scorecardresearch

ईश्वर के रचयिता- राजा रवि वर्मा

पत्थरों को तराश कर देवी-देवताओं की मूर्तियां तो गढ़ी थीं, मगर आज जिस तरह घर-घर में देवी-देवताओं की तस्वीरें टंगी होती हैं, वैसी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ऐसे समय में राजा रवि वर्मा ने देवताओं की तस्वीरें बनानी शुरू की थी। इसके लिए उन्होंने सजीव माडल तलाश किए और उन्हें देवी-देवताओं की अलग-अलग भंगिमा में बिठा कर प्रतिकृतियां तैयार की।

बहुत कम लोग जानते होंगे कि हमारे घरों में टंगी देवी-देवताओं की तस्वीरें किसने बनाई है। हालांकि अब तो देश और दुनिया के तमाम नामचीन चित्रकार देवी-देवताओं की तस्वीरें बनाते हैं, मगर एक ऐसा समय था, जब ईश्वर का स्वरूप साहित्य में तो वर्णित था, मगर उनकी छवियां आम लोगों के मन में साकार नहीं थीं।

बहुत सारे मूर्तिकारों ने पत्थरों को तराश कर देवी-देवताओं की मूर्तियां तो गढ़ी थीं, मगर आज जिस तरह घर-घर में देवी-देवताओं की तस्वीरें टंगी होती हैं, वैसी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ऐसे समय में राजा रवि वर्मा ने देवताओं की तस्वीरें बनानी शुरू की थी। इसके लिए उन्होंने सजीव माडल तलाश किए और उन्हें देवी-देवताओं की अलग-अलग भंगिमा में बिठा कर प्रतिकृतियां तैयार की। उसमें उनकी कल्पना का भी मेल था।

राजा रवि वर्मा का जन्म 29 अप्रैल, 1848 को केरल के एक छोटे से शहर किलिमानूर में हुआ था। बचपन से ही उन्हें चित्रकारी का शौक था। पांच साल की उम्र से उन्होंने अपने घर की दीवारों पर दैनिक जीवन की घटनाओं को आंकना शुरू कर दिया था। उनके चाचा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और कला की प्रारंभिक शिक्षा दी।

चौदह वर्ष की उम्र में वे उन्हें तिरुवनंतपुरम ले गए और राजमहल में तैलचित्र बनाने की शिक्षा दिलाई। बाद में चित्रकला के विभिन्न आयामों में दक्षता प्राप्त करने के लिए उन्होंने मैसूर, बड़ौदा और देश के अन्य भागों की यात्राएं की। सुव्यवस्थित कला शिक्षा की वजह से ही उन्होंने चित्रांकन में महारत हासिल की थी। उन्होंने पहले पारंपरिक तंजौर कला और फिर यूरोपीय कला का अध्ययन किया।

उन्होंने मदुरै के चित्रकार अलाग्री नायडू तथा विदेशी चित्रकार थियोडोर जेंसन, जो भारत भ्रमण के लिए आए थे, से भी चित्रकला की शिक्षा ली थी। दोनों यूरोपीय शैली के कलाकार थे। रवि वर्मा की चित्रकला में दोनों शैलियों का सम्मिश्रण है।

उन्होंने लगभग तीस वर्ष भारतीय चित्रकला की साधना में लगाए। मुंबई में लीथोग्राफ प्रेस खोल कर उन्होंने अपने चित्रों का प्रकाशन शुरू किया था। उनके चित्र विविध विषय के हैं, पर उनमें पौराणिक विषयों और राजाओं के व्यक्ति चित्रों का आधिक्य है। विदेशों में उनकी कृतियों का स्वागत हुआ, उनका सम्मान बढ़ा और पद्म पुरस्कार मिले। पौराणिक वेशभूषा के सच्चे स्वरूप के अध्ययन के लिए उन्होंने देशाटन किया था।

हालांकि जनसाधारण में राजा रवि वर्मा की लोकप्रियता इतिहास, पुराण के चरित्रों और देवी-देवताओं के चित्रों के कारण हुई, लेकिन तैल माध्यम में बनाई प्रतिकृतियों के कारण वे विश्व में सर्वोत्कृष्ट चित्रकार के रूप में जाने गए। आज तक तैलरंगों में उनके जैसी सजीव प्रतिकृतियां बनाने वाला कलाकार दूसरा नहीं हुआ।

उनकी प्रमुख कृतियां हैं- विचारमग्न युवती, दमयंती-हंसा संभाषण, संगीत सभा, अर्जुन और सुभद्रा, फल लेने जा रही स्त्री, विरहव्याकुल युवती, तंतुवाद्यवादक स्त्री, शकुंतला, कृष्णशिष्टाई, रावण द्वारा रामभक्त जटायु का वध, इंद्रजित-विजय, भिखारी कुटुंब, राम की वरुण-विजय, शांतनु और मत्स्यगंधा, कण्व ऋषि के आश्रम की ऋषिकन्या। वडोदरा (गुजरात) स्थित लक्ष्मीविलास महल के संग्रहालय में उनके चित्रों का बहुत बड़ा संग्रह है।फिल्म निर्माता केतन मेहता ने राजा रवि वर्मा के जीवन पर फिल्म बनाई थी- रंगरसिया।

विश्व की सबसे महंगी साड़ी राजा रवि वर्मा के चित्रों की नकल से सुसज्जित है। बेशकीमती बारह रत्नों और धातुओं से जड़ी, चालीस लाख रुपए की साड़ी को दुनिया की सबसे महंगी साड़ी के तौर पर लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रेकार्ड में शामिल किया गया।
2 अक्तूबर, 1906 को उनका देहांत हो गया।

पढें रविवारी (Sundaymagazine News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

अपडेट