दलित संघर्ष का मराठा स्वर अण्णाभाऊ साठे

मराठी साहित्य और कला-जगत के शिखर पुरुष अण्णाभाऊ का जन्म एक अगस्त, 1920 को महाराष्ट्र के सांगली जिले में वाटेगांव के मांगबाड़ा गांव में हुआ था। जाति थी मांग (मातंग)। अछूत मानी जाने वाली और देश की सर्वाधिक विपन्न जातियों में से एक, जिसका कोई स्थायी धंधा तक नहीं था।

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मराठी साहित्य और कला जगत के शिखर पुरुष अण्णाभाऊ साठे।

दलितों-वंचितों के सामाजिक संघर्ष को सांस्कृतिक दरकार के साथ जोड़ने में मराठी भाषा और साहित्य का योगदान ऐतिहासिक रहा है। यही नहीं, संगीत और रंगमंच की मराठी परंपरा काफी मजबूत और सघन रही है। इस सांस्कृतिक उर्वरता को बनाए रखने तथा इन्हें समकालीन और प्रगतिशील धार देने में जिन लोगों की बड़ी भूमिका रही है, उनमें एक बड़ा नाम है- अण्णाभाऊ साठे का। उनका सादा और संघर्षमय जीवन तथा विस्तृत सांस्कृतिक कृतित्व एक ऐसे ऐतिहासिक सुलेख की तरह है, जिनसे कई पीढ़ियों ने प्रेरणा ली है।

मराठी साहित्य और कला-जगत के शिखर पुरुष अण्णाभाऊ का जन्म एक अगस्त, 1920 को महाराष्ट्र के सांगली जिले में वाटेगांव के मांगबाड़ा गांव में हुआ था। जाति थी मांग (मातंग)। अछूत मानी जाने वाली और देश की सर्वाधिक विपन्न जातियों में से एक, जिसका कोई स्थायी धंधा तक नहीं था। पेट भरने के लिए उस जाति के लोग शादी-विवाह, पर्व-त्योहार के अवसर पर ढोल और तुरही बजाते। ब्रितानी सरकार ने इस जाति को ‘क्रिमिनल ट्राइव एक्ट-1871’ के तहत अपराधी घोषित कर रखा था। अण्णा के पिता भाऊराव बेटे को पढ़ाना चाहते थे। पर यहां भी जाति बड़ी बाधा बनी। इस अपमानजनक स्थिति ने अण्णा के कोमल मन पर गहरा असर डाला। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा बीच में ही छोड़कर जीवन भर पाठशाला न जाने का फैसला कर लिया।

1930 के दशक में भारत भीषण आर्थिक मंदी की चपेट में था। अण्णा एक मामूली सी नौकरी करते थे लेकिन वह भी चली गई। वे गांव पहुंचे। पर आफत यह कि उस साल पूरे महाराष्ट्र में सूखा पड़ा था। ग्रामीणों की दशा भी दयनीय थी। ऐसे में उन्होंने औद्योगिक नगरी मुंबई का रुख किया। वाटेगांव से मुंबई करीब 255 किलोमीटर दूर था। इस दूरी को पैदल पाटने में ही दो महीने गुजर गए। मुंबई पहुंचते समय उनकी उम्र महज 11 वर्ष थी। गांव में जहां अछूत होने के कारण कोई काम नहीं देता था, वहीं मुंबई में काम की कमी न थी। उनके निकट के रिश्तेदार बापू साठे एक ‘तमाशा’ मंडली चलाते थे। गाने-बजाने के शौक के कारण वे इससे जुड़ गए। इस बीच, एक घटना से उनके सोचने का ढंग ही बदल गया।

उनकी मंडली को एक गांव में कार्यक्रम करना था। तमाशा शुरू होने से पहले मंच पर महाराष्ट्र में ‘क्रांति सिंह’ के नाम से विख्यात नाना पाटिल पहुंचे। वहां उन्होंने ब्रितानी सरकार की शोषणकारी नीतियों का खुलासा करने वाला जोरदार भाषण किया। मिलों में हो रहे शोषण के लिए पूंजीपतियों और सरमायेदारों की कारगुजारियों पर भी बात की। भाषण सुनने के बाद अण्णा को अब तक का गाया-सुना अकारथ लगने लगा। उन्होंने 1944 में ‘लाल बावटा कलापथक’ (लाल क्रांति कलामंच) नामक नई तमाशा मंडली की शुरुआत की। अपनी मंडली को लेकर वे महाराष्ट्र के गांव-गांव तक पहुंचे। यह मराठा जनकवि के रूप में उनकी लोकप्रियता का दौर था।

आगे जब तमाशा पर प्रतिबंध लगा तो भी जनगीतों के माध्यम से वे सामाजिक बदलाव की अलख जगाते रहे। इस दौरान अण्णाने 14 लोकनाटक, 35 उपन्यास और 300 से ज्यादा कहानियां लिखीं। इसके अलावा 250 लावणियां और छह फिल्मों की पटकथा भी उन्होंने लिखी। उनकी लिखी 14 कहानियों-उपन्यासों का फिल्मांकन भी हुआ। रूसी क्रांति से प्रभावित अण्णा ने स्तालिनग्राद को लेकर एक पावड़ा (शौर्यगीत) लिखा। इसका अनुवाद रूसी भाषा में भी हुआ। उनके यात्रा वृतांत ‘मेरी रूस यात्रा’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत होने का गौरव प्राप्त है। मुंबई में वे 22 साल तक घाटकोपर की खोलियों में रहे। आखिरी समय तक उन्होंने न सिर्फ सामाजिक विषमता के खिलाफ संघर्ष जारी रखा बल्कि अपनी रचनात्मक नैतिकता पर भी कोई आंच नहीं आने दी।

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