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कहानी: फैसला

प्रमोद सर अभी आखिरी सीढ़ी उतरे भी नहीं थे कि दफ्तर का चपरासी विष्णु झटपट कह कर चला गया, ‘सर जाइए, प्रिंसिपल साहब आपको अभी, इसी वक्त बुला रही हैं। बहुत अर्जेंट है।’ इस फरमान को सुन कर प्रमोद सर तेजी से स्टाफरूम में गए, अपने हाथ की किताब-कॉपियां अपनी सीट पर रखीं; उसी तेजी से दफ्तर की ओर भागे। दरवाजे पर दस्तक देकर अंदर प्रवेश कर गए।

सुरेश शॉ

प्रमोद सर अभी आखिरी सीढ़ी उतरे भी नहीं थे कि दफ्तर का चपरासी विष्णु झटपट कह कर चला गया, ‘सर जाइए, प्रिंसिपल साहब आपको अभी, इसी वक्त बुला रही हैं। बहुत अर्जेंट है।’ इस फरमान को सुन कर प्रमोद सर तेजी से स्टाफरूम में गए, अपने हाथ की किताब-कॉपियां अपनी सीट पर रखीं; उसी तेजी से दफ्तर की ओर भागे। दरवाजे पर दस्तक देकर अंदर प्रवेश कर गए। लेकिन प्रिंसिपल महोदया ने जब उन्हें एक खाली पड़ी कुरसी पर बैठ जाने का इशारा किया, तब वे घबरा उठे। वहां प्रिंसिपल के अलावा वाइस प्रिंसिपल, चेयरमैन और प्रबंधन के कई अन्य अधिकारी भी मौजूद थे। प्रमोद सर मन ही मन सोचने लगे, क्या हो गया, जो मुझे इनके बीच बैठने को कहा जा रह है! यों सोचने को प्रमोद सर कुछ न कुछ सकारात्मक भी सोच सकते थे: सोच सकते थे कि उनका प्रमोशन होने वाला है, उन्हें कोई अवार्ड मिलने वाला है, प्रबंधन उनको विदेश यात्रा पर भेजने वाला है आदि। पर नहीं, वे नकारात्मक विचारों में डूब गए और मन में असंख्य बुरे खयालों को लेकर बैठ गए। इसका नतीजा यह हुआ कि एक अदृश्य मकड़-जाल ने उन्हें धीरे-धीरे अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया।
प्रमोद सर के कुरसी पर बैठने भर की देर थी कि प्रिंसिपल साहिबा ने उनसे छूटते ही पूछा- ‘क्या आपको क्लास सेवन ‘ए’ के फिराद आलम शाह ने कभी गाली दी थी?’
एकाएक पूछे गए इस सवाल ने प्रमोद सर को बीते समय में घटी कई घटनाओं को याद करने के लिए बाध्य किया। एक अंतराल के बाद वे सहज होकर मुद्दे को संतुलित करने की गरज से बस इतना ही बोले, ‘छोड़िए मैडम, वह अभी बच्चा है! अगर उसमें बुद्धि होती, तो वह हम टीचारों को थोड़े ही सताता या शैतानियां करता! उसे कहां पता कि…।’
पर मैडम ने प्रमोद सर के मुंह पर उस सवाल को (किसी बॉल की तरह) उछालते हुए दुबारा पूछा, ‘नो सर, सिंपली यू लेट अस नो कि क्या उसने आपको गाली दी? दी कि नहीं दी?’
प्रमोद सर इसके पहले कि अपना मुंह खोलते, प्रबंधन के एक सदस्य मिस्टर जेरम थॉमस फूट पड़े। बोले- ‘मिस्टर पटेल वी हैव नो फालतू टाइम, कम टू द प्वाइंट फास्ट, ऐंड…।’
प्रमोद सर को समझ में नहीं आ रहा था कि वे ऐसा क्या कहें कि वह बच्चा किसी आफत में न फंसे और मैडम उसकी हर गलती को माफ कर दें।
‘जी मैंने अपने कानों से उसे गाली देते नहीं सुना।’ उन्होंने एक सीधा-सा जवाब दिया।

