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संग रहे निस्संग हुए

कहा गया है कि संग रहते हुए भी निस्संग रहना सीखें। समूह में रहें, सबके साथ रहें, पर अकेले रहें, निर्भर किसी पर न रहें। ‘कर बहियां बल आपनी छांड़ि बिरानी आस’। किसी से अपेक्षाएं न पालें, किसी का मुखापेक्षी न बनें। अपने में स्थित रहें।

इन दिनों शासन की तरफ से आत्मनिर्भरता की बातें खूब हो रही हैं। यह जीवन का बहुत बड़ा मूल्य है। जिसने आत्मनिर्भरता सीख ली, उसका जीवन आसान हो गया, तनावमुक्त, विवाद रहित हो गया। मगर मनुष्य की वृत्ति समूह में रहने की है, वह समूह में रहते हुए खुद को शासकीय वर्चस्व में रखने की अभिलाषा पाले रहता है। इस तरह धीरे-धीरे अनजाने ही छोटी-छोटी चीजों के लिए वह पर निर्भर होता जाता है। अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी दूसरों पर निर्भर होता चला जाता है।

प्यास लगी है, पर पानी के लिए वह दूसरे को आदेश देगा। पानी नौकर लाएगा। नौकर पानी नहीं देगा, तो वह खुद लेकर नहीं पीएगा। इसी में वह अपनी शान समझने लगता है। उसका अहंकार तुष्ट होता है। कमीज का बटन टूट गया, वह खुद नहीं टांकेगा, पत्नी टांकेगी। अगर टांकने में देर हो गई, तो पत्नी पर झुंझलाएगा, अगर वश चला तो उसे डांट-फटकार भी लगाएगा।

अगर संपन्न हुए तो पत्नी भी बटन क्यों टांके, नौकर-चाकर हैं न। दर्जी टांकेगा बटन। अगर किसी दफ्तर के साहब हुए तो हर चीज के लिए हाथ घंटी पर जाएगा। घंटी सुन कर बार-बार हाथ बांधे चपरासी आएगा। दवाई की टिकिया भी वही लाकर देगा, तो खाएंगे। इससे अहंकार तुष्ट होता है, अपने बड़े होने, अधिकार संपन्न होने का भाव गहरा होता है। इसी में सुख का अनुभव होता है।

ऐसी ही व्यवस्थाएं मनुष्य ने अपने चारों तरफ बना रखी हैं। जिसने जितनी बड़ी ऐसी व्यवस्था बना रखी है, वह उतना ही बड़ा आदमी माना जाता है। वह यह नहीं सोच पाता, सोचना ही नहीं चाहता, कि किस तरह वह परनिर्भर होता गया है। हर चीज के लिए दूसरे पर निर्भर। इसी में वह सुख पाता है।

मगर कहा गया है कि ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’। पराधीनता केवल दूसरे की शासन-व्यवस्था, किसी विदेशी आक्रांता के शासन में जीने की नहीं होती। निजी स्तर पर भी होती है। अपने जीवन से जुड़ी चीजों के लिए भी दूसरों पर निर्भर होते चले जाना बड़ी पराधीनता है। इससे बड़ा जीवन का दुख कोई हो ही नहीं सकता।

परनिर्भरता पल-पल तनाव देती है, उलझनें पैदा करती है, विवाद रचती है, क्रोध उपजाती है। जो आत्मनिर्भर है, खुद अपने काम कर लेता है, उसे किसी की फिक्र नहीं। बटन टूटा, खुद टांक लेगा। प्यास लगी, खुद पानी लाकर पी लेगा। पत्नी घर में नहीं, खुद भोजन पका लेगा। कोई तनाव नहीं, कोई झुंझलाहट, कोई विवाद नहीं।

