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राम नाम का मरम है आना

कबीर के बारे में यह भी महत्त्वपूर्ण है कि वे पांडित्य से दूर भागते हैं। पांडित्य के चोले में वे पुराणपंथियों के ढोंग और पाखंड को भली-भांति समझते थे। यही नहीं, वे ऐसे थोथे ज्ञान के खिलाफ कड़ा विरोध भी दर्ज कराते हैं। वे आगे बढ़कर कहते हैं कि वे कागज पर लिखा नहीं बल्कि आंखों से देखे पर ज्यादा यकीन करते हैं।

कबीर विरोध और समन्वय की भाषा बोलते रहे हैं। गूण विषयों पर उनके विचार बहुत ही प्रेरणादायी है।

रोहित कुमार
जिस मध्यकाल को पूरी दुनिया में अंधकार में डूबे दौर के तौर पर देखा जाता है, उसी मध्यकाल में भारत ने साहित्य और चिंतन के लिहाज से बड़ी ऊंचाई को छुआ। इसके साथ जो और एक बात अहम है वह यह कि भक्ति और प्रगतिशीलता दो ऐसे लक्षण हैं जिसने रचनात्मक तौर पर भारत के राष्ट्र होने की शिनाख्त को खासी मजबूती दी है। देश की विभिन्न भाषाओं में रचनात्मक लिहाज से कई आंदोलन हुए, कई परंपराएं आगे बढ़ीं। पर भक्ति और प्रगतिशीलता ने संपूर्ण भारत की रचनात्मकता और चिंतन की वृत्ति को एक साथ स्पर्श किया। ऐसी विलक्षणता दुनिया की शायद ही किसी भाषा और उससे जुड़ी संस्कृति के साथ देखने को मिले।

यहीं जो एक बात और अहम है वह यह कि इस दौर के साहित्य ने अपनी प्रतिष्ठा और प्रासंगिकता को आज तक बरकरार रखा है। यह स्थिति आगे लंबे समय तक रहेगी, ऐसा भी अगर कोई माने तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। तुलसी, सूर और कबीर की त्रयी तो ऐसी है जिसे हम भारतीय चिंतन और मानस की स्थायी निर्मिति का हिस्सा मान सकते हैं। गौरतलब है कि ये तीनों कवि न तो किसी पांडित्यपूर्ण भाषा या शैली का अनुसरण करते हैं और न ही उनके यहां ऐसा कोई दावा ही देखने को मिलता है। ये तीनों एक तरह से हमारे लोककवि हैं और अनका साहित्य भी लोकाश्रय में रचा गया साहित्य है। साहित्य और लोक का यह संबंध अभूतपूर्व है।

बहरहाल, अनास्था और भय के मौजूदा माहौल को देखते हुए चर्चा उस कवि की, जिन्होंने आधुनिक अंतर्विरोधों के बारे में दो टूक बात की है। दरअसल हम बात कर रहे हैं कबीर की। कबीर निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उन्हें एक समाज सुधारक के तौर पर भी देखा गया। कवि होने के साथ साधक तो वे थे ही। वे भक्ति और अध्यात्म को सांप्रदायिक आग्रहों से मुक्त देखने के हिमायती हैं। इसलिए वे एक साथ विरोध और समन्वय की भाषा बोलते हैं।

उन्होंने अपना कोई दार्शनिक संप्रदाय नहीं खड़ा किया। वरन तत्कालीन भारत में प्रचलित दर्शनों से जो कुछ भी उन्हें भला एवं अनुकूल प्रतीत हुआ, उसे ग्रहण किया। उन्होंने हिंदुओं से अद्वैतवाद को ग्रहण किया तो सूफियों के भावनात्मक रहस्यवाद को नया रूप दे दिया। उन्होंने सिद्धों तथा नाथ योगियों की योग साधना तथा हठयोग को ग्रहण किया तो वैष्णवों से अहिंसा का भाव लिया। इस तरह कबीर ने ‘सार-सार को’ ग्रहण किया तथा जो कुछ भी ‘थोथा’ लगा उससे खुद को अलग किया।