‘बट अदर चिल्ड्रेन आर सेइंग दैट उसने आपको गाली दी और उसके बदले में आपने उसको ‘कुत्ते का बच्चा कहा।’
फिराद ने प्रमोद सर तो क्या, अपनी कक्षा में आने वाले किसी भी टीचर को आज तक बख्शा नहीं था। उसने सबके के साथ कुछ न कुछ बदमाशियां जरूर की थीं- किसी पर चॉक का टुकड़ा फेंका था, तो किसी पर कागज का गोला। कभी हल्ला मचाया था, तो कभी गीत गा-गाकर डेस्क को पीटा था। बावजूद इन सबके उसकी इन कारगुजारियों के बदले किसी टीचर ने उसे कभी कुछ समझाया-बुझाया भी न था। उस कक्षा में आने वाले शिक्षक-शिक्षिकाएं आते, पढ़ाते, परंत उसे नजरअंदाज करके चले जाते। अगर कोई शिक्षक उसके व्यवहार से काफी तंग हो जाता तो उसकी डायरी में लिख कर उसके मां-बाप को बुलाता। पर उन्हें बुलाए जाने पर भी कभी कोई आता, कभी नहीं आता। यानी यहां शिकायती कारोबार ज्यादा चलता, सुधारने का काम बिल्कुल नहीं। उसे सुधारने का मतलब, एक बहुत बड़ा जोखिम उठाना था और यह जोखिम भला कौन उठाता? इसलिए वे आते औरों को पढ़ाते उसे डांटते या डायरी में टिप्पणी लिखते और घंटी बजते ही क्लास से निकल पड़ते।
वैसे डराने को प्रमोद सर ने भी फिराद को एक-दो दफा यों ही डराया था। उसके पिताजी से शिकायत करने की बात भी कही थी, लेकिन फिराद की डायरी में उन्होंने आज तक कोई टिप्पणी दर्ज नहीं की थी। बेशक उन्होंने उसे बुला कर कई बार प्यार से समझाया था कि कक्षा में शैतानियां करके वह खुद का ही नुकसान कर रहा है! इन्हीं बातों के चलते वह आजकल प्रमोद सर को थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था और शायद इसीलिए उनकी क्लास में अब वह शांत रहने की कोशिश भी करने लगा था।
मगर प्रिंसिपल महोदया के तथाकथित चहेते-चहेतियों की सिफारिश इतनी तगड़ी थी कि उन्होंने उसे उसकी अनुशासनहीनता के चलते स्कूल से बाहर करने का मन बना लिया था। पर चूंकि वह समाज के किसी खास समुदाय का एक बच्चा था और जिसके विद्यालय से निकाले जाने पर सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने का खतरा था, इसलिए प्राचार्या ने एक तीर से दो निशाने साधने की योजना बनाई थी।

