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कहानी: नहीं तो!

तीन बेटे हैं जगन के। रतन चौदह साल का, कन्हैया और बंसी दोनों नौ बरस के, जुड़वां हुए थे। तीनों मिल के स्कूल जाते हैं। पढ़ाई में जैसे भी हैं, लेकिन नंबर ले आते हैं। इसके बहुत से रास्ते हैं। तीनों नकल टीप में तेज है। उन्हें इतनी अकल है कि काम ऐसे करें कि अगर मास्टर की नजर पड़ भी जाए तो अनदेखा कर देने का मौका हो।

Author Published on: March 11, 2018 2:46 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अशोक गुप्ता

पाली खत्म होने की खबर देता हुआ मिल का सायरन चीखने लगा। जब सायरन बजता है, चारों ओर की हवा थरथरा उठती है, पेड़, पत्ते और परिंदे तक कांप जाते हैं। इस आवाज से चार किलोमीटर दूर बसा जगन का घर भी कांपता है। घर, घर के चार लोग, यहां तक कि रसोई के बर्तन भांडे तक। यह थरथराहट देर तक बनी रहती है, विस्फोट होने तक। जगन मिल में मशीन मैन है। चुस्त और अपने काम में माहिर। यारबाशी में कम नहीं, लेकिन दबंगियत में भी इक्कीस ठहरने वाला जवान। इसलिए संगी-साथी जुड़े भी रहते हैं और संभल कर दूरी भी बरतते हैं। जगन हाथघड़ी देख कर दूसरों से पांच मिनट पहले अपनी मशीन बंद करके साफ करता और सायरन बजने पर गेट से निकलने वालों में आगे ही रहता है। मिल के गेट से जगन का घर है तो बस बीस-पच्चीस मिनट की दूरी पर, लेकिन उसका लौटना अपने समय से ही होता है। उसे बीच रास्ते में कलारी पर भी रुकना होता है। कलारी खड़ी ही रहती है बीच रास्ते अपना घाघरा उठाए, कोई पार निकल कर जाए भी तो कैसे? मिल से निकल कर कलारी पर बहुत लोगों का हुजूम ठहरता है। यह बातचीत का अड्डा भी है और मिल तथा घर के बीच बना एक आरामगाह भी। कुछ लोग यहां से अपना कोटा लेते हैं और चल देते हैं कि घर पहुंच कर, नहा-धोकर आराम से आनंद लिया जाएगा। कुछ वहीं बैठ कर पीते और आधे घंटे की यारी निभा कर चल देते हैं। पर जगन अलग है। उसका कोटा तय नहीं है, उसका मूड ही उसका कोटा है। वह वहीं बैठ कर पीता है। वह पीते समय कलारी से चखना नहीं खरीदता, मिल की कैंटीन से ही समोसे या आलू बोंडे लेकर चलता है। वह सयाना आदमी है, जितने में कलारी एक पैकेट नमकीन देगी उतने में तो जगन कैंटीन से चार समोसे उठा लेगा। तबियत भर टुन्न होना उसे आता है और उसकी तबियत के आगे किसी का जोर नहीं चलता… शायद उसका खुद का भी नहीं। जगन करीब घंटा बिता कर घर पहुंचेगा। घर का दरवाजा खुला मिलेगा, फिर भी वह दरवाजे पर लात की ठोकर देगा। हाथ का झोला टिफिन थामने कोई न कोई बच्चा आगे आएगा। वह अपनी आंख की लपट से उसे झुलसा देगा। अगर पत्नी सामने पड़ गई तो उसे धकियाएगा। रात सोने तक कोई न कोई उपक्रम ऐसा जरूर रचेगा, जो उसके हाथ पत्नी पर उठें… अपवाद का शायद ही कोई दिन होता हो।

