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कहानी: जोखिम

जब उसी रात संकट उस पर गुजरा, तब मेरे पास खाली सहानुभूति के सिवाय कुछ नहीं था। आज जब जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव देख चुका हूं, तो खयाल आता है कि मैं उसकी सहायता कर सकता था। जोखिम तो था, लेकिन सिर्फ रात भर का था।

बृज मोहन

अपनी नौकरी की एक घटना अक्सर याद आती है। सर्दियों के दिन थे। शामें जल्दी हो जाती थीं और गांवों में सन्नाटा जल्दी पसरने लगता था। वह बीतता हुआ चमकता दिन था, जब सुतापा बड़ी उम्मीद से मेरे पास आई थी। पहली बार मिल रही थी। आसन्न संकट से काफी डरी हुई थी। लेकिन उसकी समस्या को मैंने सतही-आशंका समझा था। वह दृष्टि ही मेरे पास नहीं थी। जब उसी रात संकट उस पर गुजरा, तब मेरे पास खाली सहानुभूति के सिवाय कुछ नहीं था। आज जब जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव देख चुका हूं, तो खयाल आता है कि मैं उसकी सहायता कर सकता था। जोखिम तो था, लेकिन सिर्फ रात भर का था।

घटना उस समय की है, जब बैंक की नीतियों के तहत मेरी पोस्टिंग गांव की शाखा में हुई थी। बीहड़ क्षेत्र था। पहली बार शाखा प्रबंधक बनाया गया था। मुझे वहां गए हुए दो महीने ही हुए थे। मैंने उसे पीछे से ही देखा था। उसके कंधे चौड़े थे और शरीर भरा हुआ। ऊंची-पूरी थी। वह अच्छे किस्म की साड़ी सलीके से लपेटे बैंक के काउंटर पर खड़ी थी। साड़ी का पल्लू जमीन को लगभग छू रहा था। उस भीतरी ग्रामीण इलाके के बैंक में ऐसी दबंग-सी लगने वाली शहरी औरत देख कर मुझे ताजुब्ब हुआ था। बैंक में एक तो औरतें लगभग न के बराबर आती थीं और दूसरे, जो कभी-कभार आती थीं, वे सकुचाई-सी मैली धोती वाली होती थीं, जिनमें मेरी रुचि कभी नहीं जागी थी।

उस दिन मैं बैंक में पहुंचा ही था। बस खराब हो जाने से देर ज्यादा हो गई थी। डेढ़ बज चुका था। जबकि बैंको में लेन-देन का काम दो बजे तक होता था। मेरे देर से पहुंचने से भी बैंक का कामकाज चल जाता था। मेरी अनुपस्थिति में एक जूनियर अधिकारी सब संभाले रहता था। देर हो जाने से मैं हड़बड़ी में था। उस पर नजर डालते हुए तेजी से अपने कक्ष की ओर बढ़ गया। शाखा परिसर में कोने वाला साधारण-सा कमरा मेरा कक्ष था। जिसमें मेरे लिए हत्थे वाली कुर्सी, मेज, एक अलमारी के अलावा आगंतुकों के लिए दो साधारण-सी कुर्सियां पड़ी थीं। एक खिड़की थी, पीछे बाहर की तरफ खुलती थी। वहां से बीहड़-सुधार के चल रहे उद्यम से उड़ती धूल दूर तक दिखाई देती थी।

