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स्व का विसर्जन

मनुष्य के गहरे व्यक्तित्व में ‘स्व’ ही कारा है, ‘सेल्फ’ का अहंकार ही कारागृह है। छोटा कारागृह है, लेकिन बड़ा है। बड़ी शक्तियों से भरा है, बड़े खजाने डूबे हैं। पर है कारागृह ही। उसके बाहर विराट का विस्तार है।

रूपा

हर दौर अपनी चिंताओं को भारीपन के साथ देखता है। मौजूदा दौर में तो खैर यह भारीपन और बढ़ गया है। ऐसे में चिंता से घिरे होकर चेतना की बात करना कम टेढ़ी खीर नहीं है। पर कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है। भटकाव हो कि चिंताओं का बोझ हो, रास्ता तो चेतना से ही निकलेगा। लिहाजा, तमाम चिंताओं के बीच चेतना की बात करना, इस बारे में विवेकशील होना जरूरी है। चेतना के बारे में हम कोई भी बात स्वयं को सामने रखकर ही कर सकते हैं।

दार्शनिकों और अध्यात्म के जानकारों ने इसे सूत्र रूप में बताते हुए बार-बार कहा कि कि व्यक्ति के लिए चेतना का अर्थ परिधि से केंद्र की तरफ आना है। मन और विवेक के स्तर पर इस यात्रा की दिशा और गंतव्य अगर सुस्पष्ट नहीं है तो फिर चेतना का हासिल तो क्या मतिभ्रम की असंख्य समस्याएं और ग्रंथियां जन्म लेंगी। यहां जो एक बात और साफ होने की है वह यह कि जो स्वयं को नहीं जानते हैं वे तो पिछड़े हुए हैं ही, जो स्वयं पर ही अटक जाते हें वे भी कम पिछड़े नहीं हैं। मार्ग पर ही रुक जाएं तो भी मंजिल पर नहीं पहुंच पाते। मार्ग पर चलना भी पड़ता है। जैसे सीढ़ी चढ़कर कोई अगर सीढ़ी पर ही रुक जाए तो चढ़ना व्यर्थ हो जाता है। सीढ़ी चढ़नी भी पड़ती है और छोड़नी भी पड़ती है।

स्वयं को तो पाने की हमारी बड़ी हसरत होती है, लेकिन स्वयं को खोना कठिन बात है। यह छोड़ना भी कई तरह का है। अगर कहें कि परिवार छोड़ा दो तो लोग संभव है कि तैयार हो जाएं। कहें कि यश छोड़ दो, महत्वाकांक्षा छोड़ दो, सिंहासन छोड़ दो तो वह भी छोड़ा जा सकता है। लेकन सबसे मुश्किल है मैं का त्याग। मैं को समझना और इस प्रक्रिया में मैं-मुक्त होना अलग बात है। पहली स्थिति ज्ञान की है तो दूसरी स्थिति में उस ज्ञान की चैतन्य सिद्धि भी है। यह सिद्धि आसान नहीं है।

आमतौर पर अनुभव यह बताता है कि कोई साधना में भी उत्सुक होगा तो इसलिए कि उसका ‘मैं’ और भी निखर जाए। उसके लिए साधना का अर्थ है कि मैं कुछ हो जाऊं। परमात्मा को भी इसीलिए खोजेगा कि कहीं मैं परमात्मा के बिना न रह जाऊं। स्वयं को खोने की तैयारी आमतौर पर नहीं दिखती है। इसलिए स्वयं के विसर्जन का सूत्र सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। यह सूत्र, यह रास्ता स्वयं से मिलन का है। स्वयं को पा लेना भी कठिन है। स्वयं को भी पूरा जान लेना भी मुश्किल है। लेकिन उससे ज्यादा कठिन स्वयं को खोना और विसर्जित करना है।

अगर एक व्यक्ति जेल में कैद हो तो मुक्त होने के लिए पहली शर्त तो यही होगी कि वह जाने कि कारागृह में कैद है। दूसरी शर्त होगी कि जेल को ठीक से पहचानना। कहां दीवार है? कहां मार्ग है? कहां खिड़कियां, कहां शीशे, कहां से निकला जा सकता है, कहां पहरेदार है? जो जेल से पूरी तरह परिचित होगा, जेल के प्रति पूरी तरह सचेतन होना, वही जेल से मुक्त हो सकता है।

मनुष्य के गहरे व्यक्तित्व में ‘स्व’ ही कारा है, ‘सेल्फ’ का अहंकार ही कारागृह है। छोटा कारागृह है, लेकिन बड़ा है। बड़ी शक्तियों से भरा है, बड़े खजाने डूबे हैं। पर है कारागृह ही। उसके बाहर विराट का विस्तार है। जहां आजादी है, जहां मुक्ति है। पहले तो हमें अपने इस ‘स्व’ का ही पता नहीं है कि इतना बड़ा क्या और क्यों है? जब इसका पूरा पता लगता है तो खतरा भी समझ में आता है। जैसे ही पता चलता है कि इतनी संपत्ति, इतने हीरे-माणिक, इतने खजानों का मैं मालिक हूं, वैसे ही यह कारागृह नहीं, सम्राट का महल मालूम पड़ने लगता है। अगर एक कैदी को भी पता चल जाए कि जेल में इतने खजाने भरे हैं, इतना सोना है, इतनी संपदा है, शायद वह भी इस बात से इनकार कर दे कि यह कारागृह है।

जिस दिन हमें अपने स्वयं की पूरी संपदा का, अपने स्वयं के पूरे सुख की शक्ति का पता चलता है, उस दिन यह खतरा है कि हम भूल जाएं कि यह ‘स्व’ बड़ी छोटी भूमि है, यह बड़ी अनंत भूमि का एक छोटा सा टुकड़ा है। यह ऐसे ही है, जैसे किसी ने मिट्टी के घड़े में पानी भर के सागर में छोड़ दिया हो। मिट्टी के घड़े को भी एक दिन तोड़ना ही पड़ता है।

जो सेल्फ है, जो मैं हूं, यह जो आत्मा का भाव है, यह जो अहंकार है, यह घेरे हुए है। लेकिन जिस दिन स्वयं को पूरी गरिमा का पता चलता है, उस दिन मिट्टी का घड़ा सोने का घड़ा होता है। तोड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए बहुत बार साधक कई तरह के अहंकारों से घिर जाता है। बहुत बार साधना के पथ पर चलने वाले को जो अंतिम चीज रोक लेती है, वह वही जगह है जहां उसका मैं सोने का हो रहा है। हजारों मील आदमी चल लेता है और मंजिल के पास एक-एक कदम उठाना मुश्किल हो जाता है। दरअसल, स्वयं को पाने की बात बड़ी नहीं है, स्वयं को खोने की बात बहुत बड़ी है।

जिस दिन ‘मैं कौन हूं’ का सवाल समाप्त हो जाता है, उस दिन जो दीवारें है बीच की, सेल्फ की, वह विसर्जित हो जाती है। उसके गिरते ही व्यक्ति अनंत के साथ एक हो जाता है। ऐसा नहीं है कि आप मिट जाते हैं। आप तो होते ही हैं और भी पूर्णता से होते हें, लेकिन आप ‘मैं’ नहीं रह जाते, आप सब हो जाते हैं। आप तब लहर नहीं रह जाते, सागर हो जाते हैं। ल्ल

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