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जलियांवाला बाग : सुर्ख इबारत

जनरल डायर का जन्म भारत में ही हुआ था। वह हिंदी और उर्दू जुबान अच्छी तरह समझता और बोलता था। उसके पिता भारत में शराब का व्यवसाय करते थे। उसे भारतीयों से निजी खुन्नस थी, जिसकारण वो इतना हिंसक हो गया था।

Ravivari, Jalianwala baghबैशाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के जलियांवाला बाग में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निहत्थे लोगों को अंग्रेज जनरल डायर ने गोलियों से भून डाला था। (फाइल फोटो)

अजय श्रीवास्तव
बात 102 साल पहले की है। बैसाखी के पावन दिन 13 अप्रैल 1919 को हजारों की भीड़ जलियांवाला बाग में एकत्रित होकर अंग्रजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सभा कर रही थी। मंच पर भाषण दे रहे लोग ये बता रहे थे कि कैसे अंग्रेज उन पर अत्याचार कर रहे हैं, उनके मौलिक अधिकारों का हनन कर रहें हैं कि तभी एक हेलिकॉप्टर आसमान में उड़ान भरते हुए जलियांवाला बाग की तरफ मंडराने लगता है। तकरीबन बीस हजार की भीड़ कौतूहलवश उसे निहारने लगी, वहां बच्चों की संख्या बहुत थी और उन्होंने पहली बार आकाश में ऐसा नजारा देखा था। आम दिनों में वहां उतनी भीड़ नहीं होती थी मगर लोग बैसाखी की छुट्टी मनाने जलियांवाला बाग में एकत्रित हुए थे। हेलिकॉप्टर के आंखों से ओझल होते ही जलियांवाला बाग को सैकड़ों सैनिक चारों तरफ से घेर लेते हैं। वहां की संकरी गलियों से तोप को अंदर लाने का प्रयास होता है। मगर वहां गली इतनी संकरी थी कि तोप अंदर आ नहीं पाया।

सैनिकों की तैनाती के साथ ही जलियांवाला बाग में ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर और सार्जेंट एंडरसन पहुंचते हैं। वहां पहुंचते ही डायर सैनिकों को ‘फायर’ का आदेश देते हैं। डायर के आदेश को मानते हुए गोरखा रेजिमेंट और बलूच रेजिमेंट के जवान अपनी बंदूकों की मुंह खोल देते हैं। निहत्थी भीड़ पर बिना चेतावनी के फायरिंग शुरू हो जाती है। दस मिनट तक बिना रुके 1650 चक्र गोलियां चलती हैं। लाशें गिरने लगती हैं। लोगों के पास भागने का मौका नहीं होता है। कुछ लोग अपनी जान बचाने के लिए दीवारों को लांघने का प्रयास करते हैं मगर वो सैनिकों की गोलियों से बच नहीं पाते। कुछ लोग लाशों की आड़ में अपने को छिपाने का प्रयास करते हैं। पर वो असफल रहते हैं। भारी खूनखराबे से विचलित होकर जनरल डायर का एक साथी ब्रिग्स उसे झकझोर कर रोकने की कोशिश करता है। मगर डायर के माथे पर तो जैसे खून सवार था।

दस मिनट बाद जब गोलीबारी रुकती है तो चारों तरफ खून ही खून बिखरा पड़ा मिलता है। क्या बच्चे और क्या जवान, सभी के खून और चीत्कार से पूरे वातावरण में मातम पसर जाता है। गोलीबारी खत्म होते ही जनरल डायर अपने साथियों के साथ अपनी गाड़ी में बैठकर चला जाता है और उसके पीछे सैनिक अपनी बैरक में लौट जाती है। बड़े जनसंहार को अंजाम देने के बाद जनरल डायर मुख्यालय पहुंचा और उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को एक टेलीग्राम किया कि उस पर भारतीयों की एक हिंसक फौज ने हमला किया था जिससे बचने के लिए उसको गोलियां चलानी पड़ी। उसके टेलीग्राम के जवाब में ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर जनरल जेम्स चेम्सफोर्ड ने डायर को शाबाशी देते हुए लिखा कि तुमने सही कदम उठाया है। डायर ने फिर मार्शल लॉ लगाने की मांग की, जिसे वायसरॉय ने मंजूरी दे दी।

