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रेडियो से सामुदायिक रेडियो तक

एक पुरानी कहावत है कि कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी। जब नए जमाने के रेडियो की बात करते हैं तो यह कहावत सौ टका खरी उतरती है। भोपाल में आप जिस एफएम को सुन रहे हैं, उसकी सीहोर होते हुए उज्जैन और देवास में बानी बदल जाएगी।

Author Published on: February 17, 2019 4:09 AM
प्रतीकात्मक फोटो

मनोज कुमार

एक पुरानी कहावत है कि कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी। जब नए जमाने के रेडियो की बात करते हैं तो यह कहावत सौ टका खरी उतरती है। भोपाल में आप जिस एफएम को सुन रहे हैं, उसकी सीहोर होते हुए उज्जैन और देवास में बानी बदल जाएगी। इन शहरों में एफएम चलेगा, वही लेकिन उसकी बानी बदल जाती है। भोपाल में कों खां सुन रहे होते हैं, तो इंदौर का एफएम आपको भिया कहता हुआ सुनाएगा। इस विविधता ने रेडियो की दुनिया बदल दी है। रेडियो के आविष्कार मारकोनी को लोग भूल गए होंगे, यह स्वाभाविक भी है, लेकिन उनके बनाए रेडियो को हम कभी नहीं भूल पाएंगे। संचार के सबसे प्राचीन और प्रभावी तंत्र के रूप में रेडियो समाज में स्थापित है। रेडियो का मतलब होता था आॅल इंडिया रेडियो, जो बाद में आकाशवाणी हो गया। नए जमाने में, नए दौर का रेडियो प्रचलन में है और उनमें सबसे ज्यादा पॉपुलर एफएम रेडियो है।

रेडियो से सामुदायिक रेडियो की तरफ बढ़ते कदमों को देख कर आप नए भारत की बदलती सूरत देख सकते हैं। भारत में सामुदायिक रेडियो अभी शैशवस्था में है, तो दुनिया के कई देशों ने इसे अलविदा कह दिया है। वे अब वेब रेडियो और डिजिटल रेडियो की दुनिया में प्रवेश कर गए हैं। भारत के लिए सामुदायिक रेडियो अभी एक नया अनुभव है, लेकिन रेडियो से सामुदायिक रेडियो और इन दोनों के बीच एफएम रेडियो के सफर को जानना रोचक होता है।

रेडियो का इतिहास बताता है कि जगदीश चंद्र बसु ने भारत में तथा गुल्येल्मो मार्कोनी ने सन 1900 में इंग्लैंड से अमेरिका बेतार संदेश भेज कर व्यक्तिगत रेडियो संदेश भेजने की शुरुआत कर दी थी। पर एक से अधिक व्यक्तियों को एक साथ संदेश भेजने या ब्रॉडकास्टिंग की शुरुआत 1906 में फेसेंडेन के साथ हुई। ली द फोरेस्ट और चार्ल्स हेरॉल्ड जैसे लोगों ने इसके बाद रेडियो प्रसारण के प्रयोग करने शुरू किए। तब तक रेडियो का प्रयोग सिर्फ नौसेना तक सीमित था। 24 दिसंबर, 1906 की शाम कनाडाई वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेसेंडेन ने जब अपना वॉयलिन बजाया और अटलांटिक महासागर में तैर रहे तमाम जहाजों के रेडियो आॅपरेटरों ने उस संगीत को अपने रेडियो सेट पर सुना, तो वह दुनिया में रेडियो प्रसारण की शुरुआत थी। इससे पहले 1917 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के बाद किसी भी गैर-फौजी के लिए रेडियो का प्रयोग निषिद्ध कर दिया गया। 1927 तक भारत में भी ढेरों रेडियो क्लबों की स्थापना हो चुकी थी।

