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तर्क, मत और सत्य

आस्तिक यह कहता है कि हम ईश्वर को सिद्ध करके रहेंगे। आस्तिक ईश्वर से बड़े होने का दावा करता है। नास्तिक क्रोध से भर जाता है और वह भी कहता है, हम असिद्ध करके रहेंगे।

तर्क के बारे में यह बात बार-बार कही-समझाई जाती है कि यह एक ऐसी तलवार है, जिसमें दोनों तरफ धार है।

रूपा
भारतीय अध्यात्म और दर्शन परंपरा में ईश्वर की तात्विक व्याख्या जिस तरह की गई है, वह विलक्षण है। गांधी जैसे महात्मा जिस सत्य की बात करते हैं, वह समझ ज्ञान और दर्शन की इसी परंपरा से आई है। सत्य की चर्चा ओशो ने भी की है। एक सत्संग में उनसे प्रश्न पूछा गया कि क्या तर्क के सहारे सत्य को पाया जा सकता है। यह एक ऐसा प्रश्न है जिससे भिड़ंत सत्य के बारे में अध्ययन में सबसे पहले होती है।

दरअसल, तर्क अपने आप में कोई ऐसी सत्ता या रास्ता नहीं जो हमें सत्य के वांछित अर्थ या सार तक पहुंचा दे। तर्क की अपनी ताकत बहुत इकहरी है। अलबत्ता उसके इस इकहरेपन में बौद्धिक आकर्षण बहुत है और अक्सर लोग इस आकर्षण के सम्मोहन में नाहक भटक जाते हैं। यही बात ओशो अपनी तरह से कहते हैं। वे बताते हैं कि तर्क अपने आप में बूढ़े हो गए बच्चों का खेल है, उससे ज्यादा कुछ नहीं है। हां, तर्क के साथ प्रयोग मिल जाए, तो विज्ञान का जन्म होता है। इसी तरह तर्क के साथ योग मिल जाए, तो धर्म का जन्म होता है। तर्क अपने आप में शून्य की भांति है। शून्य का अपने में कोई मूल्य नहीं है। एक के ऊपर रख दें, तो दस बन जाता है। अपने में कोई भी मूल्य नहीं, अंक पर बैठ कर जरूर मूल्यवान हो जाता है। तर्क की अपनी कोई स्वतंत्र या स्वायत्त हैसियत नहीं है।

तर्क के बारे में यह बात बार-बार कही-समझाई जाती है कि यह एक ऐसी तलवार है, जिसमें दोनों तरफ धार है। वह एक तरफ ही नहीं काटती, वह दोनों तरफ काटती है। इसलिए ऐसा कोई तर्क नहीं, जो तर्क से नहीं कट जाता हो। इसलिए जो आस्तिक तर्क देकर ईश्वर को सिद्ध करते हैं, वे आस्तिक तर्क से ईश्वर को असिद्ध भी करार देते हैं। जिन आस्तिकों ने ईश्वर के लिए तर्क दिया है, उन्होंने वैसे नास्तिक भी पैदा किए, जिन्होंने ईश्वर को खंडित किया है। नास्तिक उन आस्तिकों ने पैदा किए हैं, जिन्होंने ईश्वर के लिए तर्क दिया है।

दुनिया में जिस दिन तर्क देने वाले आस्तिक विदा हो जाएंगे, उसी दिन तर्क देने वाले नास्तिक समाप्त हो जाएंगे। जब तक दुनिया में आस्तिक हैं, तब तक नास्तिक नहीं मर सकता, क्योंकि नास्तिक आस्तिक के तर्क का उत्तर है और अगर दुनिया को धार्मिक बनना है, तो आस्तिकों को मर जाना चाहिए ताकि नास्तिक समाप्त हो जाएं। दुनिया उस दिन धार्मिक होगी, जिस दिन ईश्वर के लिए, सत्य के लिए तर्क देना नासमझी मान ली जाएगी। आस्तिक एक तरह का नासमझ है जो ईश्वर के लिए तर्क देता है और सिद्ध करना चाहता है। ईश्वर के लिए तर्क देकर सिद्ध करने का मतलब यह है कि हम ईश्वर से बड़े हैं, जो ईश्वर को सिद्ध करते हैं। अगर हम सिद्ध न करेंगे, तो वह असिद्ध हो जाएगा। ईश्वर को सिद्ध होना न होना हमारी मुट्ठी की बात है।

