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जनसत्ता रविवारी शख्सियत: आगा हश्र कश्मीरी

आगा हश्र कश्मीरी उर्दू के प्रसिद्ध शायर और नाटककार थे, जिन्हें ‘उर्दू का शेक्सपियर’ भी कहा जाता है। उनके कई नाटक शेक्सपियर के नाटकों का रूपांतरण थे। आगा हश्र का असल नाम आगा मुहम्मद शाह था। उनका जन्म बनारस में हुआ था।

उर्दू के प्रसिद्ध शायर और नाटककार आगा हश्र कश्मीरी।

नाटक में थी दिलचस्पी
अरबी, फारसी की आरंभिक शिक्षा और कुरान मजीद के सोलह पारे (अध्याय) कंठस्थ करने के बाद उनका दाखिला एक मिशनरी स्कूल में करा दिया गया। हालांकि उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा और उनकी स्कूली शिक्षा अधूरी रह गई। स्वाध्याय से उन्होंने उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा सीखी थी। बचपन से ही आगा की दिलचस्पी नाटक और शेरो-शायरी में थी।

अठारह साल की उम्र में वे बंबई आ गए। उनका पहला नाटक ‘आफताब-ए-मुहब्बत’ नाम से 1897 में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने बंबई में ‘न्यू थिएटरिकल कंपनी’ के लिए एक नाटक लेखक के रूप में अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की। उन्हें तब प्रतिमाह 15 रुपए मिलते थे। ‘मुरीद-ए-शक’ कंपनी के लिए उनका पहला नाटक था, जो शेक्सपियर के नाटक ‘द विंटर टेल’ का रूपांतरण था। यह नाटक बेहद लोकप्रिय रहा, जिसे देखते हुए कंपनी ने उनका वेतन 15 रुपए प्रतिमाह से बढ़ाकर 40 रुपए प्रतिमाह कर दिया। उन्होंने शेक्सपियर के कई नाटकों का उर्दू में अनुवाद किया, जिनमें ‘शहीद-ए-नाज’(अछूता दामन) और ‘मेजर फॉर मेजर’ (1902) शामिल हैं। यह वह दौर था जब देश में फिल्मों का चलन नहीं था और लोग थिएटर के दीवाने थे। आगा इस दुनिया में आते ही छा गए।

शेक्सपियर को पहनाया भारतीय चोला
आगा हश्र ने शेक्सपियर के जिन नाटकों का उर्दू में अनुवाद किया, उनमें कई की ख्याति आज तक है। यह कहना तो खैर सही नहीं होगा कि आगा शेक्सपियर की आत्मा तक पहुंचने में पूरी तरह सफल रहे, लेकिन उनके पास नाटक को आत्मसात करने का गजब का हुनर था। इसी हुनर की बदौलत आगा हश्र को ‘उर्दू के शेक्सपियर’ कहा गया।
उन्होंने शेक्सपियर के नाटकों को हूबहू उर्दू में ही नहीं उतारा बल्कि उन्हें भारतीय समाज का चोला पहनाया, जिसके लिए उन्होंने पात्रों के नाम भी भारतीय रखे और नाटकों का अंजाम भी बदल दिया। शेक्सपियर के नाटकों के अनुवाद के अलावा आला हश्र ने कई दूसरे नाटक भी लिखे। ‘बिल्व मंगल’, ‘आंख का नशा’, ‘रुस्तम व सोहराब’ और ‘सीता वनवास’ ‘रामायण’ पर आधारित नाटक भी उन्होंने लिखे, जो बेहद लोकप्रिय हुए।

‘यहूदी की लड़की’
पारसी थिएटर का जिक्र आते ही आगा हश्र का नाम सबकी जुबान पर आ जाता है। वे पारसी और उर्दू दोनों ही रंगमंचों पर समान रूप से छाए रहे। ‘यहूदी की लड़की’ उनका बहुचर्चित नाटक है। यह नाटक 1913 में प्रकाशित हुआ था। इस नाटक के माध्यम से यहूदियों पर होनेवाले रोमनों अत्याचार को प्रस्तुत किया गया। कई बार इस पर मूक फिल्म का निर्माण भी किया गया। 1958 में फिल्म ‘यहूदी’ की पटकथा इसी नाटक पर आधारित है। बिमल रॉय द्वारा निर्देशित इस फिल्म में दिलीप कुमार, मीना कुमारी और सोहराब मोदी ने मुख्य भूूमिका निभाई थी।

नाटककार के साथ शायर भी बड़े
1912 करियर के अंतिम दिनों में उन्होंनें ‘शेक्सपियर थिएटरिकल कंपनी’ बनाई, लेकिन लंबे समय तक यह कंपनी नहीं चल सकी। फिर वे उस समय के एक प्रमुख थिएटर ‘मैदान थिएटर’ से जुड़े, जहां उन्होंने उर्दू नाटकों के साथ गजल की दुनिया में भी खूब नाम कमाया। मशहूर नाटककार के साथ आगा बड़े शायर भी थे। उनकी कई गजलें आज भी शौक से गाई जाती हैं। बाद में वे फिल्म निर्माण में प्रयोग करने के लिए लाहौर चले गए। लेकिन 28 अप्रैल 1935 को फिल्म पूरी होने से पहले ही उर्दू के इस शेक्सपियर का निधन हो गया। ल्ल

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