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जिंदगी कोई नाटक नहीं

यों भी हम नाटक करने में इतने माहिर हैं, अभिनय हमें इतना भाता है कि पल-पल अपना किरदार बदलते रहते हैं। कुछ लोग तो अभिनय में इतने मंजे हुए होते हैं कि दूसरे को भान ही नहीं होने देते कि वे नाटक कर रहे हैं। वे खुद को भी पता नहीं चलने देते कि दरअसल, वे अभिनय कर रहे हैं।

रूपा

हम फलसफेदार जुमले गढ़ने, उछालने और बिखेर देने में माहिर हैं। जिंदगी के कार्य-व्यापारों को लेकर तो ऐसे-ऐसे जुमले गढ़ रखे हैं हमने, कि बहुत सारे लोग उन्हें जीवन का सूत्र मान कर जीते हैं। एक गाने की पंक्ति है- ‘जिंदगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं।’ एक फिल्म का संवाद तो अक्सर लोग दोहराते मिल जाते हैं- ‘जिंदगी एक रंगमंच है और हम सब उसकी कठपुतलियां हैं। हमारी डोर ऊपर वाले के हाथ में है।…’ नियतिवादियों को ऐसे फलसफे बहुत भाते हैं। जिन्होंने सब कुछ अदृश्य सत्ता के जिम्मे डाल रखा है, वे अपनी सत्ता को भूल बैठे हैं। वे तो अपने साथ जो कुछ घटता है, वे जो कुछ करते हैं, सब नाटक मान कर करते हैं।

यों भी हम नाटक करने में इतने माहिर हैं, अभिनय हमें इतना भाता है कि पल-पल अपना किरदार बदलते रहते हैं। कुछ लोग तो अभिनय में इतने मंजे हुए होते हैं कि दूसरे को भान ही नहीं होने देते कि वे नाटक कर रहे हैं। वे खुद को भी पता नहीं चलने देते कि दरअसल, वे अभिनय कर रहे हैं। अभिनय अभ्यास से सधता है। हममें से बहुत सारे लोगों ने अभिनय का इतना अभ्यास किया हुआ है कि क्षण भर नहीं लगने देते और किरदार बदल कर नाटक शुरू कर देते हैं।

दफ्तर में साहब हैं, तो कड़क बन कर, खासे कठोर होकर, पूरे रोब-रुआब के साथ दहशत पैदा करते हुए दाखिल होते हैं और दिन भर अपनी हैसियत याद दिलाते रहते हैं। वही अपने से ऊपर वाले अधिकारी से बड़े सौम्य, विनम्र, लल्लो-चप्पो वाले किरदार में उतर आते हैं।

हर पल उसकी कृपादृष्टि के याचक बन दैन्य से भरे किरदार में बदल जाते हैं। दफ्तर से निकले, गाड़ी में बैठे तो चालक के साथ अलग किरदार। मगर घर में घुसते ही बीवी के सामने दूसरा किरदार। बच्चों के साथ अलहदा किरदार। पड़ोसियों, दोस्त-रिश्तेदारों के साथ हैं, तो हरदम अपनी ऊंची हैसियत के प्रदर्शन करते किरदार में।

बेवजह हंस रहे हैं, नाहक मुस्कराए जा रहे हैं, जहां कठोर बनने, नाराज होने की जरूरत नहीं, वहां भी अपना स्वभाव बदल कर रहते हैं। बहुत सारे डाक्टर अस्पतालों में दिन भर इसलिए अपने को प्रसन्न दिखाने का प्रयास करते हैं कि उन्हें बताया गया है कि डाक्टर प्रसन्न दिखता है, तो रोगी के मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अपने निदेशक से पटती नहीं, हर पल मन में उसके प्रति नकारात्मक विचार चल रहे होते हैं, पर रोगी के सामने मुस्कराना है, धैर्य के साथ उससे बात करनी है। भीतर गुस्सा है, पर ऊपर से प्रसन्नता, धैर्य का नाटक कर रहे हैं।

यह सब नाटक करने के लिए हमने इतने मनोयोग से अभ्यास किया है कि किसी त्रुटि का सवाल ही पैदा नहीं होता। इस नाटक में कोई पटकथा लेखक नहीं होता, कोई निर्देशक नहीं होता। हम ये सारे काम खुद कर लेते हैं। हमने अपने मन के भीतर नाटक का मंच इस कदर पुख्ता कर रखा है, उसे इस तरह सजा-संवार कर स्वचालित बना दिया है कि स्थिति के मुताबिक वह हमें फटाक पटकथा पकड़ा देता है, हमारा निर्देशन करने लगता है।

हमारे बोलने का लहजा, कब कैसा हो, हमारे चेहरे का भाव, हमारे शरीर की भाषा कब कैसी हो, सब हमारा मन नियंत्रित कर देता है। सब कुछ फीड करके रखा हुआ है। औंचक कोई हमारे सिर पर डंडा मार दे, तो क्षण भर को बेशक हमारा स्वभाव बदल जाए, हम अपने मूल स्वभाव में प्रकट हो जाएं, पर फिर जैसे ही मन हमारे प्रशिक्षण से संचालित होता है, नाटक शुरू कर देता है।

बहुत सारे लोग तो जीवन भर छद्म किरदार की भूमिका में रहते हैं। जब वे नौकरी में होते हैं, तब तो वे साहब का किरदार कर ही रहे होते हैं, सेवानिवृत्ति के बाद भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। उसी तरह सज-संवर कर, उसी ठसक के साथ बाजार जाते हैं, वहां दुकानदारों पर रूआब गांठते देखे जाते हैं।

यह सब इसलिए होता है कि हम अपने मूल स्वभाव में रहना ही नहीं चाहते। हम जैसे हैं, वैसे ही हर समय रहें, ऐसा कोई नहीं चाहता। हर कोई दूसरे से अलग, दूसरे से श्रेष्ठ दिखना चाहता है। इसलिए मनुष्य सदा अपनी कमजोरियों को ढंकने के जतन करता रहता है।

वह किसी के भी सामने अयोग्य या कमजोर नहीं दिखना चाहता। मगर मुश्किल यह है कि हम अपनी अयोग्यता, अपनी कमजोरियों को दूर करने के उपाय अजमाने के बजाय, उन पर परदा डालने की कोशिशें अधिक करते हैं।

इस कोशिश में झूठ पर झूठ गढ़ते जाते हैं। झूठ ही ओढ़ते-बिछाते रहते हैं। हल्की हवा से भी परदा उठने लगता है, तो हम भाग कर कमजोरियों पर उसे फिर से फैला देते हैं। हम हलकान हुए जा रहे हैं परदा डालने में, परदे को उड़ने से रोकने में।

अगर मनुष्य सहज रखना सीख ले, तो जीवन में नाटक करने की जरूरत ही न पड़े, उसकी जिंदगी नाटक बने ही नहीं। गोरखनाथ ने कहा है- सहजे रहिबा। सहज रहना कठिन है। मगर जिस तरह हम अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए अभिनय का अभ्यास करते रहते हैं, उसी तरह सहज रहने का अभ्यास शुरू कर दें, तो इतना मुश्किल भी नहीं। पहले अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना सीखना होगा, दूसरों की विशेषताओं को महत्त्व देना होगा। तब मिलेगा जीवन का असल आनंद। तब पता चलेगा कि जिंदगी कोई नाटक नहीं।

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