मेरे ध्यान में वह औरत थी। क्षणिक दृष्टिपात में ही उसके असाधारण व्यक्तित्व ने मुझे प्रभावित कर लिया था। उसके बारे में जानने को उत्सुक था। किसी बहाने से मैं एक बार फिर उसे देखना चाहता था। उद्विग्न-सा हो रहा था। कुछ क्षण ही बीते होंगे कि वह मेरे कमरे के दरवाजे पर आकर ठिठकी। मैं चौंका। उसने विनम्रता से भीतर आने की अनुमति चाही। मैंने गंभीरता से सिर हिलाते हुए सामने पड़ी कुर्सी की ओर इशारा किया। उसने कंधे से पर्स उतारा और साड़ी संभालते हुए बैठ गई। फैलती परफ्यूम की भीनी सुगंध के बीच उसने दबी हुई मीठी जुबान से कहा, ‘आप बहुत देर से आए…!’
हालांकि कहा उसने शालीनता से था, लेकिन मुझे शिकायत-सी लगी। मैंने निरपेक्ष भाव से उसे देखा। उसने आधा सिर ढंक रखा था, उसकी मांग में हल्का सा सुहाग-चिह्न था। माथे के बीचोंबीच खूब चौड़ी बिंदी थी। चेहरे के रखरखाव से लगता था कि वह सौंदर्य के प्रति सजग है। मेरे निरपेक्ष भाव को शायद उसने महसूस कर लिया था। तुरंत बात संभाली, ‘दरअसल, मैं बहुत देर से आपका इंतजार कर रही थी।’
‘क्यों… ऐसा कौन-सा काम था!’
‘काम आप ही से था।…’ वह बाहर की तरफ देखने लगी। जैसे आश्वस्त होना चाहती हो कि उसकी बात कोई सुन तो नहीं रहा है।
उसने अपना नाम सुतापा बताया और बताया कि लखनऊ की रहने वाली है। यहां बैंक में पति के साथ उसका ज्वाइंट एकाउंट है। पति फौज में हैं। आजकल पोस्टिंग ऐसी जगह पर है, जहां फेमिली नहीं रखी जा सकती। इसलिए आजकल यहीं गांव में रह रही है, अपनी ससुराल में। मकान है, थोड़ी-सी जमीन है उसके पति के हिस्से में। अकेली रहती है। सास हैं, पर वे जेठ-जिठानी के साथ रहती हैं। अलग।
पेपरवेट घुमाते हुए मैं उसकी बातों का आशय समझने की कोशिश कर रहा था। इन व्यक्तिगत बातों से मुझे क्या लेना-देना! एकाएक उसने बात बदली, ‘पता चला है कि आपको बैंक आने में अक्सर देर हो जाती है। आप कानपुर से आते है!’
मुझे फिर लगा कि शिकायत कर रही थी। मैंने सफाई-सी दी, ‘हां, कानपुर से ही आना पड़ता है। बस खराब हो जाने से आज कुछ ज्यादा ही देर हो गई।’
‘ओह!’
मैं चुप रहा।
‘कानपुर से तो रोज-रोज आने-जाने में बहुत तकलीफ होती होगी? सीधी बस भी नहीं है, यहां तक की।’ उसका कोमल स्वर सहानुभूति में डूबा हुआ था।
‘हां, तकलीफ तो होती है। सुबह सात बजे के पहले घर से निकलना पड़ता है। राजपुर में बस से उतरता हूं। फिर वहां रखी अपनी मोटरसाइकिल से बैंक पहुंचता हूं। फिर भी समय से नहीं पहुंच पाता। रास्ता खराब है। कभी सोचता हूं, गांव में ही रहने लगूं या फिर राजपुर में ही आवास बना लूं। पर वह भी एक गांव ही है, बड़ा-सा। मच्छर बहुत हैं। बिजली भी नहीं रहती।’
उसने तपाक से कहा, ‘अगर आप चाहें तो मेरे मकान में रहने लगें। पक्का मकान है। नया है। दो साल पहले ही बना है। एक कमरा आपको दे देंगे। रोज-रोज आने-जाने की झंझटों से आप बच जाएंगे।’
मेरी समझ में आ गया कि अपना मकान किराए पर देने की बात करने आई है। वह मकान मालकिन अच्छी तो हो सकती थी, लेकिन गांव इस लायक नहीं था कि रहा जा सके। मैंने साफ मना कर दिया कि नहीं, मेरी पत्नी दिल्ली की है, उसे गांव में रहना पसंद नहीं। मैं उपेक्षा से मेज पर रखे कागज पलटने लगा।
‘कोई बात नहीं सर। मैं जिस काम के लिए आपका इंतजार काफी देर से कर रही थी, उसे सुन लीजिए और मेरी सहायता कीजिए।’
मैंने उसे प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा। उसने चौकन्ना होकर यहां-वहां फिर देखा और बोली, ‘मैं आपके पास एक उम्मीद से आई हूं।’
‘क्या?’