जलियांवाला बाग हत्याकांड की पृष्ठभूमि एकाएक तैयार नहीं हुई। इसे जानने के लिए अतीत में झांकना होगा। प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीय नेताओं और जनता ने खुलकर ब्रितानी साम्राज्य का साथ दिया था। इंग्लैंड की तरफ से लड़ने के लिए 13 लाख भारतीय सैनिक विश्व के विभिन्न हिस्सों में तैनात किए गए, जिसमें 43 हजार भारतीय सैनिकों की शहादत हुई। भारतीय नेताओं को लगा कि बितानी साम्राज्य इससे खुश होकर उन्हें और रियायत देगा मगर हुआ इसका उलटा। अंग्रेजों के अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगे। अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ आवाजें उठनीं भी शुरू हो गर्इं और इन्हें दबाने के लिए 1918 में एक ब्रितानी जज सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की गई, जिसकी जिम्मेदारी इस बात का अध्ययन करना था कि भारत में, विशेषकर पंजाब और बंगाल में ब्रिटिशों का विरोध किन विदेशी शक्तियों की सहायता से हो रहा है। समिति के सुझावों के अनुसार भारत में प्रतिरक्षा विधान (1915) लागू किया गया था, जो आजादी के लिए चल रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए था।

रॉलेट एक्ट के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू हो गए, खासकर पंजाब में तो रोज धरना-प्रदर्शन और गिरफ्तारियां आम बात हो गई थी। गांधीजी ने भी रॉलेट एक्ट के विरोध का आह्वान किया। देशभर से नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गई। आंदोलन के जुनून को देखते हुए अंग्रेजों को लगा कि अगर इसे यहीं नहीं दबाया गया तो कहीं 1857 के गदर की पुनरावृत्ति न हो जाए।

आंदोलन को कुचलने की पूरी तैयारी कर ली गई। आंदोलन के दो बड़े नेता सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को रॉलेट एक्ट के तहत गिरफ्तार कर कालापानी की सजा सुनाई गई। विरोध होना ही था और हुआ भी। उन दिनों जनरल डायर की गिनती कड़क अफसरों में होती थी और वे जलंधर में तैनात थे। ऊपर से आदेश हुआ कि जनरल डायर तुरंत अमृतसर पहुंचें और वहां नागरिक प्रशासन बहाल करें, जो लगभग ढह चुका था। जनरल डायर ने उसी दिन आकर काम संभाल लिया और उसका दमनचक्र परवान चढ़ने लगा।

गौरतलब है कि जनरल डायर का जन्म भारत में ही हुआ था, वह हिंदी और उर्दू जुबान बहुत अच्छी तरह समझता और बोलता था। उसके पिता भारत में शराब का कारोबार करते थे। उसे भारतीयों से व्यक्तिगत खुन्नस थी, जिसके कारण वो इतना हिंसक हो गया था। स्वतंत्रता के आंदोलन को रोकने के लिए ही उसने जलियांवाला बाग में निहत्थों पर गोलियां चलवाई थीं।

जलियांवाला बाग हत्याकांड की विश्वव्यापी निंदा हुई। इंग्लैंड के सभी प्रमुख अखबारों ने इसे अमानवीय कृत बताया। हत्याकांड से दुखी होकर रवींद्रनाथ ठाकुर ने ब्रितानी हुकूमत के दिए सम्मान को वापस कर दिया। शुरू में तो ब्रितानी सरकार ने इतने बड़े हत्याकांड का कोई संज्ञान हीं नहीं लिया लेकिन जब विरोध बढ़ता गया तो इसकी जांच के लिए हंटर कमेटी का गठन किया गया।

हंटर कमेटी के सामने जनरल डायर, सार्जेंट एंडरसन और ब्रिग्स की पेशी हुई। कमेटी ने एक सर्वसम्मत रिपोर्ट और एक अल्पमत रिपोर्ट प्रस्तुत की। मगर दोनों ही रिपोर्ट में जनरल डायर को दोषी माना गया। ब्रिटिश सरकार ने डायर को इस्तीफा देने को कहा। लंदन के हाउस आॅफ कॉमंस में इस मुद्दे पर काफी तीखी बहस हुई और वहां भी यह तय पाया गया कि जो डायर ने किया, वो पूरी तरह से गलत था। डायर को इंग्लैंड बुला लिया गया और वे जब तक जिंदा रहे उनके दामन में लगे दाग धुल नहीं सके। 1927 में उसकी मृत्यु हो गई, तब तक वो गुमनामी की जिंदगी जीता रहा। हालांकि उसे सैनिक सम्मान के साथ दफनाया गया।

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