मोहभंग के दौर में मोहन

राम की छवि मर्यादा पुरुषोत्तम की है तो कृष्ण की लीला पुरुषोत्तम की। एक तरफ मर्यादा की ऊंचाई कभी कम नहीं होती तो दूसरी तरफ सांसारिकता के बीच प्रेम और विवेक का लालित्यपूर्ण मेल है।

रोहित कुमार

विराट मनुष्य की कल्पना का रोमांच विज्ञान कथाओं और उस पर आधारित फिल्मों में खूब देखा जाता है। दरअसल, यह सारा रोमांच इस यकीन से जुड़ा है कि मनुष्य अपनी शक्ति और सामर्थ्य में इतना आगे है कि वह कुछ भी अर्जित कर सकता है, किसी भी चुनौती पर खरा उतर सकता है। यकीन, भरोसा और कल्पना की यह दुनिया तब और दिल में उतर जाती है जब इसे हम ईश्वरीय चमत्कार के तौर पर देखने-समझने लगते हैं।

समझ का यह स्तर जब आस्था से भर जाता है तो हम अनुभूति और प्रेरणा के एक ऐसे अखिल आलोक के सामने होते हैं, जहां सब कुछ सुंदर और विराट है। भारतीय भक्ति परंपरा में राम और कृष्ण की स्थिति और स्वीकृति को जानें-समझें तो ये बातें अर्थ और पर्याय के कई नए संदर्भों से हमें जोड़ती हैं।

राम और कृष्ण दोनों में विलक्षणता के कई सोपान हम एक साथ देखते हैं। वैसे समानता है तो अंतर भी कम नहीं है इन दोनों ईश्वरीय रूपों में। राम की छवि मर्यादा पुरुषोत्तम की है तो कृष्ण की लीला पुरुषोत्तम की। एक तरफ मर्यादा की ऊंचाई कभी कम नहीं होती तो दूसरी तरफ सांसारिकता के बीच प्रेम और विवेक का लालित्यपूर्ण मेल है।

वैसे राम के मुकाबले कृष्ण को अपनाना ज्यादा आसान मालूम पड़ता है। ऐसा इसलिए कि मर्यादा की चुनौती हमेशा बड़ी होती है और उस पर खरा उतरना आसान नहीं होता है। इसके मुकाबले कृष्ण के यहां साधारण होकर असाधारण दिखने, साबित होने की प्रेरणा ज्यादा सुलभ मालूम पड़ती है। यही कारण है कि विद्वानों का मन भी कृष्ण के जीवन और व्यक्तित्व को देखने-समझने में खूब लगा है।

अलबत्ता व्यक्तित्व जब बड़ा हो, विशाल हो तो कोई भी छवि या मूर्ति का निर्माण आसान नहीं है। श्रेष्ठ कलाकार वही है जो मूर्ति में ऐसी बातों को भी उभार सके जो सामान्य आंखें नहीं देख पातीं। कृष्ण भारतीय जनमानस के लिए नए नहीं हैं। चाहे सूरदास रचित उनके बाल्यकाल की छवि हो या महाभारत की विभिन्न मुद्राएं, चाहे विभिन्न भक्त कवियों के कृष्ण हों या लोककथाओं के कान्हा, सभी चिर-परिचित हैं।

इस सबके बावजूद कृष्ण के पुनर्भाष्य की, उनसे जुड़े रहस्यों और खूबियों को नए सिरे से समझने की जरूरत है। लिहाजा सबसे पहले बात मौजूदा दौर की जिसमें कृष्ण के पुनर्खोज की बात महसूस की जा रही है।

बात देश के मौजूदा दौर की करें या दुनिया की, हर तरफ एक महाअंधकार फैला है जो धीरे-धीरे हमारे करीब से करीबतर आता चला जा रहा है। बाहरी ही नहीं आंतरिक दुनिया में एक बड़ी ऊहापोह और असमंजस की स्थिति बनती जा रही है। विकास और भौतिकता के बीच जीवन का अभ्यास कुछ इस कदर हो गया है कि चेतना के स्तर पर हम खासे कमजोर होते गए हैं।