एक निशाना तो फिराद था, दूसरा स्वयं प्रमोद सर। उन्हें तब याद हो आया कि अतीत में प्रिंसिपल साहिबा के साथ कभी उनके किए गए रूखे व्यवहार को आज (एक तरह से) एक दुर्व्यवहार की संज्ञा देकर परोस दिया गया है। जाहिर है कि इसके दुष्प्रचार में प्रमोद सर के सहकर्मियों ने ही बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।
दरअसल, जब वे नई-नई आई थीं, तब सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं ने मिल कर उनकी हर बात का तमाशा बनाना शुरू कर दिया था। पुरुषों को लगता कि यह महिला होकर हमें आंख दिखाती है; महिला शिक्षिकाओं को लगता कि उनसे वे ज्यादा अनुभवी और योग्य हैं फिर भी एक बाहर वाली प्रिंसिपल की कुरसी पर आकर बैठ गई! वे बुदबुदाया करतीं- ‘मनहूस, न जाने कहां से आकर हमारा हक छीन ले गई।’
ऐसे में इन दोनों वर्ग विशेष के पढ़े-लिखे लोगों ने लामबंद होकर हर दशा में प्राचार्या को तंग करने, उनके हर काम में असहयोग करने और उन्हें लुलुआने के नित नए तरकीब ढूंढ़ने लगे।
लेकिन प्रमोद सर इनसे बिल्कुल अलग खयाल के आदमी थे। वे अपने नगर से प्रकाशित एक हिंदी-समाचार पत्र के घोषवाक्य ‘अखबार नहीं आंदोलन है’ में से ‘आंदोलन’ शब्द को पढ़ कर उसे हमेशा जेहन में रखते और बुनियादी जरूरतों के मद्देनजर यहां एक अर्थपूर्ण आंदोलन चलाना चाहते। वे यह कदापि नहीं चाहते कि किसी व्यक्ति विशेष की योग्यता-अयोग्यता की आलोचना की जाए, बल्कि चाहते थे कि कुछ ठोस काम किया जाए। उनकी मांग थी कि बच्चों के लिए एक कैंटीन खुले, पीने के लिए साफ पानी मुहैया कराया जाए, लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय की व्यवस्था हो और स्कूल के बाहर-भीतर दस गज जमीन की साफ-सफाई का समुचित खयाल रखा जाए। साथ ही सभी कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन दिया जाए।
एक बात और थी कि इस विद्यालय में लगभग पच्चीस प्रतिशत गुजराती भाषाभाषी विद्यार्थी थे, जबकि उन्हें पढ़ाने वाला एक अकेला शिक्षक प्रमोद पटेल थे। एक तो वेतन कम, काम ज्यादा; ऊपर से हमेशा उन्हें अपने हाथ जोड़ कर नकलची अंग्रेजों के पीछे-पीछे घूमना पड़ता था। उधर उनके सहकर्मी ऐसा न कुछ सोचने की जरूरत समझते थे, न कुछ करने की। बल्कि इधर का उधर लगाना-बुझाना, हंसी-ठट्ठा करते फिरना, दारू-सिनेमा विषय पर गप्पे हांकना और मालिकों के आगे दुम हिलाना ही उनका महत्त्वपूर्ण कार्य था।
लेकिन इस बार जब वहां की शिक्षक-शिक्षिकाएं एकजुट होकर प्रिंसिपल के विरुद्ध कोई खेल खेलने की तैयारी में लग गए, तो प्रमोद सर उस खेल का हिस्सा बनने को कतई राजी नहीं हुए। वे इन प्रपंचों की जगह वास्तविक समस्याओं के खिलाफ खड़ा होने की राय सुझाते रहे, बच्चों की सहूलियत मिलवा देने पर जोर डालने की बातें करते रहे, पर दूसरों को यह मंजूर कहां था!

पर उपस्थित समय में वहां की शिक्षक-शिक्षिकाओं की एकता और गठजोड़ को देख कर प्रबंधन ने भी पूरी तरह कमर कस ली और प्रिंसिपल के साथ आ खड़ा हुआ, ताकि स्कूल का माहौल पहले की तरह बिगड़ न जाए। यह देख शिक्षक-शिक्षिकाओं ने धीरे से अपना रंग बदल लिया। फिर भी किसी न किसी को तो इसका जिम्मेदार ठहराना था, सो इसका पूरा दोषी प्रमोद सर के सिर डाल दिया गया, क्योंकि उनका आंदोलन आज भी मुखर जो था।
दरअसल, शहर के इस ‘लॉर्ड इंस्टीट्यूशन’ में अब तक जितने भी प्रिंसिपल पदासीन होते आए थे, वे सभी पुरुष थे और स्वतंत्र रूप से अपने-अपने हिसाब से इसे चलाते थे; क्योंकि प्रबंधन को सिर्फ आमदनी से मतलब रहता था। पर इस बार प्रबंधन ने जब बहुत कम वेतन में एक महिला प्रिंसिपल को संस्था का प्रमुख बनाया, तो उनके साथ हमेशा खड़ा रहना भी अपना कर्तव्य समझता है। उधर प्रबंधन में कुछेक पढ़े-लिखे तरुण सदस्य भी शामिल हुए हैं, जो बेशक नए ढंग से काम करना चाहते हैं। उन्हीं में से किसी एक आधुनिक खयालों वाले सदस्य की सिफारिश पर नई प्रिंसिपल की नियुक्ति हुई थी। इन वजहों से भी प्रबंधन का दायित्व बनता था कि वह उनके साथ रहे और पूरा-पूरा सहयोग करे।
‘आप यस आॅर नो में जवाब दीजिए कि आपने फिराद को गाली दी या नहीं?’
‘जी नहीं, मैं किसी भी बच्चे को कभी गाली नहीं देता!’ प्रमोद सर ने सफाई दी।
‘दी या नहीं? सर आप यस आॅर नो बोलिए, बस।’ प्रबंधन के सचिव मि. जॉर्डन उनको अचानक डपटते हुए बोले। ‘क्योंकि आपने अभी-अभी कहा कि वह अभी बच्चा है, टीचर्स को परेशान करता है, उसको क्या पता कि गलती क्या होती है… एटसेट्रा एटसेट्रा।’