तीन बेटे हैं जगन के। रतन चौदह साल का, कन्हैया और बंसी दोनों नौ बरस के, जुड़वां हुए थे। तीनों मिल के स्कूल जाते हैं। पढ़ाई में जैसे भी हैं, लेकिन नंबर ले आते हैं। इसके बहुत से रास्ते हैं। तीनों नकल टीप में तेज है। उन्हें इतनी अकल है कि काम ऐसे करें कि अगर मास्टर की नजर पड़ भी जाए तो अनदेखा कर देने का मौका हो। रतन खिलाड़ी है और छोटे दोनों भाई अच्छा गाते हैं, तो स्कूल की प्रार्थना वही कराते हैं। मिल के अधिकतर कामगार थोड़ा-बहुत पियक्कड़ जरूर हैं। इसलिए कोई किसी को बेवड़ा कह कर नहीं छेड़ता। अलबत्ता दिलपत इसका अपवाद है। वह पीता नहीं। वह बुजुर्ग-सा आदमी है। सबका दोस्त है, सो जगन का भी है है, लेकिन वह जगन को उसकी पियक्कड़ी के लिए अक्सर समझाया-बुझाया करता है। कॉलोनी के बच्चों से भी वह अपनापा महसूस करता है। उन्हें बे-रास्ते जाते देख कर टोकना और खुश होकर उन्हें चॉकलेट दे देना उसका मिजाज है। मिल की कॉलोनी में वह अपनी पत्नी के साथ रहता है। वह टाइम आॅफिस में क्लर्क है और उसका बेटा शहर में एक कंपनी में काम करता है और वहीं के क्वाटर में अपने परिवार के साथ रहता है। दलपत परिवार के महीने में तीन-चार दिन अपने बेटे के पास जरूर गुजरते हैं। उसकी जिंदगी मस्त बीत रही है। वह बिना पीए ही मगन रहने वाला जीव है। पता नहीं क्यों, जगन का हाल अपने घर में एक आतंक के साए की तरह है, जबकि बाहर उसकी दबंगियत है जरूर, लेकिन इतनी नहीं कि लोग उसके साए से भी बचना पसंद करें। इसका कारण कौन जाने, लेकिन शायद उस पर अपने बाप की परछार्इं है। उसका बाप भी इसी मिल में मुकद्दम था, जबरदस्त पियक्कड़… जगन ने भी अपनी मां को अपने पिता के हाथों पिटते देखा है, लेकिन उस पर अपने बाप की रौबदार तस्वीर ज्यादा असर कर गई। जो भी हो, अब न जगन का बाप जिंदा है, न ही उसके बच्चों ने अपनी याद भर अपने दादा-दादी को देखा है। है तो बस उनके घर में हर शाम, पाली खत्म होने पर सायरन का बज कर थरथराहट का मंजर पैदा करना और विस्फोट में उनकी आंखों के आगे उनकी मां का पिटना, मां का रोते-सिसकते रसोई में रोटी पकाना और बाप का राक्षसी खर्राटों के साथ सो जाना। इस क्रम में वे बच्चे, रात को मां की सिसकन के साथ पिता की पलंग तोड़ चरमराहट का अर्थ समझने के लिए भी समय से पहले सयाने हो गए हैं। इसका भी एक आक्रोश उनके भीतर है, जो बूंद-बूंद भरता जा रहा है। हर आक्रोश की एक उम्र होती है और उसके बाद वह क्या सूरत अख्तियार करता है, यह पहले से तय नहीं किया जा सकता। दरअसल, आक्रोश का कोई एक तय प्रारूप होता भी नहीं। वह कुंठा, भीतर से उपजा असहाय भाव या भय के रूप में भी उभर सकता है, और सबसे कठिन होता है यह अंदाजा लगा पाना कि भीतर का कौन-सा मनोभाव मनुष्य के किस व्यवहार शिल्प में बदल कर सामने आएगा और कब आएगा?

