ताज़ा खबर
 

रविवारी कहानी: एक फुलवा खातिर

राम सिंह भावुक होकर अपनी रौ में कहने लगा, ‘साब हमारी शादी हुई थी न, तो पहली बार पत्नी के सामने हम सज-धजकर नहीं, ये वर्दी पहनकर गए थे। जब हमने इस लाल फीते पर गर्व से हाथ लगाया तो जानते हैं वो क्या बोली? कहने लगी, ‘एक फूलवा होता कांधे पे तो सान (शान) ही कुछ और होती।’मैंने मुस्कराकर कहा, ‘ओ हो! तो तुम अपनी पत्नी को खुश करने के लिए स्टार पाना चाहते हो। बहुत खूब।’ ‘नहीं साब, अब तो उसकी नहीं उसकी आत्मा की खुशी की खातिर।

Author Published on: March 29, 2020 4:54 AM
जनसत्ता रविवारी कहानी: एक फुलवा खातिर।

सीमा व्यास
चाहत जब पूरी होती है तो रोम-रोम से खुशी फूट पड़ती है। पता नहीं शरीर के किस कोने में दबी होती है इतनी खुशी? और जब चाहत लंबे इंतजार के बाद पूरी हुई हो तो यही खुशी दोगुनी-चौगुनी हो जाती है। मुझे भी यही खुशी हासिल हुई जब पुलिस अधिकारियों की पदोन्नति सूची में मेरा नाम शामिल हुआ। टीआइ से डीएसपी पद पर पहुंच गया था मैं। प्रमोशन के लिए मैंने वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर गृह मंत्री तक को खुश करने का हर संभव प्रयास किया था। मेरी मेहनत का प्रतिफल मिला भी, प्रमोशन के रूप में। गिला बस इतना रहा कि पोस्ंिटग इंदौर से दूर उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे जिले में हुई।

खैर, बच्चों के करियर बनने का समय था तो परिवार को साथ ले जाने का प्रश्न उठा ही नहीं। एक सच्चे सैनिक की भांति अपने कर्तव्य स्थल पर मैंने अकेले ही कूच कर दिया।
‘सलाम साब, मैं राम सिंह यादव साब।’ बड़ी चुस्ती-फुर्ती से सबसे पहले जिसने मुझे सलामी दी वो राम सिंह था। उसने अपनी आवाज और अंदाज से मुझे प्रभावित किया। अपने नए आफिस में सारी औपचारिकताएं निभाने से लेकर मेरे निवास आने तक पूरे समय राम सिंह मेरे साथ ही साथ रहा। मेरे लिए तय निवास का परिचय भी उसी ने कराया- यहां थोड़ा संभलकर साब, फर्श उखड़ रहा है, बाथरूम की काई साफ कर दी है मैंने, फिर भी थोड़ी फिसलन है। रसोई का नल बंद पड़ा है। वहां बाल्टी में पानी रखा है। बाहर कुछ सब्जियां लगा रखी हैं…आदि-आदि।

बड़ी बेबाकी से अपनी ही रौ में कहता गया राम सिंह। मैंने गौर किया, इतना काम करने के बावजूद राम सिंह की वर्दी बहुत साफ थी। प्रेस की तहें चमक रही थीं, कहीं सलवटों का नामो-निशान नहीं। मैंने तारीफ करते हुए कहा, ‘वाह राम सिंह, तुम्हारे काम की तरह तुम्हारी वर्दी भी एकदम फर्स्ट क्लास है।’ उत्तर में राम सिंह ने अपनी बाजू के लाल फीते को हाथ फेरते हुए कहा, ‘जी साब, बहुत प्यार करते हैं हम वर्दी से। बहुत कद्र करते हैं वर्दी की और वर्दी के ईमान की। जरा सी आंच नहीं आने देते। रोज धोकर, प्रेस करके पहनते हैं। और साब, आपकी वर्दी का भी इसी तरह ख्याल रखेंगे। कभी शिकायत का मौका नहीं देंगे।’