आस्तिक यह कहता है कि हम ईश्वर को सिद्ध करके रहेंगे। आस्तिक ईश्वर से बड़े होने का दावा करता है। नास्तिक क्रोध से भर जाता है और वह भी कहता है, हम असिद्ध करके रहेंगे। आस्तिक और नास्तिक, दोनों ईश्वर के दुश्मन हैं। जो भी सत्य के लिए तर्क भर देता है, वह सदा सत्य का दुश्मन है। सत्य का तर्क से कम, अनुभव से ज्यादा संबंध है। अगर अनुभव को ही कोई तर्क कहे तो बात दूसरी है। अन्यथा अनुभव एक और ही दिशा है। यह जो सवाल है कि क्या तर्क से ही सत्य नहीं मिल सकता तो तर्क से सत्य मिलना तो दूर है, इसके आसपास की भी टोह मुश्किल है। हां, तर्क के भरोसे हम असत्य के गोते चाहे जितना लगा सकते हैं।

ओशो इस बारे में कहते हैं कि तर्क तो हवा में मुट्ठियां बांधने जैसा है, जितनी जोर से मुट्ठी बांधेंगे, हवा और बाहर निकल जाएगी। अगर हवा चाहते हो मुट्ठियों में, तो मुट्ठी खुली रखनी होगी। अब यह उलटी बात है, अगर हवा चाहते हो मुट्ठी में, तो मुट्ठी खुली रखना। और अगर हवा पर मुट्ठी बांधने की कोशिश की तो जितनी सख्त मुट्ठी होगी, उतनी कम हवा भीतर होगी। अगर मुट्ठी पूरी सख्त होगी, तो हवा भीतर बिल्कुल नहीं होगी। चूंकि तर्क बांधने की कोशिश करता है, लिहाजा वह सत्य की मूल प्रकृति के विपरीत है।

सत्य बंधनहीन है। वह सार्वभौम है। आदमी तर्क के द्वारा करता क्या है, एक सीमा खींचना चाहता है, एक विमर्श, एक ‘डिस्कशन’ बनाना चाहता है। यह सत्य है, यह असत्य है। सवाल है कि यह कैसे हमने मान लिया कि बुद्धि तय कर लेगी कि क्या सत्य है और असत्य क्या। यह हमने कैसे जान लिया। बुद्धि बहुत कामचलाऊ है, उससे इस तरह ते चरम निर्णय कैसे हो सकते हैं। वैसे भी बुद्धि सोच तो सकती है, जान नहीं सकती। तर्क चूंकि बुद्धि से ही चालित है, इसलिए उसकी नियति भी बुद्धि की तरह भ्रामक है। इस बात को ठीक से समझ लेना जरूरी है कि हर हाल में बुद्धि सिर्फ सोच ही सकती है, जान नहीं सकती। सोचना कभी भी मौलिक नहीं हो सकता है। वैसे भी मौलिक चिंतन जैसी कोई चीज ही नहीं होती है। सब सोचना उधार और बासी होता है।

मौलिकता विचार से नहीं आती, निर्विचार से आती है। विचार से जो मुक्त हो जाता है, वह मौलिक हो सकता है। जबकि सत्य की पहली कसौटी ही यह है कि वह मौलिक है। सत्य सदा ताजा है। वह जो सतत ताजा, मौलिक और नया है, उसे बासी विचारों की बुद्धि कैसे जान सकेगी। जैसे ही इस बासी बुद्धि को लेकर गए, इस उधार के दिमाग को लेकर गए, तो सत्य कहीं छूट जाएगा। हां, यह हो सकता है कि सत्य के नाम से हम कोई मत बना लें, कोई ‘ओपिनियन’ बना लें।

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