बच्चों के भीतर भी अनेक मनोभाव उथल-पुथल मचाए हुए थे। यह स्पष्ट नहीं था कि आवेग कब किसके विरुद्ध निकलेगा। उस दिन इतवार था। जगन सुबह-सुबह अपनी साइकिल में कुछ मिस्त्रीगीरी कर रहा था। नाश्ता देर से ही सही, दस बजे तक निपट गया था। रतन की मां का इरादा शाम को दाल के मुगौड़े बनाने का था और उन्होंने बच्चों को कुछ सामन लेने बाजार तक दौड़ा दिया था। उत्साह में तीनों बच्चे साथ-साथ निकले थे। सामान लेकर लौटते समय उन्हें एक पड़ाव ने थाम लिया। कन्हैया और मुरारी के कुछ साथी सड़क के किनारे मिट्टी और रेत के ढेर को एक दूसरे पर उछालने का खेल खेल रहे थे। उनकी ललकार पर ये तीनों भी इस मस्ती भरे खिलवाड़ में शामिल हो गए। सामान का थैला उन्होंने एक ठिकाने ढंग से लटका दिया। तभी सड़क से दलपत का गुजरना हुआ। मिट्टी और रेत की गुबार सड़क तक उड़ रही थी। उन्होंने बच्चों को ठहर जाने को कहा, पर पुकार अनसुनी रह गई। कुछ रेत उनके कपड़ों पर गिरी। दलपत खुद को कॉलोनी के सब बच्चों के नानू-दादू मानते थे और अपने मन से उन्हें कुछ भी कह देने का हक रखते थे। उस समय उनके सामने जगन के तीनों बच्चे ही अगुआ थे, भले कुल माहौल में पांच-छह बच्चे थे। पता नहीं किस आवेग में दलपत के मुंह से निकल पड़ा, ‘अरे, बेवड़े की औलादों कुछ तो ढंग सीखो। बड़े हो रहे हो।…’ संवाद सुन कर यकायक रतन के कान सनसना आए। वह तमक कर दलपत के सामने खड़ा हो गया। उसके दोनों भाई भी सचेत होकर उसके दाएं-बाएं आ गए, ‘बेवड़ा किसको बोला? बोल, किसे बोला बेवड़ा?’ रतन की आवाज तेज थी, लेकिन दलपत कुछ समझ नहीं पाया।
‘और किसे बोलूंगा? तेरे बाप को…’ दलपत का वाक्य उसके मुंह में ही रह गया। कन्हैया ने आगे बढ़ कर दलपत को एक धक्का दिया और रतन का एक तेज मुक्का दलपत की नाक पर बैठा और उसकी नाक खून छोड़ने लगी। खून देख कर मुरारी कुछ सहमा। मुक्के की चोट से दलपत का चश्मा एक ओर गिर गया था। इस बीच दलपत की रुलाई फूट पड़ी। उसके रुदन में चोट का नहीं, आघात का दर्द था। उसके आंसू बह रहे थे। रतन अब भी जोश में था, ‘खबरदार जो मेरे पिता जी के बारे में आगे से कुछ कहा… नहीं तो हम तुम्हें सुधार कर रख देंगे।’

