scorecardresearch

संजीदा कलाकार संजीव कुमार

संजीव कुमार ने बीस वर्ष की आयु में एक वृद्ध आदमी का ऐसा जीवंत अभिनय किया था कि उसे देख कर पृथ्वीराज कपूर भी दंग रह गए। ‘संघर्ष’ फिल्म में दिलीप कुमार की बांहों में दम तोड़ने का दृश्य इतना शानदार किया कि खुद दिलीप कुमार भी सकते में आ गए।

उनका मूल नाम हरीभाई जरीवाला था। उन्हें फिल्म जगत की आकाशगंगा में एक ऐसे ध्रुवतारे की तरह याद किया जाता है, जिसके बेमिसाल अभिनय से सुसज्जित फिल्मों की रोशनी से बालीवुड हमेशा जगमगाता रहेगा। बचपन से ही उन्हें अभिनय का शौक था। वही शौक उन्हें उनके पैतृक निवास सूरत से खींच कर मायानगरी मुंबई ले आया।

फिल्म उद्योग में आकर वे संजीव कुमार हो गए। अपने जीवन के शुरुआती दौर में पहले वे रंगमंच से जुड़े, फिर बाद में उन्होंने फिल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाखिला ले लिया। इसी दौरान वर्ष 1960 में उन्हें फिल्मालय बैनर की फिल्म ‘हम हिंदुस्तानी’ में एक छोटी-सी भूमिका निभाने का मौका मिला। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। एक के बाद एक फिल्मों में अपने शानदार अभिनय से वे एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता बने।

संजीव कुमार ने बीस वर्ष की आयु में एक वृद्ध आदमी का ऐसा जीवंत अभिनय किया था कि उसे देख कर पृथ्वीराज कपूर भी दंग रह गए। ‘संघर्ष’ फिल्म में दिलीप कुमार की बांहों में दम तोड़ने का दृश्य इतना शानदार किया कि खुद दिलीप कुमार भी सकते में आ गए। स्टार कलाकार हो जाने के बाद भी उन्होंने कभी नखरे नहीं किए।

जब लेखक सलीम खान ने इनसे त्रिशूल में उनके समकालीन अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के पिता की भूमिका निभाने का आग्रह किया तो उन्होंने बेझिझक उसे स्वीकार कर लिया और इतने शानदार ढंग से वह भूमिका निभाई कि उन्हें ही केंद्रीय चरित्र मान लिया गया।

वर्ष 1960 से वर्ष 1968 तक संजीव कुमार फिल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फिर 1968 में प्रदर्शित फिल्म ‘शिकार’ में वे पुलिस अफसर की भूमिका में दिखाई दिए। यह फिल्म पूरी तरह अभिनेता धर्मेंद्र पर केंद्रित थी, फिर भी संजीव कुमार अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे।

इस फिल्म में दमदार अभिनय के लिए उन्हें सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। उसी साल प्रदर्शित फिल्म ‘संघर्ष’ में उनके सामने हिंदी फिल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, लेकिन संजीव कुमार ने अपनी छोटी-सी भूमिका के बावजूद दर्शकों की वाहवाही लूट ली। इसके बाद ‘आशीर्वाद’, ‘राजा और रंक’, ‘सत्यकाम’ और ‘अनोखी रात’ जैसी फिल्मों में मिली कामयाबी से संजीव कुमार दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते चले गए।

वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘खिलौना’ की जबर्दस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार ने बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। उसी साल प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ में लाजवाब अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘कोशिश’ में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला। उसमें उन्होंने गूंगे की भूमिका निभाई थी।

बगैर संवाद बोले सिर्फ आंखों और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बता देना संजीव कुमार की अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था, जिसे शायद ही कोई अभिनेता दोहरा पाए। सत्तर के दशक में उन्होंने गुलजार के साथ काम किया। उनके साथ कुल नौ फिल्में कीं, जिनमें ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘अंगूर’, ‘नमकीन’ प्रमुख हैं। फिल्म ‘शोले’ में उनकी ठाकुर की भूमिका को लोग आज भी याद करते हैं।

उस दौर में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, शम्मी कपूर, दिलीप कुमार जैसे अभिनेता छाए हुए थे, फिर भी अपने सशक्त अभिनय से उन सबके बीच काम करते हुए संजीव कुमार ने फिल्म जगत में अपना स्थान बनाया था।

पढें रविवारी (Sundaymagazine News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

अपडेट

X