यह कमजोरी आज जर्जरता की स्थिति तक पहुंच गई है। विचारकों ने खासतौर पर कोविड संकट के बारे में बात करते हुए असमंजसता के इस महासंकट को विश्वयुद्ध के दौर से भी बड़ा माना है। तब हालात खराब थे। पर हिंसक आवेग के आगे मनुष्यता का पक्ष गौण नहीं पड़ा था। तब सार्वजनिक जीवन में कई ऐसे लोग थे जो यह बता रहे थे कि विश्व कल्याण की राह क्या है।

लोगों ने इन महापुरुषों की बात सुनी भी और उसी दौर में शांति और अहिंसा से जुड़े कई बड़े लोक अभिक्रम सामने आए। आज उसी तरह की प्रेरणा की दरकार है। पर दुर्भाग्य से सामने कोई भी ऐसा नहीं जो प्रेरणा के ऐसे तेज से भरा हो कि लोग उनकी बात सुनें, उनकी बात मानें। इस लिहाज से कृष्ण और उनका जीवन हमारे सामने एक बड़ी उम्मीद की तरह है। जर्जर वर्तमान को सुंदर भविष्य में बदलने में वे हमारे लिए बड़े मददगार हो सकते हैं।

बहुत पहले ओशो कह भी चुके हैं कि कृष्ण की अहमियत अतीत के लिए कम और भविष्य के लिए ज्यादा है। सबसे अच्छी बात है कि दुख, निराशा, उदासी, वैराग्य जैसी बातें कृष्ण ने कभी नहीं की।
उल्लास, उत्सव, आनंद, गीत, नृत्य, संगीत को कृष्ण ने भरपूर विस्तार दिया। कृष्ण ने इस संसार की सारी चीजों को उनके वास्तविक अर्थों में ही स्वीकार किया। मौजूदा दौर एक तरफ हताशा का है तो दूसरी तरफ विरोधाभासों का। स्पष्ट और टिकाऊ अगर कुछ है तो वो है हमारी निराशा, आनंद और प्रसन्नता के नाम पर हर रोज बढ़ती आंतरिक घुटन।

कृष्ण के जीवन को देखें तो वे हालात को अपनी सुविधा से बांटते नहीं हैं। वे परिस्थितियों के बीच बिना कोई अलगाव पैदा किए भविष्य के लिए तर्कपूर्ण राह निकालते हैं। कृष्ण का जीवन किसी चयन या त्याग को मोहताज नहीं है। वे संपूर्णता के प्रतीक हैं। यह भी कि वे पूर्वाग्रहों के बंद मुहानों के आगे खड़े हैं। आग्रहों का न तो उन पर कोई भार है और न ही आग्रहों का कोई द्वंद्व या विरोधाभास। उनकी चेतना, उनका तर्क, सब कुछ चेतना की समग्रता से निर्मित है।

कृष्ण की महत्ता उन समकालीन दरकारों में खासी है, जिनसे आज हम चौतरफा घिरे तो हैं पर इसके लिए आगे हमें कुछ सूझ नहीं रहा। कृष्ण के साथ यह भी बड़ी बात है कि वे हमारी आस्था, स्मृति और कल्पना के बीच खड़े अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की गहराइयों और ऊंचाइयों से लैस होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं।

कृष्ण हर स्थिति को अलाप से भरते हैं, उनके यहां विलाप जैसा कुछ भी नहीं है। कृष्ण को देखें, उन्हें जानें-समझें तो एक बोझिल दौर नाचते-गाते, उल्लास मनाते भविष्य की तरफ बढ़ता दिखेगा। कृष्ण को देखना, उनसे सीखना, वर्तमान की धरती पर सुंदर भविष्य की युक्ति और निर्माण एक साथ है।

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