आत्मनिर्भर व्यक्ति दूसरों के सहयोग के लिए भी तत्पर देखा जाता है। वह अपना ही नहीं, दूसरों का भी, समाज का भी सहयोग करता है। इसलिए कि उसने अपने लिए परनिर्भरता की व्यवस्थाएं नहीं रची हैं। परनिर्भर व्यक्ति दूसरों को कायिक, वाचिक, मानसिक पीड़ा ही देता है। वह प्राय: दूसरों को दुख पहुंचाता है। इस तरह उनकी तरफ से आने वाली नकारात्मक ऊर्जा के पाश में भी कसता जाता है।

इसीलिए कहा गया है कि संग रहते हुए भी निस्संग रहना सीखें। समूह में रहें, सबके साथ रहें, पर अकेले रहें, निर्भर किसी पर न रहें। ‘कर बहियां बल आपनी छांड़ि बिरानी आस’। किसी से अपेक्षाएं न पालें, किसी का मुखापेक्षी न बनें। अपने में स्थित रहें। हालांकि अपने में स्थित होना, आत्मस्थ होना बड़ी साधना है। किसी से मोह न रह जाए, किसी से अपेक्षाएं न रह जाएं, तो दुख समाप्त हो जाता है।

मोह नहीं है, तो न किसी से प्रेम की अपेक्षा रह जाती है, न किसी की उपेक्षा का गम रहता है। पत्नी, भाई, संतान का कोई व्यवहार भी विचलित नहीं करता। न उनका प्रेम, न उनकी उपेक्षा। जगत के सारे काम करते हुए भी उससे मोह नहीं होता। उसमें किसी तरह के व्यतिक्रम से विचलन नहीं होता। जो चाहा, वह मिल गया, तो बहुत अच्छा। नहीं मिला, तो भी कोई पीड़ा नहीं, कोई दुख, कोई अफसोस, कोई खीज, कोई नाराजगी नहीं।

ऐसी निस्संगता कोई दुर्लभ बात नहीं। इसके लिए बहुत गहन साधना की जरूरत नहीं। गांवों में अधिकतर लोग ऐसी निस्संगता के साथ जीते हैं। इसलिए कि वे अपने जीवन से जुड़े बहुत सारे मामलों में आत्मनिर्भर हैं। उन्होंने अपने लिए अपने चारों ओर वैसी व्यवस्थाएं नहीं बना रखी हैं, जैसी किसी दफ्तर के साहब ने बना रखी हैं।

संग रहते हुए निस्संग होने की पहली शर्त है आत्मनिर्भर होना। यह बिल्कुल कठिन नहीं। बस, अपने जीवन की, रोजमर्रा की चीजें खुद करने की आदत डाल लें, उन्हें करना सीख जाएं, उन्हें करने में किसी तरह की शर्म न महसूस करें। अपने भीतर यह भाव न आने दें कि जब अपने काम करने के लिए दूसरों को नौकरी पर रख सकता हूं, तो क्यों करूं मैं वे सब काम, क्यों सीखूं उन्हें करना।

मगर थोड़ा ठहर कर सोचें, बड़ा होने का यह अर्थ कतई नहीं कि आप अपने व्यक्तिगत काम के लिए भी दूसरों पर निभर होते जाएं। बहुत दूर न जाएं, स्वतंत्रता संग्राम के कुछ नेताओं के जीवन को देखें। पता चलेगा कि वे कितने बड़े थे, पर अपने निजी काम खुद करते थे, उसके लिए दूसरों को नौकरी पर नहीं रखा था।

गांधी इसके बड़े उदाहरण हैं। उन्हें तो संडास साफ करने में भी शर्म नहीं आती थी। तमाम व्यस्तताओं के बावजूद अपने रोजमर्रा के काम खुद करते थे। देश भर में यात्रएं करते थे, आंदोलनों में हिस्सा लेते थे, पर अपने दैनिक काम वे खुद किया करते थे।

यह बुनियादी आत्मनिर्भरता अगर मनुष्य सीख जाए, तो देश और समाज से जुड़े तमाम मामलों में परनिर्भरता को समाप्त कर सकता है। पूरे देश को आत्मनिर्भर बनने में सहयोग कर सकता है।

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