भविष्य के कृष्ण

कृष्ण का महत्व अतीत के लिए कम और भविष्य के लिए ज्यादा है। कृष्ण अपने समय से पांच हजार वर्ष पहले पैदा हुए। इसे समझाते हुए ओशो कहते हैं कि सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय से पहले पैदा होते हैं और सभी गैर-महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय के बाद पैदा होते हैं। महत्वपूर्ण और गैर-महत्वपूर्ण व्यक्ति में इतना ही फर्क है।

Jansatta Spiritual
भारतीय आध्यात्मिकता में लोक मर्यादा और प्रेम का अद्भुत समन्वय भगवान राम और कृष्ण की भक्ति में दिखती है।

राम, कृष्ण और शिव। इन तीन नामों के बिना न तो भारतीय अध्यात्म-दर्शन की यात्रा पूरी हो सकती है और न ही भारतीय आस्था और भक्ति की परिक्रमा। डॉ. राममनोहर लोहिया ने इन तीन नामों से जुड़ी आस्था की नई व्याख्या प्रस्तुत करते हुए इन्हें भारत के तीन महान स्वप्न कहा है। शिव को छोड़ राम और कृष्ण की बात करें तो इनमें विलक्षण अंतर यह है कि राम की छवि मर्यादा पुरुषोत्तम की है तो कृष्ण की लीला पुरुषोत्तम की। एक तरफ मर्यादा की ऊंचाई कभी कम नहीं होती तो दूसरी तरफ सांसारिकता के बीच प्रेम और विवेक का लालित्यपूर्ण मेल है।

दिलचस्प है कि राम के मुकाबले कृष्ण को अपनाना ज्यादा आसान मालूम पड़ता है। ऐसा इसलिए कि मर्यादा की चुनौती हमेशा बड़ी होती है और उस पर खरा उतरना आसान बात नहीं है। इसके मुकाबले कृष्ण के यहां साधारण होकर असाधारण दिखने, साबित होने की प्रेरणा ज्यादा सुलभ मालूम पड़ती है। यही कारण है कि विद्वानों का मन भी कृष्ण के जीवन और व्यक्तित्व को देखने-समझने में खूब लगा है। कृष्ण को लेकर व्यक्त किए गए विचारों में ओशो के विचार अलग होने से ज्यादा दिलचस्प हैं। दरअसल, व्यक्तित्व जब बड़ा हो, विशाल हो तो कोई भी छवि या मूर्ति बनाना आसान नहीं है। श्रेष्ठ कलाकार वही है जो मूर्ति में ऐसी बातों को भी उभार सके जो सामान्य आंखें देख नहीं पातीं।

कृष्ण भारतीय जनमानस के लिए नए नहीं हैं। चाहे सूरदास रचित उनके बाल्यकाल की छवि हो या महाभारत की विभिन्न मुद्राएं हों, चाहे विभिन्न भक्त कवियों के कृष्ण हों या लोककथाओं के कान्हा हों, सभी चिर-परिचित हैं। ओशो ने एक सधे हुए चिंतक-कलाकार की तरह अपने विचार-रंगों से कृष्ण के जीवन के उन पहलुओं को छुआ है, उन्हें आकार दिया है, जो कैमरे की आंख से नहीं देखे जा सकते। सिर्फ कूची के स्पर्श से उभारे जा सकते हैं। कैमरा सिर्फ मूर्त आकृतियों की प्रतिकृति देता है पर कलाकार की कूची अमूर्तता को रेखांकित करती है।

ओशो की दृष्टि में कृष्ण यथार्थवादी हैं। वे राग, प्रेम, भोग, काम, योग, ध्यान और आत्मा-परमात्मा जैसे विषयों को उनके यथार्थ रूप में ही स्वीकार करते हैं। दूसरी ओर युद्ध और राजनीति को भी उन्होंने वास्तविक अर्थों में स्वीकार किया है। वे कृष्ण को युद्धवादी नहीं मानते हैं। पर यदि युद्ध होना ही हो तो भागना ठीक नहीं है। यदि युद्ध होना ही है और मनुष्य के हित में अनिवार्य हो जाए तो युद्ध को आनंद से स्वीकार करना चाहिए। उसे बोझ की तरह ढोना उचित नहीं है। क्योंकि बोझ समझकर लड़ने में हार निश्चित है।

मनुष्य की युद्ध की मानसिकता को ओशो ने बड़ी सहजता से उजागर किया है। वे कहते हैं कि सतगुणों और दुर्गुणों से ही मनुष्य आकार लेता है। अनुपात कम-अधिक हो सकते हैं। ऐसा कोई नहीं है पृथ्वी पर, जिसमें थोड़ी-बहुत बुराई न हो। इसी तरह ऐसा बुरा आदमी भी नहीं खोजा जा सकता, जिसमें थोड़ी भी अच्छाई न हो। इसलिए सवाल सदा अनुपात और प्रबलता का है। स्वतंत्रता, व्यक्ति, आत्मा और धर्म, वे मूल्य हैं जिनके साथ हमेशा शुभ की चेतना जुड़ी होती है। कृष्ण इसी चेतना के प्रतीक हैं।

कृष्ण का महत्व अतीत के लिए कम और भविष्य के लिए ज्यादा है। कृष्ण अपने समय से पांच हजार वर्ष पहले पैदा हुए। इसे समझाते हुए ओशो कहते हैं कि सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय से पहले पैदा होते हैं और सभी गैर-महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय के बाद पैदा होते हैं। महत्वपूर्ण और गैर-महत्वपूर्ण व्यक्ति में इतना ही फर्क है। ऐसे में महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझना आसान नहीं है। उसका वर्तमान और अतीत उसे समझने में असमर्थता का अनुभव कराता है। यह भी कि जब हम समझने योग्य नहीं हो पाते, तब हम उसकी पूजा शुरू कर देते हैं या फिर हम उसका विरोध करते हैं। दो ही स्थितियां हैं- हम गाली देते हैं या हम प्रशंसा करते हैं। दोनों पूजाएं हैं- एक शत्रु की है, एक मित्र की है।

ओशो ने कृष्ण को अपने वर्तमान के लिए देखा। दुख, निराशा, उदासी, वैराग्य जैसी बातें कृष्ण ने नहीं कीं। उल्लास, उत्सव, आनंद, गीत, नृत्य, संगीत को कृष्ण ने भरपूर विस्तार दिया। कृष्ण ने इस संसार की सारी चीजों को उनके वास्तविक अर्थें में ही स्वीकार किया है। ओशो के पास कृष्ण के पक्ष या विपक्ष में ले जाने का कोई आग्रह नहीं है। कृष्ण संपूर्णता के प्रतीक हैं। मानव-समाज के आनंद के लिए सुंदर आविष्कार के रूप में उभरते हैं, जहां किसी भी बात को पूर्वग्रह से नकारा नहीं गया है।

कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य आज भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समकालीन बन सके। भविष्य में ही यह संभव हो पाएगा कि कृष्ण को हम समझ पाएं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं दिखते हैं। साधारणत: संत का लक्षण ही रोता हुआ होना है। जिंदगी से उदास, हारा हुआ, भागा हुआ। कृष्ण अकेले ही नाचते हुए व्यक्ति हैं। हंसते हुए, गीत गाते हुए। अतीत का सारा धर्म दुखवादी था। कृष्ण ने आस्था को उल्लास की राह दिखाई, उसे उमंग में डूबना-उतरना सिखाया।

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