भारत में रेडियो प्रसारण की पहली शुरुआत जून 1923 रेडियो क्लब मुंबई द्वारा हुई थी, लेकिन इंडियन ब्रॉडकास्ट कंपनी के तहत देश के पहले रेडियो स्टेशन के रूप में बॉम्बे स्टेशन तब अस्तित्व में आया, जब 23 जुलाई, 1927 को वाइसराय लार्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया। 1936 में भारत में सरकारी ‘इंपीरियल रेडियो आॅफ इंडिया’ की शुरुआत हुई, जो आजादी के बाद आॅल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी बन गया। नवंबर, 1941 में रेडियो जर्मनी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का भारतीयों के नाम संदेश भारत में रेडियो के इतिहास में एक और प्रसिद्ध दिन रहा, जब नेताजी ने कहा था, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ इसके बाद 1942 में आजाद हिंद रेडियो की स्थापना हुई, जो पहले जर्मनी से, फिर सिंगापुर और रंगून से भारतीयों के लिए समाचार प्रसारित करता रहा।
सन 1947 में देश के विभाजन के समय भारत में कुल नौ रेडियो स्टेशन थे, जिनमें पेशावर, लाहौर और ढाका पाकिस्तान में चले गए। भारत में दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचिरापल्ली और लखनऊ केंद्र रह गए। आज देश में रेडियो के कुल 420 प्रसारण केंद्र हैं और देश की 99.20 प्रतिशत जनसंख्या तक आल इंडिया रेडियो का प्रसारण पहुंच रहा है।

स्वतंत्रता के बाद से 16 नवंबर, 2006 तक रेडियो केवल सरकार के अधिकार में था। धीरे-धीरे आम नागरिकों के पास रेडियो की पहुंच के साथ इसका विकास हुआ। टेलीविजन के आगमन के बाद शहरों में रेडियो के श्रोता कम होते गए, पर एफएम रेडियो के आगमन के बाद अब शहरों में भी रेडियो के श्रोता बढ़ने लगे हैं। पर गैरसरकारी रेडियो में अब भी समाचार या समसामयिक विषयों की चर्चा पर पाबंदी है। 1995 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रेडियो तरंगों पर सरकार का एकाधिकार नहीं है। वर्ष 2002 में एनडीए सरकार ने शिक्षण संस्थाओं को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी। 16 नवंबर, 2006 को यूपीए सरकार ने स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी।

मध्यप्रदेश के संदर्भ में रेडियो की उपयोगिता और प्रभाव का विश्लेषण करते हैं, तो पाते हैं कि समूचे भारत में मध्यप्रदेश इकलौता राज्य है, जहां राज्य शासन द्वारा नौ सामुदायिक रेडियो का संचालन किया जा रहा है। आठ रेडियो स्टेशन मध्यप्रदेश के आदिवासी जिलों में स्थापित हैं, तो देश का पहला स्वाधीनता संग्राम पर केंद्रित रेडियो आजाद हिंद भोपाल से संचालित होता है। राज्य के जनजातीय विकास विभाग के उपक्रम वन्या द्वारा आरंभ किए गए रेडियो वन्या में कार्यक्रमों का प्रसारण स्थानीय बोलियों जैसे गोंडी, भीली, सहरिया, कोरकू में कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता रहा है। हालांकि बड़े बजट के साथ स्थापित किए गए इन सामुदायिक रेडियो का लाभ जैसा अंचल के लोगों को मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल पा रहा है। सरकार अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार और समय-समय पर जनजागरूकता के लिए रेडियो वन्या का उपयोग करे, तो न केवल शासकीय धन का समुचित उपयोग होगा, बल्कि जनजातीय समाज तक बदलाव के संदेश आसानी से पहुंचाए जा सकेंगे। एक बार उच्च स्तर पर वन्या रेडियो की समीक्षा और कसावट की जरूरत है।

रेडियो से लेकर सामुदायिक रेडियो केवल मनोरंजन के लिए नहीं होते हैं, बल्कि आपदा समय में भी रेडियो मददगार हो सकता है। आपदा के समय जैसे भूकंप, सुनामी या बाढ़ आदि में भी रेडियो काफी मददगार रहता है। ऐसे समय में जब बिजली आदि भी चली जाती है, तो बैटरी चलित रेडियो के माध्यम से मुसीबत में फंसे लोग मार्गदर्शन के साथ सही सूचनाएं प्राप्त कर सकते हैं।
आज एक बार फिर पलट कर देखना अच्छा लगता है कि कैसे रेडियो का विकास हुआ और संचार के विकसित होते माध्यमों के बीच रेडियो ने अपनी जगह बनाई है। देश के प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ से रेडियो के माध्यम से लोगों तक पहुंचने का जो उपक्रम किया है, उससे आगे निकल कर रेडियो को जनोपयोगी बनाने की जरूरत है। मध्यप्रदेश के संदर्भ में चर्चा करें, तो राज्य शासन के सामुदायिक रेडियो के माध्यम से जनजातीय समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याणकारी योजनाओं को आसानी से पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए दिल से प्रयास करने की जरूरत है, क्योंकि रेडियो को सरकारी फाइल बनाने के बजाय उसे जिम्मेदार बनाना होगा।

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