इस बीच मुरारी ने दलपत का चश्मा उठा कर उसे थमा दिया। शायद तीनों के चेहरे पर दलपत का खून और आंसू देख कर एक अलग मनोभाव तैर आया था, जिसे वे खुद भी समझ रहे थे। पता नहीं इस इबारत को दलपत ने कैसे पढ़ा और वह बोल उठा, ‘सुधार सको बेटा तो अपने बाप को सुधारो, नहीं तो…’
इस बीच साथ के दूसरे बच्चे गदबद भाग खड़े हुए, लेकिन खबर तो उनकी मुट्ठी में बंद ही हो चुकी थी कि जगन के छोरों ने दलपत चाचा को कूट दिया।
अपनी बात कह कर दलपत घूमे और सहजता से वापस अपनी राह चल पड़े। बच्चों ने भी अपना थैला उठाया और चुपचाप घर की ओर बढ़ने लगे। वे धूल से सने हुए थे। घर पहुंच कर उन्होंने आनन-फानन में थैला मां को थमाया और नहाने चल दिए। जगन तब तक नहा कर बाहर आ चुका था।
कुछ दिन बीते, एकदम बेआवाज, जैसे कुछ घटा ही न हो। जगन ने भी इस मामले में बच्चों से कोई सवाल-जवाब नहीं किया। दैनंदिन यथावत चलती रही। बच्चों की भी और जगन की भी। बच्चे इस बीच भीतर ही भीतर इस प्रसंग को मथते हुए लोट-पोट होते रहे।
फिर एक दिन अनाम आक्रोश के आवेग ने नई करवट ली। जगन पाली खत्म करने के बाद हमेशा की तरह झूमते-उबलते घर की चौखट पर पहुंचा। उसने खुले दरवाजे पर लात जमाई तो दरवाजे की दूसरी तरफ से एक लात रतन की पड़ी। उसकी आंख में जैसे अंगारे तप रहे थे। वह गरजा, ‘सुनो बापू, आज से ये दारू पीकर हिलते-डुलते आना बिल्कुल बंद, और मां पर हाथ तो भूल कर भी मत उठाना।…’ रतन की गरज सुन कर उसके दोनों भाई आजू-बाजू आकर खड़े हो गए।
जगन पहले भौंचक हुआ, फिर उसका स्वभावगत आक्रोश उस पर हावी होने लगा। आदतन, उसके मुंह से उसका अक्सर बोले जाने वाला वाक्य निकला, ‘नहीं तो?’
‘नहीं तो हम तीनों भाई मां को लेकर इस घर से निकल जाएंगे और रेलवे लाइन के पार कूड़ा बीनने वालों के बीच झुग्गी बना कर बस रहेंगे… और जानते हो, जब कभी तुम हमें रस्ते चलते मिल जाओगे तो हम तुम्हें बापू नहीं कहेंगे, ताली बजा बजा कर कहेंगे, बेवड़ा… बेवड़ा… बेवड़ा।’ फिर सचमुच ताली बजा कर तीनों भाइयों का कोरस शुरू हो गया और कुछ देर हवा में गूंजता रहा। जगन चुपचाप वहां से हटा और अपने कमरे की ओर बढ़ लिया। रात भर उसके कान में अपने बच्चों का यह कोरस गूंजता रहा, जो उसके भीतर एक दर्द भी भर रहा था और बेतरह आक्रोश भी। सुबह वह देर तक सोया रहा। मिल जाने का उसका मन नहीं हुआ। बिस्तर में पड़े-पड़े वह पता नहीं क्या-क्या गुनता रहा। जब वह उठ कर बाहर आया तो उसके बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें देख कर उससे रहा नहीं गया। उसने रतन को आवाज दी और पल भर में रतन के साथ कन्हैया और मुरारी उसके साथ आकर खड़े हो गए। ‘सुनो रतन, मेरा यह पीकर आना तो बंद नहीं हो सकता… आसान नहीं है।’ उसकी आवाज में एक बेबस-सी थी, जिसे रतन ने पढ़ा और अपना तेवर उसी अंदाज में तैयार किया। ‘… लेकिन मां पर हाथ उठाना तो हर हाल में आज, अभी से बंद करना होगा। कोई समझौता नहीं।’ रतन की आवाज कड़क थी, जो उसके मनोबल की साफ गवाही दे रही थी। उसके साथ खड़े दोनों जुड़वां भाई भी रतन के जवाब के साथ एक कदम आगे बढ़ आए थे। इस नजारे ने जगन को बेकाबू कर दिया। उसे कोई और जवाब नहीं सूझा, और वह बोल उठा, ‘नहीं तो…?’ ‘नहीं तो, तुम अकेले हो और हम तीन हैं। हम तीनों का एक होना क्या होता है, वह तुम अभी समझ नहीं सकते। वैसे गनपत ने बताया होगा अपना हाल।…’
सुन कर जगन सन्न रह गया। उसकी आंख के आगे गनपत की सूजी हुई लाल नाक, और उसके बहते आंसू आ गए। उसकी आंखें फैल गर्इं और वह रतन के चेहरे पर जा टिकीं। रतन की नजर अब भी जगन की आंखों को बेधती हुई उसके चित्त तक पहुंच कर मंथन रच रहीं थीं। बेताब हो गया जगन और उसका मन किया कि वह वहां से उठ कर भागे और कहीं जा कर छिप जाए, लेकिन उसकी टांगों में इतनी ताकत कहां बची थी जो वह अपनी जगह से हिल भी सके। यह शायद वक्त के ठहर कर रास्ता बदलने का संकेत था।

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