कबीर के बारे में यह भी महत्त्वपूर्ण है कि वे पांडित्य से दूर भागते हैं। पांडित्य के चोले में वे पुराणपंथियों के ढोंग और पाखंड को भली-भांति समझते थे। यही नहीं, वे ऐसे थोथे ज्ञान के खिलाफ कड़ा विरोध भी दर्ज कराते हैं। वे आगे बढ़कर कहते हैं कि वे कागज पर लिखा नहीं बल्कि आंखों से देखे पर ज्यादा यकीन करते हैं। उन्होंने अपनी दार्शनिक मान्यताओं को बड़े सीधे और सहज ढंग से सरल भाषा में जनसामान्य के लिए प्रस्तुत किया। लोक और ज्ञान का यह मेल और समन्वय भारतीय संस्कृति की मौलिकता है। यह मौलिकता सांस्कृतिक रचाव के लिहाज से तो अहम है ही इसमें प्रगतिशीलता के भी बीज तत्व हैं।

कबीर निर्गुण ब्रह्म की बात करते हैं। यह उनका मूल स्वर है। उन्होंने निर्गुण ब्रह्म के लिए ‘राम’ नाम का प्रयोग किया है। कहा जाता है कि ब्रह्म मुहूर्त में नदी तट पर सोए कबीर पर गुरु रामानंद के पैर पड़े तो उन्होंने कहा- ‘राम-राम कह।’ रामानंद के इसी कथन को कबीर ने गुरुमंत्र मान लिया और राम की भक्तिकरने लगे। पर उनके राम दशरथी राम नहीं हैं, वे तो अगम-अगोचर और अविनाशी हैं।

कबीर कहते भी हैं- ‘दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना।’ इसी बात को और स्पष्टता से उन्होंने इस तरह कहा है- कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढै बन माहि। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखत नाहीं।’ वे राम को कस्तूरी की सुगंध के समान देखते हैं, जो सूक्ष्म है और हर किसी के अंतर में उसका निवास है। यह भी कि इसकी वन और गुफाओं में तलाश व्यर्थ है। उसका साक्षात्कार तो एक आत्म मुठभेड़ है। जिसने अपने आत्म को समझ लिया, उसने राम को भी पा लिया।

तत्कालीन समाज में व्याप्त धार्मिक-सांप्रदायिक विभाजनकारी दुराग्रहों पर तीखा तंज करने वाले कबीर कहते हैं कि राम जब प्रत्येक के अंतर में निवास करते हैं तो उन्हें मंदिर, मस्जिद आदि बाहरी स्थानों में ढूंढने की क्या जरूरत है। राम के दर्शन तो कुंडलिनी जागृत कर षड्चक्र भेदन भर से स्वयं के अंतर में ही संभव है। कवित्व के लिहाज से भी कबीर का निर्गुण राम का स्मरण लाजवाब है।

वे कहते हैं- ‘जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर भीतर पानी।’ सांसारिकता और भक्ति का ऐसा सटीक रूपक शायद ही कहीं और देखने को मिले। चूंकि कबीर अद्वैतवादी हैं तो उनके अनुसार जीव का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है बल्कि वह तो राम रूपी सत्य या परमतत्व का अंश है। लिहाजा कोई राजा नहीं, कोई रंक नहीं, न कोई कोई ब्राह्मण है न कोई शूद्र ही है, सब राम के ही अंश हैं। जीव और ब्रह्म के अद्वैत को और स्पष्ट करने के लिए कबीर कहते है की जैसे जल से हिम बनता है और हिम भी जल में ही बदल जाता है, वैसे ही परमात्मा से ही आत्मा की उत्पत्ति होती है तथा आत्मा पुन: परमात्मा में ही विलीन हो जाती है।

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