तत्क्षण मुझे राम सिंह अपना सा महसूस हुआ। लगा मेरे जैसा कुछ इसके भीतर भी है। निभ जाएगी, जितने भी दिन रहूंगा यहां। मेरे सारे काम राम सिंह करता। खाने में पसंद पूछता। रात को याद से दूध देता। कोशिश करता परिवार वालों की कमी न खले। ड्राइवर के गाड़ी साफ करने के बावजूद गाड़ी पर लगी डीएसपी की प्लेट अपने हाथों से पोंछता। कई बार गौर किया मैंने, ऐसा करके उसके चेहरे पर अजीब सी खुशी उभर आती थी।

जिला होने के बावजूद दिन में 7-8 घंटे लाइट जाना यहां आम बात थी। एक बार किसी केस की तहकीकात में गांव-गांव भटकना पड़ा। अधिकारियों को सूचना देने-लेने में मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई। घर आकर चाय पीते समय राम सिंह से कहा, ‘आज घर पर बात नहीं हो पाई, बैटरी खत्म हो गई और तुम्हारे यहां तो लाइट का पता ही नहीं है?’ इतना सुनते ही राम सिंह ने बिजली की सी तेजी से मोबाइल मेरे हाथ से ले लिया और ‘अभी आता हूं साब’ कहकर साइकिल से रवाना हो गया।

अंधेरे और मच्छरों से घिरा मैं राम सिंह को कोस ही रहा था कि साइकिल की घंटी बजाते हुए वह हाजिर हो गया। ‘लीजिए साब, बाई साहब से बात कर लीजिए। फिक्र कर रही होंगी।’ घर पर सबकी कुशल-क्षेम जानने के बाद मैंने पूछा, ‘राम सिंह, लाइट तो है नहीं, तुमने मोबाइल कैसे चार्ज किया?’ ‘जनरेटर से साब। नाके की तरफ एक आदमी करता है दस रुपए में। बहुत लंबी लाइन थी साब। कुछ आपके नाम का और कुछ वर्दी का रौब बताकर फटाफट करा लाया।’ ऐसे खुश होकर बोला, जैसे बच्चा परीक्षा में अव्वल आया हो।

दुनिया में कभी कोई अनजाना ऐसे मिल जाता है जिसके लिए दिल कहता है इससे पिछले जनम का कोई नाता है। राम सिंह के लिए भी कभी-कभी ऐसा ही महसूस करता था मैं। अंधेरे में मोमबत्ती जलाकर राम सिंह खाना बनाने लगा तो मैंने मना कर दिया। कहा, ‘आज दिनभर बाहर का तला-गला खाया है। खाना नहीं खाऊंगा, बस दूध पी लंूगा।’ राम सिंह को बैठने को कहा तो दूर रखे स्टूल पर बैठ गया। आज उसके मन की कुछ गांठें खोलने की इच्छा हो रही थी। किसी के मन की बात जानना हो तो शुरुआत तारीफ से करनी चाहिए। मैंने कहा, ‘राम सिंह, बहुत मेहनत करते हो मुझे खुश रखने के लिए। है न?’

राम सिंह स्टूल से खड़ा होता हुआ बोला, ‘सिर्फ खुश करने की खातिर नहीं साब। बस-बस एक फुलवा को पाने खातिर। और आपको ही नहीं, सात साल से हम हर साब को खुश रखने की कोशिश कर रहे हैं। अब तक फूल ना मिला ये बात और है।’

‘फूल, कैसा फूल राम सिंह?’ मैंने आश्चर्य से पूछा । ‘अरे साब, गलती से निकल गया। स्टार, बस एक स्टार पाने का सपना है हमारा। ये लाल फीते की जगह, एक स्टार लगा हो बस्स।’ राम सिंह भावुक होकर अपनी रौ में कहने लगा, ‘साब हमारी शादी हुई थी न, तो पहली बार पत्नी के सामने हम सज-धजकर नहीं, ये वर्दी पहनकर गए थे। जब हमने इस लाल फीते पर गर्व से हाथ लगाया तो जानते हैं वो क्या बोली? कहने लगी, ‘एक फूलवा होता कांधे पे तो सान (शान) ही कुछ और होती।’

