान ही होता है। उसमें प्राय: झूठे तथ्य भी शामिल किए जाते हैं, ताकि व्यक्ति का अपने किए पर अभिमान ऊंचा हो सके। अपने पर अभिमान अब आत्मविश्वास का मानक भी हो चला है।

बाजारवादी विकास के लिए यह सिद्धांत जरूरी है। दूसरे को छोटा और खोटा बता कर आसानी से अपना माल चोखा साबित किया जा सकता है। इसीलिए तो नकारात्मक विज्ञापनों की शुरुआत हुई। विज्ञापन करके दूसरे के माल की निंदा की जाने लगी। हर मार्केटिंग वाला, सेल्स वाला दूसरे के उत्पाद की खामियों की बकायदा सूची साथ लिए चलता है। अपने को श्रेष्ठ बताते रहना जरूरी है, नहीं तो उसका माल बिकेगा ही नहीं। अगर उसने एक को भी अपने से श्रेष्ठ बता दिया, तो लोग उसका माल छोड़ दूसरे की तरफ भागेंगे। इसलिए उसे ‘मैं ही मैं’ की रट लगाए रखनी होती है।

कोई भी विचार जब हमारे चारों ओर लगातार बना रहता है, तो वह धीरे-धीरे लोगों के जीवन में भी उतर आता है। लोगों के तर्क करने की क्षमता को कुंद कर उन पर हावी हो जाता है। लोग उसे जीवन का बुनियादी सिद्धांत मान लेते हैं। इसलिए हैरानी नहीं कि यह सिद्धांत अब युवा पीढ़ी में प्रबल रूप में विद्यमान हो चुका है। मगर जीवन बाजार से नहीं चलता। बाजार के सिद्धांतों से नहीं चलता। ‘तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो, मैं ही मैं हूं तो क्या मैं हूं।’

हमारे यहां तो ‘व्यष्टि’ में ‘समष्टि’ की बात की गई। ‘आत्मस्थ’ होेने की बात कही गई। समूह में रहते हुए भी अपने भीतर रहने का सुझाव दिया गया। उसमें अपने पर गर्व या अभिमान की बात कहीं नहीं आती। बल्कि, किसी भी तरह का गर्व करना बुरा माना गया। अपने किसी किए काम पर गर्व करना, अभिमान करना कर्ताभाव के विरुद्ध माना गया। जब अपने किए पर गर्व किया, अभिमान किया, तो वह सारा किया व्यर्थ गया। वह कर्ताभाव विश्वकल्याण के लिए काम करने का था। उसमें किसी तरह के लाभ, मुनाफे का भाव नहीं था।

लोक में तो अब भी ‘मैं’ के साथ बात करना वर्जित माना जाता है। कोई भी बड़ा बुजुर्ग फौरन टोक देता है- ‘ज्यादा मैं ठीक नहीं’। मगर वर्चस्वशाली सोच बिना ‘मैं’ के पोषित हो ही नहीं सकती। इसी से उसके अहं को तुष्टि मिलती है। फ्रायड जैसे कुछ पश्चिमी सिद्धांतकारों ने तो ‘अहं’ को व्यक्ति के विकास में महत्त्वपूर्ण कारक माना, मगर हमारे यहां यह सदा वर्जित रहा। ‘गतं न शोचामि कृतम् न मन्ये…’ जो बीत गया, खत्म हो गया, नष्ट हो गया, उस पर शोक न करना। जो किया, उस पर कभी अभिमान न करना।

गोरखनाथ ने तो समाधि का एक सूत्र इस तरह भी दिया- ‘हबकि न बोलिबा, ठमकि न चलिबा, धीरे धरिबा पांव/ गरब न करिबा, सहजे रहिबा, भणत गोरख राव’। सहज समाधि का यह रास्ता कितना सहज है। मगर इतना सहज होता, तो शायद आज जीवन में इतनी जटिलताएं न होतीं। आदमी केवल सहज रहना सीख ले, तो उसका जीवन सुगम हो जाए। मगर वह सहज रह नहीं पाता, उसे रहने नहीं दिया जाता, वह रहना चाहता ही नहीं। तमाम तरह की बेचैनियां अर्जित कर रखी हैं उसने।

मनुष्य की बहुत सारी अर्जित बेचैनियों का बीज उसके गर्व करने, उसके अभिमान करने से पल्लवित-पुष्पित हुआ है। वह तो अब नामी कंपनी का वस्त्र पहन ले तो उसी पर इतराता फिरता है। मैंने यह किया, मेरे ही करने से यह हुआ। मैंने ये नियम बनाए, ये कानून बनाए, इतने उद्घाटन किए, मैंने इतनी संपत्ति खड़ी की, इतने सारे धंधे फैला दिए।

मैंने कितनों को दंडित किया। गर्व तो अब इस पर भी देखा जाता है कि मैंने कितने लोगों को मुठभेड़ में मारा, कितनों की हत्या कर दी। जाति पर गर्व करने वाले सदा अपने से नीची कही जाने वाली जातियों के लोगों का मर्दन करते ही रहते हैं। उन्हें उसी में अपना श्रेष्ठताबोध मिलता है। गर्व, अभिमान दरअसल, आदमी के विवेक का हरण कर लेता है, उसे अंधा बना देता है, उन्माद से भर देता है। इसीलिए अक्सर देश पर गर्व करने वाले ही पूरे देश को युद्ध की आग में झोंक देते हैं। मनुष्य सहज रहना सीख ले, तो सारे झगड़े समाप्त हो जाएं- घर के, बाहर के। अपने से, दूसरों से। क्योंकि प्रकृति का नियम ही है सहजता।

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