‘आप मेरे जेवर बैंक की तिजारी में रख लीजिए… सिर्फ आज रात भर के लिए। कल मैं लखनऊ जाकर अपनी मां के पास रख आऊंगी।’ उसने पर्स पर हाथ फेरते हुए कहा।
‘यहां लॉकर की सुविधा नहीं है, जेवर तो लॉकर में रखे जाते हैं।’
‘जानती हूं… फिर भी आप तिजोरी में रख सकते हैं।’ उसने बड़े विश्वास से कहा।
‘नहीं रख सकते।’
‘आप चाहें तो रख सकते हैं।’ उसने मुस्कारते हुए कहा, ‘मेरे मौसाजी सुल्तानपुर के एक गांव में बैंक मैनेजर हैं, वे मौसी के जेवर जब कभी बैंक की तिजोरी में रख लेते हैं।’ और, आस भरी निगाह से मेरे चेहरे पर निगाह टिका दी। उसके चेहरे पर मंद मुस्कान ठहरी थी।
‘मैंने कहा न कि बैंक की तिजोरी में जेवर नहीं रखे जा सकते।’ न चाहते हुए भी
मेरे स्वर में हल्की-सी कठोरता आ गई थी।
मेरी अडिगता देख वह बोली, ‘आप मेरी समस्या नहीं समझ रहे हैं। मेरी सास और जेठ-जिठानी मुझसे जलन रखते हैं। वे मेरे घर में डकैती डलवा सकते हैं, मुझे लुटवा सकते हैं। जेठ की नादान लड़की से ऐसी भनक लगी है।’
उसका स्वर धीमा होते हुए फुसफुसाहट में बदल गया था।
‘बैंक की तिजोरी में जेवर रखने का प्रावधान नहीं है। आप कृपया ऐसी कोई उम्मीद न करें।’ मैंने विनम्र होने की भरकस कोशिश की।
‘आप यहां के गांव-घर की राजनीति नहीं समझते मैनेजर साहब। यह डकैतों का इलाका रहा है। आज भी छिटपुट डकैत हैं। यहां के लोग उनसे थोड़े-बहुत संबंध रखते हैं। मौका आने पर अपने वाले ही अपनों को लुटवा देते हैं। आप दया करके मेरी सहायता करें… प्लीज।’
उसकी अति विनम्रता मुझे असहज कर रही थी। मैं उसकी बातों में आऊं, उसके पहले मैंने अपना ठोस निर्णय प्रकट कर दिया, ‘सॉरी।’
और, चपरासी को बुलाने के लिए टेबल पर रखी घंटी बजा दी। उससे छुटकारा पाने का यही तरीका मुझे ठीक लगा था। स्पष्ट हो चुका था कि बात खत्म। उसके चेहरे पर भय की लकीरें एकाएक उभरने लगीं। वह खड़ी हो गई और लगभग रुंआसे स्वर में बोली, ‘आज आप बहुत देर से आए हैं। अगर ठीक समय पर आते तो आपका फैसला जल्दी पता चल जाता। मैं लखनऊ निकल जाती। अफसोस! अब तो बहुत देर हो चुकी है…।’
एक तरह से उसने सारा दोषारोपण मुझ पर कर दिया था। मैं अवाक था। बुरा-सा मुंह बनाती हुई वह चली गई। मुझे आशंका हुई, मेरे देर से आने की शिकायत उच्च अधिकारियों से कर सकती है। पढ़ी-लिखी है।
बाद में उसकी समस्या के बारे में मैं गंभीरता से सोचता रहा। कहीं उसके साथ दुर्घटना हो गई तो! मेरे भीतर पश्चाताप-सा उठता रहा। मेरी वापसी का समय हो चला था। मैं चला आया। रात में उसका भयग्रस्त चेहरा मुझे याद आता रहा। मेरे अवचेतन में अपरिपक्व सा निर्णय था- जोखिम उठाया जा सकता था… सिर्फ एक रात की बात थी। गांव की शाखा में कौन पूछता है!
दूसरे दिन जब बैंक पहुंचा तो पता चला कि रात में उसके यहां डकैती पड़ गई। सिर्फ जेवर लूटे गए हैं। मैं बेचैन हो उठा। एक स्थानीय स्टाफ को साथ लेकर उसके घर गया। वह लुटीपिटी बैठी थी। एकदम उदास। मुझे देखते ही वह सुबक पड़ी। घुटे स्वर में उसने कहा, ‘अगर कल आप मेरी विनती सुन लेते तो आज यह देखने आपको आना नहीं पड़ता…।’
मैं चुप था। बड़ी मुश्किल से इतना ही कह सका, ‘बैंक की तिजोरी में जेवर रखने का नियम नहीं है।’
‘नियम तोड़े भी जा सकते थे। क्या आपके बैंक में सारा काम नियमों से ही होता है!… आप किस नियम के तहत देर से बैंक आते हैं?’
मुझसे कुछ बोलते नहीं बना। उसने मुझे लज्जित कर दिया था। मेरे भीतर एकाएक घुमड़ा- काश! मैं नियमों का उल्लंघन कर लेता!

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