बांग्ला साहित्य का गौरव सतीनाथ भादुड़ी

वे लोक संस्कृति के चितेरे तो थे ही लोक संघर्ष से भी गहरे तौर पर जुड़े हुए थे। कटिहार जूट मिल में हड़ताल का एक दौर में उन्होंने नेतृत्व किया था। उस जमाने में पूर्णिया दुर्गाबाड़ी में बलि प्रथा काफी प्रचलित थी। सतीनाथ शक्ति उपासना की परंपरा से अवगत थे और बंगाली होने के कारण इसके प्रति उनके मन में स्वाभाविक श्रद्धा भी थी। पर वे बलि प्रथा को इस श्रद्धा के खिलाफ मानते थे। एक जागरूक समाज सुधारक के तौर पर उन्होंने इस जघन्य प्रथा का कारगर विरोध किया और कामयाब रहे।

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बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार सतीनाथ भादुड़ी।

ब्रितानी शासन के दौर में भारत ने एक तरफ तो अभाव और संकट को कई स्तरों पर झेला, वहीं दूसरी तरफ इस चुनौतीपूर्ण स्थिति से बाहर निकलने के लिए कई कालजयी रचनात्मक प्रयास भी हुए। खासतौर पर सांस्कृतिक नवजागरण का जो विहान अखिल भारतीय स्तर पर आंजा गया, वह अद्वितीय है। इस भूमिका के साथ बांग्ला साहित्यकार सतीनाथ भादुड़ी की चर्चा करें तो वे सबसे पहले हमें देश के उस सांस्कृतिक भूगोल या सांस्कृतिक बहुलता वाले परिवेश से अवगत कराते हैं, जिसे हम पुरबिया संस्कृति की बांग्ला छटा कह सकते हैं।

बिहार तब बंगाल का ही हिस्सा हुआ करता था। वर्तमान में बिहार का पूर्णिया जिला बंगाल की सीमा को छूता है। अगर साहित्य में पूर्णिया के योगदान की चर्चा करें तो सबसे पहले सतीनाथ भादुड़ी का ध्यान आता है। उनका साहित्य बांग्ला साहित्य में काफी समादृत है।

सतीनाथ का जन्म 27 सितंबर 1906 में हुआ। उनके पिता का नाम इंदूभूषण भादुड़ी था, जिनके नाम पर पूर्णिया की दुर्गाबाड़ी में इंदूभूषण सार्वजनिक पुस्तकालय है। सतीनाथ ने लिखना तो बहुत बाद में शुरू किया। इससे पहले उनकी पहचान एक अच्छे राजनीतिज्ञ और बड़े समाज सुधारक के तौर पर थी। वे आजादी के आंदोलन में काफी सक्रिय थे।

महात्मा गांधी के आह्वान पर वे सत्याग्रहियों की टोली में शामिल हो गए थे। ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ कई गतिविधियों में शामिल रहने के कारण उन्हें तीन बार जेल की यात्रा करनी पड़ी। जेल में जयप्रकाश नारायण, फणिभूषण सेन, श्री कृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह के साथ उन्हें रहने का अवसर मिला। जेल में रहते हुए ही उन्होंने ‘जागोरी’ नामक प्रसिद्ध उपान्यास लिखा था।

वे लोक संस्कृति के चितेरे तो थे ही लोक संघर्ष से भी गहरे तौर पर जुड़े हुए थे। कटिहार जूट मिल में हड़ताल का एक दौर में उन्होंने नेतृत्व किया था। उस जमाने में पूर्णिया दुर्गाबाड़ी में बलि प्रथा काफी प्रचलित थी। सतीनाथ शक्ति उपासना की परंपरा से अवगत थे और बंगाली होने के कारण इसके प्रति उनके मन में स्वाभाविक श्रद्धा भी थी। पर वे बलि प्रथा को इस श्रद्धा के खिलाफ मानते थे। एक जागरूक समाज सुधारक के तौर पर उन्होंने इस जघन्य प्रथा का कारगर विरोध किया और कामयाब रहे। उनका सुधारवादी कदम यहीं नहीं थमा।

आगे उन्होंने शराबबंदी और कई दूसरी सामाजिक कुरीतियों के प्रति लोगों को जागरूक किया और एक स्वच्छ समाज रचना की सांस्कृतिक मिसाल पेश की। हिंदी में आंचलिक कथा का दौर शुरू करने वाले फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्यिक मिजाज और लेखन शैली के बारे में कोई भी बात सतीनाथ की चर्चा के बिना अधूरी है। रेणु उन्हें अपना गुरु मानते थे। रेणु ने सतीनाथ पर एक निबंध भी लिखा है। रेणु और वे जेल में भी साथ रहे थे।

सतीनाथ ने दस उपन्यास लिखे। इसके अलावा कई लघु कथाएं और निबंधों की रचना की है। उनके महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में ‘जागोरी’, ‘ढोढ़ाय चरित मानस’, ‘काकोरी’, ‘संकट‘ और ‘दिग्भ्रांत‘ आदि हैं। ‘ढोढ़ाय चरित मानस’ पूर्णिया और आसपास के लोक परिवेश को समझने के लिए बांग्ला और हिंदी दोनों ही भाषा में असाधारण कृति है।

आलम यह है कि कई लोग रेणु की प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति ‘मैला आंचल’ को सतीनाथ के इस उपन्यास की छाया मानते हैं। पर इन दोनों साहित्यकारों के आत्मीय संबंध को देखते हुए इस विवाद में जाना निरर्थक है। दरअसल, सतीनाथ भादुड़ी का सघन और रचनात्मक जीवन, लेखन और मानस के ऐसे समास की रचना है, जिसमें समय और समाज की चिंता तो है ही, इनके आगे बढ़ने के लिए प्रगतिशील रास्ता भी है।

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