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क्रांतिकारी योगी श्री अरविंद

भारत के स्वतंत्र होते ही श्री अरविंद ने भविष्यवाणी की थी कि भारत एक बार फिर एशिया का नेता होकर समस्त भूमंडल को एकात्मा की मूलभूत शृंखला में आबद्ध करने का महान कार्य सम्पन्न करेगा। भारत की आध्यात्मिकता यूरोप और अमेरिका में प्रवेश कर रही है।

क्रांतिकारी योगी श्री अरविंद

अरविंद घोष कवि और भारतीय राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने आध्यात्मिक विकास के माध्यम से सार्वभौमिक मोक्ष का दर्शन प्रतिपादित किया। उनका जन्म कोलकाता में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता पश्चिमी सभ्यता में रंगे हुए थे। अरविंद घोष की शिक्षा दार्जिलिंग में ईसाई कान्वेंट स्कूल में प्रारंभ हुई और बचपन में ही उन्हें आगे की स्कूली शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया।

1892 में भारत लौट कर उन्होंने वडोदरा और कोलकाता में विभिन्न प्रशासनिक और प्राध्यापकीय पदों पर कार्य किया। बाद में उन्होंने अपनी देशज संस्कृति की ओर ध्यान दिया और पुरातन संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं तथा योग का गहन अध्ययन किया।

श्री अरविंद के लिए 1902 से 1910 के वर्ष हलचल भरे थे, क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश शासन से भारत को मुक्त कराने का बीड़ा उठाया था। बड़ौदा कालेज की नौकरी छोड़ कर वे कोलकाता चले गए और कोलकाता के नेशनल कालेज के प्रिंसीपल बने। इस समय तक उन्होंने सादा जीवन और उच्च विचार का सिद्धांत अपना लिया था। उन पर रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के साहित्य का बहुत गहन प्रभाव हुआ।

सन 1905 में लार्ड कर्नज ने पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल के रूप में बंगाल के दो टुकड़े कर दिए ताकि हिंदू और मुसलमानों में फूट पड़ सके। इस बंग-भंग के कारण बंगाल में जन जन में असंतोष फैल गया। रवींद्रनाथ ठाकुर और अरविंद घोष ने इस जन-आंदोलन का नेतृत्व किया। अरविंद घोष ने राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करने के लिए पत्र-पत्रिकाओं में विचारोत्तेजक और प्रभावशाली लेख लिखे।

इससे ब्रिटिश सरकार चिंतित हो गई। सरकार ने ‘अलीपुर बम कांड’ के आरोप में उन्हें जेल भेज दिया। जेल में उन्हें योग पर चिंतन करने का समय मिला। उन्होंने सन 1907 में राष्ट्रीयता के साथ भारत को ‘भारतमाता’ के रूप में वर्णित और प्रतिष्ठित किया। उन्होंने बंगाल में ‘क्रांतिकारी दल’ का गठन किया और उसकी अनेक शाखाएं खोली। खुदीराम बोस और कनाईलाल दत्त उनके संगठन के ही क्रांतिकारी थे। अरविंद घोष अपनी राजनीतिक गतिविधियों और क्रांतिकारी साहित्यिक प्रयासों के लिए 1908 में फिर बंदी बना लिए गए।

1906 से 1909 तक वे प्रत्यक्ष राजनीति में रहे। दो वर्ष बाद ब्रिटिश भारत से भाग कर उन्होंने दक्षिण-पूर्वी भारत में फ्रांसीसी उपनिवेश पांडिचेरी में शरण ली, जहां उन्होंने अपना शेष जीवन पूरी तरह अपने दर्शन को विकसित करने में लगा दिया। उन्होंने वहां पर आध्यात्मिक विकास के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र के रूप में एक आश्रम की स्थापना की।

भारत के स्वतंत्र होते ही श्री अरविंद ने भविष्यवाणी की थी कि भारत एक बार फिर एशिया का नेता होकर समस्त भूमंडल को एकात्मा की मूलभूत शृंखला में आबद्ध करने का महान कार्य सम्पन्न करेगा। भारत की आध्यात्मिकता यूरोप और अमेरिका में प्रवेश कर रही है।

श्री अरविंद के अनुसार विकास का लक्ष्य मानसिकता का अतिक्रमण करके मनुष्य को वहां ले जाना है, जो संस्कृति, जन्म-मृत्यु और काल से परे हो। आध्यात्मिक विकास क्रमिक अभिव्यक्ति के तर्क पर आधारित है। अरविंद आध्यात्मिक अनुभूतियों के स्रोत के रूप में वेदांत की विभिन्न शाखाओं को मानते हैं।

उनकी मान्यता है कि समस्त अनुभवों और रूपों के मूल में आनंद विद्यमान है। सत्ता के आनंद का वही अर्थ नहीं है, जिस अर्थ में कि हम सुख अथवा हर्ष का साधारणतया प्रयोग करते हैं। समाज जब अतिमानसिक ज्योति से प्रकाशित होगा तभी मानवता उस दिव्यत्व को प्राप्त करेगी, जो उसकी अमर धरोहर है। इसी प्राप्ति के लिए हमें योग को अपनाना होगा।

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