‘बलिहारी गुर आपणै’ सर्वपल्ली राधाकृष्णन

राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से दुनिया को भारतीय दर्शन के आधुनिक भाष्य और विवेचन से परिचित कराया। उन्होंने गीता के साथ वेदों और उपनिषदों का भी गहन अध्ययन किया था। लिहाजा उनके ज्ञान और समझ का दायरा खासा विस्तृत और गहरा था। एक ऐसे दौर में जब भारत पराधीन था और स्वाधीनता के लिए कई स्तरों पर एक साथ संघर्ष चल रहे थे, राधाकृष्णन का ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ना एक दूरदर्शी सोच थी।

Jansatta Personality
भारत के महान स्वाधीनता सेनानी, राष्ट्रवादी, विद्वान शिक्षक और देश के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन।

भारतीय लोक परंपरा में गुरु और गोविंद के बीच चुनाव का तर्क विवेक की कसौटी पर ही नहीं खरा उतरता बल्कि इससे ज्ञान को लेकर गहरी ललक भी जाहिर होती है। इस लिहाज से यह निर्णय भी खासे महत्व का है कि भारत अपने पहले उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को याद करते हुए हर साल शिक्षक दिवस मनाता है। चार दशकों तक शिक्षक के रूप में विभिन्न पदों पर रहे राधाकृष्णन कई विषयों के विद्वान थे।

शिष्यों और करीबियों ने जब राधाकृष्णन से उनका जन्मदिवस मनाने के बारे में पूछा तो उन्होंने अपनी इच्छा कुछ यों जताई- ‘मेरे जन्मदिन को मनाने की जगह यदि इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए, तो मुझे ज्यादा खुशी होगी।’ इस तरह पांच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा 1962 से शुरू हुई जो आज भी जारी है।

राधाकृष्णन का जन्म पांच सितंबर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुतनी गांव के एक गरीब परिवार में हुआ था। बचपन में उनकी शिक्षा तिरूवल्लुर के गौड़ी स्कूल और तिरुपति मिशन स्कूल में हुई थी। इसके बाद मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से 1916 में उन्होंने दर्शनशास्त्र में एमए किया और मद्रास रेजीडेंसी कॉलेज में इसी विषय के सहायक प्राध्यापक का पद संभाला।

वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक रहे। साथ ही कोलकाता विश्वविद्यालय (जार्ज पंचम कॉलेज) में भी प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। वे आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।

आजादी मिलने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उनसे राजदूत के रूप में सोवियत संघ में राजनयिक कार्यों की जिम्मेदारी का निर्वहन करने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने मान लिया। वे 1952 तक इस पद पर रहे। उसके बाद उन्हें उप-राष्ट्रपति नियुक्त किया गया। फिर 1962 में वे देश के दूसरे राष्ट्रपति बने।

राष्ट्रपति के तौर पर उनका कार्यकाल काफी चुनौतियों भरा था। इस दौरान एक ओर जहां भारत के चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध हुए, वहीं दूसरी ओर दो प्रधानमंत्रियों का देहांत भी इसी दौरान हुआ।

राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से दुनिया को भारतीय दर्शन के आधुनिक भाष्य और विवेचन से परिचित कराया। उन्होंने गीता के साथ वेदों और उपनिषदों का भी गहन अध्ययन किया था। लिहाजा उनके ज्ञान और समझ का दायरा खासा विस्तृत और गहरा था। एक ऐसे दौर में जब भारत पराधीन था और स्वाधीनता के लिए कई स्तरों पर एक साथ संघर्ष चल रहे थे, राधाकृष्णन का ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ना एक दूरदर्शी सोच थी।

भारत की स्वाधीन और आधुनिक राष्ट्र के तौर पर शिनाख्त को गुरु और ज्ञान के साझे के साथ देखने वाले राधाकृष्णन की योग्यता के सभी कायल थे। उनकी योग्यता को समादृत करते हुए ही उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाया गया।

वे ‘भारत रत्न’ पाने वाले पहले भारतीय हैं। 17 अप्रैल 1975 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। उन्हें मरणोपरांत मार्च, 1975 में अमेरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है।

इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले वे पहले गैर-ईसाई थे। एक असाधारण शिक्षक के तौर पर राधाकृष्णन की विद्वता, सार्वजनिक जीवन की नैतिकता और कुशल प्रशासनिक योग्यता ने मिलकर एक ऐसे स्वर्णिम सुलेख की रचना की है, जो हमारे लिए लंबे समय तक अक्षर प्रेरणा बनी रहेगी।

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