‘जी मैंने उसे कोई गाली नहीं दी।’ प्रमोद सर अब इतना भर साफ-साफ कह कर मामले पर विराम लगवाना चाहते थे। पर उधर प्रिंसिपल महोदया और प्रबंधन के दो-एक सदस्य ऐसे थे कि शह-मात के इस खेल को और लंबा करके किसी भी हाल में जीत अपने नाम दर्ज कराना चाहते थे। ऐसे अवसरों पर प्राय: भेड़ों की तरह इकट्ठा होकर सारे लोग सियार-मंत्र का जाप करने लगते हैं, सो वहां उपस्थित सभी सदस्य एक साथ हुआं-हुआं करके अपनी एकता का परिचय देने लगे।
उधर जब प्रिंसिपल साहिबा ने अपने बेशकीमती चश्मे के भीतर से उपप्राचार्या को बोलने का इशारा किया तो श्रीमती चंदा सोम कहने लगीं- ‘यू नो मिस्टर पटेल, मैंने खुद इस बात की जांच की है। आॅल स्टूडेंट्स हैज गिवेन इन राटिंग दैट पहले फिराद ने आपको गाली दी, फिर आपने उसको ‘कुत्ते का बच्चा’ बोला।
वैसे प्रमोद सर को लगता था कि सोम मैडम यहां की पुरानी स्टाफ हैं, साथ काम करती रही हैं; तो उनके खिलाफ नहीं जाएंगी। परु तभी याद आया कि, नहीं-नहीं, यह भी तो उसी ‘भद्र मंडली’ की एक सदस्य रह चुकी हैं, जो बिन पेंदी के लोटे की तरह सुविधानुसार जब-तब लुढ़क पड़ती हैं।
असल में श्रीमती चंदा सोम प्रबंधन के उपसचिव मि. अल्बर्ट की पसंदीदा कैंडिडेट रही हैं, जिन्हें आजकल वाइस प्रिंसिपल बनाया गया है। श्रीमती सोम को यह पद एक तरह से उपहार स्वरूप या यों कहें कि अल्बर्ट साहब के बेटे को अच्छी इंग्लिश पढ़ाने के एवज में मिला है।

वाइस प्रिंसिपल श्रीमती चंदा सोम को प्रिंसिपल और मैनेजमेंट का सपोर्ट करता देख, अल्बर्ट साहब बहुत खुश हुए। शायद वे मन ही मन सोच रहे थे कि उनका चुनाव गलत नहीं था।
सोम मैडम ने क्या जांचा-परखा, क्या नहीं; यह तो राम ही जानें। पर प्रमोद सर इतना जरूर समझ गए कि इस मामले पर अब एक सांप्रदायिक रंग चढ़ा कर उन्हें बलात फंसा दिया गया है और यहां अब उनकी एक नहीं चलने वाली है। इसलिए अचानक उनके जीभ-तालु सट गए, जिससे वे एकदम से चुप हो बैठे।
उधर इस बैठक की पूरी कार्यवाही के दौरान अब तक मौन बने रहने वाले चेयरमैन मि. केनेथ रिचर्ड हठात गरज उठे, ‘हम लोगों ने फिराद आलम को स्कूल से निकालने का फैसला कर लिया है और उसके निकलने के बाद स्कूल के बाहर जो हंगामा होगा उसको आप संभाल लीजिएगा, नहीं तो नौकरी से रिजाइन कर दीजिएगा। अदर वाइज…।’
‘जी, बाहर मैं संभालूंगा और अंदर एसी रूम में प्रिंसिपल मैडम आराम कुरसी पर बैठ कर ठंडी हवा का मजा लूटेंगी…’ यह वाक्य प्रमोद सर के मुंह से निकलते-निकलते रह गया। अच्छा हुआ जो उनकी जुबान बंद रही।
‘थैंक्यू सर, नाउ यू मे गो।’ प्रिंसिपल साहिबा ने प्रमोद सर से कहा। ‘और हां, कल तक आप हमें अपना फैसला बता दीजिएगा कि आपने क्या सोचा और आपको क्या करना है?’