मैंने मुस्कराकर कहा, ‘ओ हो! तो तुम अपनी पत्नी को खुश करने के लिए स्टार पाना चाहते हो। बहुत खूब।’ ‘नहीं साब, अब तो उसकी नहीं उसकी आत्मा की खुशी की खातिर। हैजा हुआ था उसे दो साल पहले। गांव में समय पर इलाज नहीं मिल पाया। साथ छोड़ गई वो हमारा। अब तो…।’
माहौल संजीदा हो गया था। कुछ देर चुप्पी रही। मैं मन ही मन अपनी पदोन्नति पाने के प्रयासों को दोहरा रहा था। सच में आसान नहीं होता मनचाहा पा लेना। मैंने राम सिंह को अपना काम इसी तरह करते रहने की सीख देकर अपना कर्तव्य निभाया।

राम सिंह मेरा बहुत ख्याल रखता। सुबह पूजा के फूल लाने से लेकर रात को दूध का गिलास देने तक कोई शिकायत का मौका नहीं। कोशिश करता मुझे घर की कमी महसूस न हो। ड्राइवर के गाड़ी साफ करने के बाद भी डीएसपी की प्लेट अपने हाथों से साफ करता और गाड़ी में ठंडे पानी की बोतल रखना भी नहीं भूलता। मैंने गौर किया, इन कामों से उसके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी दिखाई देती।

यह सिलसिला कुछ समय तक निर्बाध चलता रहा। मेरा मन भी यहां की आबो हवा में लगने लगा था। राम सिंह जानता था सुबह-सुबह मेरा मूड अच्छा रहता है। उसे छुट्टी लेना हो या मन की बात कहनी हो तो वह सुबह ही मेरे पास आता। एक दिन सुबह-सुबह राम सिंह ने कहा, ‘साब, सुने हैं रामा और कलुआ दिखे हैं गांव में। अपनी बुआ के घर। मुखबिर कह गए कल रात। अबकी नहीं छोड़ेंगे साब। आप कहें तो घेराबंदी कर पकड़ लाएं।’

अखबार पढ़ते हुए चौंक गया मैं। दोनों कुख्यात गुंडे थे। फाइल पढ़ी थी मैंने। 15-16 डकैती और सात खून के इल्जाम थे उन पर। कई बार पकड़ने के प्रयास हुए पर हर बार वे बच निकले। मैंने पूछा, ‘रामा और कलुआ..? मुखबिर की खबर पक्की तो है ना? तुम पहचानते हो उन्हें?’ मेरे प्रश्न सुनकर राम सिंह काम छोड़कर खड़ा हो गया, ‘पहचानते ही नहीं साब, जानते भी हैं। हम उमर ही हैं दोनों। साथ खेले हैं हम लुका-छिपी बचपन में। पर वे गलत संगत में पड़ गए और हम स्कूल की तरफ मुड़ गए। अब भी खेल रहे हैं लुका-छिपी पर… ये मौका नहीं चूकेंगे साब। आप टीम बनाइए, हम पूरा साथ देंगे।’ बहुत आत्मविश्वास से बोलता जा रहा था राम सिंह। मैं स्टार पाने की चाहत की चमक साफ-साफ देख पा रहा था राम सिंह के चेहरे पर। मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया।

