ज्ञान का पर्याय नहीं शिक्षा

महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माने गए विनोबा का जीवन और विचार भारतीय संत परंपरा का सर्वाधुनिक सर्ग है। एक ऐसा सर्ग जिसमें अहिंसक राष्ट्र निर्माण की संभावना और विकल्प के कई जमीनी प्रयोग हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। गीता की आधुनिक व्याख्या से लेकर देश में भूमि के असमान वितरण को दूर करने के मकसद से शुरू किए गए भूदान आंदोलन तक विनोबा कई भूमिकाओं में हमारे सामने आते हैं।

रोहित कुमार

शिक्षा को ज्ञान का पर्याय नहीं माना जा सकता। इस बारे में कई तरह की नसीहत और विवेक की बातें मनुष्य के सभ्यतागत और सांस्कृतिक विकास से भी गहरे तौर पर जुड़ी रही हैं। बात करें भारत की तो वैदिक दौर से इस बात पर विविध प्रसंगों में जोर दिया गया है और इसके लिए सुंदर दृष्टांत दिए गए हैं। भक्ति आंदोलन के दौर में संत-कवियों ने शिक्षा और ज्ञान के अंतर को लेकर सुंदर पदों की रचना की है।

स्वाधीनता आंदोलन के दौर में जब देश सांस्कृतिक तौर पर नए सिरे से जागरूक हो रहा था तब भी हमारे महापुरुषों ने इस विवेक को जनसामान्य के बीच बहाल रखने की भरसक कोशिश की कि कहीं शिक्षा को ही ज्ञान का पर्याय न मान लिया जाए। महात्मा गांधी ने इस समस्या को हल करने के लिए और सहज तरीका निकाला। उन्होंने ‘नई तालीम’ की बात की। यानी तालीम का एक ऐसा तरीका जो गहरे तौर पर जीवन और उसकी जरूरतों से जुड़ा हो तथा जिसमें शिक्षा और ज्ञान अलग-अलग न हों बल्कि एक-दूसरे से स्वाभाविक तौर पर जुड़े हों।

गड़बड़ी तब ज्यादा बढ़ी जब भारत सहित पूरी दुनिया में एक तरफ विकास और उपभोग का जोर बढ़ा तो वहीं दूसरी तरफ भौतिकवादी लिप्साओं को पूरा करने के माध्यम के तौर पर जाने-अनजाने रूप में शिक्षा को लिया जाने लगा। आज की स्कूली और उच्च शिक्षा तकरीबन ऐसी ही है। इस बारे में विनोबा ने बहुत रोचक तरीके से मौजूदा शिक्षा व्यवस्था से छात्रों की होने वाली दुर्गति के बारे में बताया है।

महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माने गए विनोबा का जीवन और विचार भारतीय संत परंपरा का सर्वाधुनिक सर्ग है। एक ऐसा सर्ग जिसमें अहिंसक राष्ट्र निर्माण की संभावना और विकल्प के कई जमीनी प्रयोग हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। गीता की आधुनिक व्याख्या से लेकर देश में भूमि के असमान वितरण को दूर करने के मकसद से शुरू किए गए भूदान आंदोलन तक विनोबा कई भूमिकाओं में हमारे सामने आते हैं। तारीफ की बात है कि इन सब भूमिकाओं में वे अहिंसक और रचनात्मक तकाजों से तो काम लेते ही हैं, साथ में यह सिद्धि भी आजमाते चलते हैं कि भारतीय लोकमानस की स्वाभाविकता किसी भी हिंसक होड़ के बजाय सद्भाव और सहयोग के साझे से बनी सामाजिकता से मेल खाती है।

वे कहते हैं, ‘आज की विचित्र शिक्षा-पद्धति के कारण जीवन के दो टुकड़े हो जाते हैं। पंद्रह से बीस वर्ष तक आदमी जीने के झंझट में न पड़कर सिर्फ शिक्षा प्राप्त करे और बाद में, शिक्षण को बस्ते में लपेटकर रख, मरने तक जिए। यह रीति प्रकृति की योजना के विरुद्ध है। हाथ-भर लंबाई का बालक साढ़े तीन हाथ का कैसे हो जाता है, यह उसके अथवा औरों के ध्यान में भी नहीं आता। शरीर की वृद्धि रोज होती रहती है। यह वृद्धि सावकाश क्रम-क्रम से, थोड़ी-थोड़ी होती है। इसलिए उसके होने का भास तक नहीं होता।

यह नहीं होता कि आज रात को सोए, तब दो फुट ऊंचाई थी और सबेरे उठकर देखा तो ढाई फुट हो गई। आज की शिक्षण-पद्धति का तो यह ढंग है कि अमुक वर्ष के बिल्कुल आखिरी दिन तक मनुष्य, जीवन के विषय में पूर्ण रूप से गैर-जिम्मेदार रहे तो भी कोई हर्ज नहीं! यही नहीं, उसे गैर-जिम्मेदार रहना चाहिए और आगामी वर्ष का पहला दिन निकले कि सारी जिम्मेदारी उठा लेने को तैयार हो जाना चाहिए। संपूर्ण गैर-जिम्मेदारी से संपूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान कूद ही हुई। ऐसी हनुमान कूद की कोशिश में हाथ-पैर टूट जाए, तो क्या अचरज!’

यहां विनोबा जिस ‘हनुमान कूद’ की बात कर रहे हैं वह हमारी शिक्षण पद्धति की बुनियादी रचना पर एक गंभीर सवाल है। आखिर ऐसी शिक्षा का क्या मतलब है जो दी तो जाती है जीवन के लिए जरूरी हर तरह की सीख या ज्ञान के नाम पर, पर जब जीवन में इन्हें आजमाने की बारी आती है, तो ये हमारी कोई मदद नहीं करते। उलटे हमें जिंदगी के बड़े सवालों और जिम्मेदारियों के आगे निस्सहाय छोड़ देते हैं।

महात्मा गांधी ने नई तालीम का जो प्रयोग शुरू किया था, वह ज्ञान और जीवन जीने के लिए जरूरी श्रम, समझ और अभ्यास को बराबर का महत्व देता है। दुर्भाग्य से गांधी के इस प्रयोग को आगे बढ़ाने का रचनात्मक धैर्य न तो समाज ने दिखाया और न सरकारों ने। इसका हश्र आजाद भारत में विनोबा अपनी आंखों से देख रहे थे। वे देख रहे थे कि शिक्षा के नाम पर विद्यार्थियों को ऐसी राह पर धकेला जा रहा है, जहां अंतिम तौर पर उन्हें सिर्फ अंधेरा ही हाथ लगेगा।

विनोबा कहते हैं, ‘कल्पना की क्या आवश्यकता है, प्रत्यक्ष देखिए न। हमारे लिए जो चीज जितनी जरूरी है, उसके उतनी ही सुलभता से मिलने का इंतजाम ईश्वर की ओर से है। पानी से हवा ज्यादा जरूरी है, तो ईश्वर ने हवा अधिक सुलभ कराई है। जहां नाक है, वहां हवा मौजूद है। पानी से अन्न की जरूरत कम होने की वजह से पानी प्राप्त करने की बनिस्बत अन्न प्राप्त करने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है। ईश्वर की ऐसी प्रेमपूर्ण योजना है। इसका खयाल न करके हम निकम्मे, जड़-जवाहरात जमा करने में जितने जड़ बन जाएंगे, उतनी तकलीफ हमें होगी। पर यह हमारी जड़ता का दोष है, ईश्वर का नहीं।’

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