दिन में कुछ जरूरी फाइलों को निपटाकर रामा और कलुआ के बारे में जानकारी निकाली। उनकी फाइलों को दोबारा पढ़ा। वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह मशविरा किया। जांबाज जवानों की टीम बनाई। मुखबिरों को गांव में भेजकर खबर की तसल्ली की। अपनी हथियारों से लैस टीम के साथ मैं अपने अभियान पर चल दिया। मुखबिरों ने बताया दोनों गुंडे घर के भीतर हैं। सबने छिपकर अपनी-अपनी स्थिति संभाल ली। गांव के कुछ युवा भी हमारा साथ देने आ गए। मैं मौके की तलाश में था। अंधेरा घिरने लगा था। तभी घर से चादर लपेटे कोई निकला। उसके चंद कदम चलते ही एक सिपाही ने पीछे से उसे पकड़ लिया। चादर हटाई तो बुआ निकली। बाहर की हलचल के भीतर से हवाई फायर हुआ। मैंने देर करना उचित नहीं समझा। टीम को इशारा किया। मेरे सिपाही हवाई फायर करते हुए भीतर घुस गए और चंद मिनटों में ही दोनों गुंडे हमारे कब्जे में थे। दोनों गुंडों को हथकड़ी लगाकर गाड़ी में बिछाया। इस सफलता पर अपने जवानों को शाबासी दी। राम सिंह के चेहरे की खुशी और आंखों की चमक देखने लायक थी।

मैंने ड्राइवर को गाड़ी थाने ले जाने का आदेश दिया। हम गांव के मुहाने तक ही पहुंचे थे कि झाड़ियों से गोली चलने की आवाज आई। गोली पीछे बैठे रामा को निशाना बनाकर चलाई गई थी। हो सकता है उसके किसी साथी ने राज खुलने के डर से दोनों को खत्म करने की योजना बनाई हो। मैंने हड़बड़ाकर टार्च की रोशनी में पीछे देखा। गोली रामा को नहीं राम सिंह को लगी थी ठीक बाजू के ऊपर। और बाजू को चीरती हुई गोली उसकी पसली में धंस गई थी। मैंने तुरंत दूसरी गाड़ी से राम सिंह को अस्पताल भेजा। वरिष्ठों को इस घटना की जानकारी दी ताकि राम सिंह के इलाज में जरा भी देरी न हो।

‘जीप तेजी से थाने की ओर चली। गुंडों को थानेदार के हवाले कर मैं अस्पताल की ओर चल दिया। राम सिंह की बहुत चिंता हो रही थी मुझे। आॅपरेशन थिएटर के बाहर स्ट्रेचर पर लेटा था राम सिंह। अधखुली आंखों से उसने मुझे कातर निगाहों से देखा। मैंने गौर किया उसकी बाजू पर गोली से बिलकुल स्टार की मानिंद निशान बन गया था। विचित्र संयोग था यह। मन ही मन कहा, स्टार तो तुम्हें मिल गया राम सिंह। बस, एक बार ठीक होकर बाहर आ जाओ, फिर मैं तुम्हें अपने हाथों से स्टार लगाऊंगा। कभी कभी दिल चाहता है मौन मुखर हो जाए, सामने वाला अन कहे ही आपके मन की सारी बातें सुन ले और आंखें उसे स्वीकार कर लें। इस समय कुछ ऐसा ही महसूस कर रहा था मैं।

राम सिंह को आॅपरेशन थिएटर में ले गए। बुरी तरह से थक गया था मैं मन से और शरीर से भी। घर जाकर फ्रेश हुआ। रामसिंह के बिना भीतर कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। बाहर लॉन में कुर्सी डाल आसमान ताकने लगा। तभी मोबाइल बजा, ‘साब, राम सिंह नहीं रहा साब। गोली निकालते समय खून ज्यादा बह गया। डॉक्टर बचा नहीं सके उसे…।’ स्तब्ध रह गया मैं। दीर्घ निश्वास लेकर गर्दन ऊपर उठाई। देखा, एक तारा जोर से चमका आसमान में। मैंने मन ही मन कहा, ‘वाह ऊपर वाले हम नीचे वाले तो राम सिंह को एक स्टार नहीं दे पाए और तूने उसे स्टार बनाकर शान से अपने कांधे पर लगा लिया।’

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 रविवारी: महामारी के बीच महात्मा की सीख
2 रविवारी: लोक, परंपरा और कोरोना
3 रविवारी: हारेगी नहीं करुणा